शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Wednesday, 13 December 2017

भक्त अंगरा जी

ॐ साँई राम जी



भक्त अंगरा जी 

गुरु ग्रंथ साहिब में एक तुक आती है: 

'दुरबा परूरउ अंगरै गुर नानक जसु गाईओ ||'

जिसने ईश्वर कर नाम सिमरन किया है, यदि कोई पुण्य किया है, वह प्रभु भक्त बना ओर ऐसे भक्तों ने सतिगुरु नानक देव जी का यश गान किया है| अंगरा वेद काल के समय भक्त हुआ है| इसने सिमरन करके अथर्ववेद को प्रगट किया| कलयुग ओर अन्य युगों के लिए अंगरा भक्त ने ज्ञान का भंडार दुनिया के आगे प्रस्तुत किया| इस भक्त का सभी यश करते हैं| इस भक्त विद्वान के पिता का नाम उरु तथा माता का नाम आग्नेय था|

भक्त अंगरा एक राज्य का राजा था| इसके मन में इस बात ने घर कर लिया कि सभी प्रभु के जीव हैं ओर यदि किसी जीव को दुःख मिला तो इसके लिए राजा ही जिम्मेवार होगा| राजा को अपनी प्रजा का सदैव ध्यान रखना चाहिए| इन विचारों के कारण अंगरा बच-बच कर सावधानी से राज करता रहा| राज करते हुए उसे कुछ साल बीत गए|

एक दिन नारद मुनि जी घूमते हुए अंगरा की राजधानी में आए| राजा ने नारद मुनि का अपने राजभवन में बड़ा आदर-सत्कार किया| राजा अंगरा ने विनती की कि मुनिवर! राजभवन छोड़कर वन में जाकर तपस्या क्यों न की जाए? राज की जिम्मेदारी में अनेक बातें ऐसी होती हैं कि कुछ भी अनिष्ट होने से राजा उनके फल का भागीदार होता है| उसने कहा कि मैं ताप करके देव लोक का यश करने का इच्छुक हूं|

राजा अंगरा के मन की बात सुनकर नारद मुनि ने उपदेश किया - राजन! आपके ये वचन ठीक हैं| आपका मन राज करने से खुश नहीं है| मन समाधि-ध्यान लगाता है| मनुष्य का मन जैसा चाहे वही करना चाहिए| मन के विपरीत जाकर किए कार्य उत्तम नहीं होते| यह दुःख का कारण बन जाते हैं| जाएं! ईश्वर की भक्ति करें| 

देवर्षि नारद के उपदेश को सुनकर अंगरा का मन ओर भी उदास हो गया| उसने राज-पाठ त्याग कर अपने भाई को राज सिंघासन पर बैठा दिया तथा प्रजा की आज्ञा लेकर वह वनों में चला गया| अंगरा ने वन में जाकर कठोर तपस्या की| भक्ति करने से ऐसा ज्ञान हुआ कि उसके मन में संस्कृत की कविता रचने की उमंग जागी| उसने वेद पर स्मृति की रचना की| 17वीं स्मृति आपकी रची गई है|

अन्त काल आया| कहते हैं कि जब प्राण त्यागे तो ईश्वर ने देवताओं को आपके स्वागत के लिए भेजा| आप भक्ति वाले वरिष्ठ भक्त हुए| जिनका नाम आज भी सम्मानपूर्वक लिया जाता है| परमात्मा की भक्ति करने वाले सदा अमर हैं|
बोलो! सतिनाम श्री वाहिगुरू|

Tuesday, 12 December 2017

भक्त अम्ब्रीक जी

ॐ साँई राम जी



भक्त अम्ब्रीक जी


अंबरीक मुहि वरत है राति पई दुरबासा आइआ|
भीड़ा ओस उपारना उह उठ नहावण नदी सिधाइआ|
चरणोदक लै पोखिआ ओह सराप देण नो धाइआ|
चक्र सुदरशन काल रूप होई भिहांवल गरब गवाइआ|
ब्राहमण भंना जीउ लै रख न हंघन देव सबाइआ|
इन्द्र लोक शिव लोक तज ब्रहम लोक बैकुंठ तजाइआ|
देवतिआं भगवान सण सिख देई सभना समझाइआ|
आई पइआ सरणागती मरीदा अंबरीक छुडाइआ|
भगत वछलु जग बिरद सदाइआ|४|

हे भगत जनो! भाई गुरदास जी के कथन अनुसार अम्ब्रीक भी एक महान भक्त हुआ है| इनकी महिमा भी भक्तों में बेअंत है| आप को दुरबाशा ऋषि श्राप देने लगे थे लेकिन स्वयं ही दुरबाशा ऋषि राजा अम्ब्रीक के चरणों में गिर गए| ऐसा था वह भक्त|

भक्त अम्ब्रीक पहले दक्षिण भारत का राजा था और वासुदेव अथवा श्री कृष्ण भक्त था| यह माया में उदासी भक्त था| इनके पिता का नाम भाग था| वह भी राजा था| जब यह युवा हुआ तो राजसिंघासन पर आसीन हुआ| राजा साधू-संतों की अत्यंत सेवा किया करता था और आए गए जरूरत मंदों की सहायता करता था|

राजा अम्ब्रीक में बहुत सारे गुण विद्यमान थे| वह अपनी सारी इन्द्रियों को वश में रखता था| वह प्रत्येक व्यक्ति को एक आंख से ही देखता और हर निर्धन, धनी, सन्त और भिक्षुक का ध्यान रखता| बुद्धि से सोच-विचार कर जरूरत मंदों की सेवा करता जितनी उनको आवश्यकता होती| वह भंडारा करके अपने हाथों से प्रसाद श्रद्धालुओं में बांटता| वह प्रतिदिन राम का सिमरन करता तथा नंगे पांव चलकर तीर्थ यात्रा के लिए जाता और कानों से सत्संग का उपदेश सुनता|

राजा अम्ब्रीक ऐसा त्यागी हो गया कि वह राज भवन, कोष, रानियां, घोड़े-हाथी किसी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं समझता था| वह सब वस्तुएं प्रजा एवं परमात्मा की मानता था| एकादशी के व्रत रखता एवं पाठ-पूजा में सदा मग्न रहता| इस तरह राजा अम्ब्रीक को जीवन व्यतीत करते हुए कई वर्ष बीत गए|

एक वर्ष श्री कृष्ण जी की भक्ति की प्रेम मस्ती तथा श्रद्धा भावना में लीन होकर उसने प्रतिज्ञा की कि वह हर वर्ष एकादशियां रखेगा| तीन दिन निर्जला व्रत और मथुरा-वृंदावन में जाकर यज्ञ करके दान पुण्य भी देगा| उसने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली| अम्ब्रीक एक आशावादी राजा था| उसने भरोसे में सभी बातें पूरी कर लीं और मंत्रियों सहित मथुरा-वृंदावन में पहुंच गया| मथुरा और वृंदावन में उसने यमुना स्नान करके यज्ञ लगाया| ब्राह्मणों को उपहार एवं दान दिया| वस्त्र तथा अन्न के अलावा सोने के सींगों वाली गऊएं भेंट में दान कीं| कई स्थानों पर पुराणों में लिखा है कि राजा अम्ब्रीक ने करोड़ों गाएं दान कीं| अर्थात् ढ़ेर सारा दान पुण्य किया|

ऐसा समय आ गया कि ब्राहमण छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खा कर तथा दान-दक्षिणा लेकर कृतार्थ होकर घर को विदा हो गए तो राजा को आज्ञा मिली कि वह अपना व्रत खोल ले| जब राजा ने अपना व्रत खोला तो वह खुशी-खुशी इच्छा पूर्ण होने पर स्वयं ही राजभवन को चल पड़ा|

राजा राज भवन में अभी पहुंचा भी नहीं था कि उसे मार्ग में दुरबाशा ऋषि आ मिले| राजा ने उन्हें झुककर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनती की|

'हे शिरोमणि मुनिवर! क्या आप राजभवन में भोजन करेंगे| यज्ञ का भोजन लेकर तृप्त होकर निर्धन राजा अम्ब्रीक को कृतार्थ करें|'

'जैसी राजन की इच्छा! भोजन का निमंत्रण स्वीकार करता हूं लेकिन यमुना में स्नान करने के बाद|'

ऋषि दुरबाशा ने उत्तर दिया|

यह कहकर ऋषि चल पड़ा| उसने मन में अनित्य धारण किया था| वह दरअसल राजा अम्ब्रीक को मोह-माया के जाल में फंसाने हेतु आया था| वैसे भी दुरबाशा ऋषि मन का क्रोधी एवं छोटी-छोटी बातों पर श्राप दे दिया करता था| इसके श्राप देने से कितनों को ही नुक्सान पहुंचा, वह बड़े प्रसिद्ध थे|

निमंत्रण देकर प्रसन्नचित राजा अम्ब्रीक अपने राजमहल में चला आया और ऋषि दुरबाशा का इंतजार करने लग गया| द्वाद्वशी का समय भी बीतने के निकट था लेकिन ऋषि दुरबाशा न आया| पंडितों ने आग्रह किया कि राजन! आप व्रत खोल ले लेकिन अम्ब्रीक यही उत्तर देता रहा-'नहीं'! एक अतिथि के भूखे रहने से पहले मेरा व्रत खोलना ठीक नहीं|

ऋषि दुरबाशा पूजा-पाठ में लीन हो गया| वह जान-बूझकर ही देर तक न पहुंचा| जब ऋषि न आया तो ब्राह्मणों ने चरणामृत पीला कर व्रत खुलवा दिया और कहा कि चरणामृत अन्न नहीं|

ऋषि दुरबाशा समय पाकर राजा अम्ब्रीक के राज भवन में उपस्थित हुआ| उसने योग विद्या से अनुभव कर लिया कि राजा अम्ब्रीक ने व्रत खोल लिया है| उसे गुस्से करने का बहाना मिला गया| ऋषि दुरबाशा ने अम्ब्रीक को अपशब्द बोलने शुरू कर दिए| उसने कहा कि एक अतिथि को भोजन पान करवाए बिना आपने व्रत खोल कर शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन किया है| आपको क्षमा नहीं किया जाएगा|

ऋषि दुरबाशा ने आग बबूला होकर कहा-चण्डाल! अधर्मी! मैं तुम्हें श्राप देकर भस्म कर दूंगा| महांमुनि क्रोध में आकर बुरा-भला कहता गया|

राजा अम्ब्रीक उनकी चुपचाप सुनता रहा| उसने उनकी किसी बात का बुरा नहीं मनाया और खामोश खड़ा रहा| राजा का हौंसला देखकर ऋषि का मन डोल गया लेकिन क्रोध वश होकर उसने कोई बात न की| जब दुरबाशा ऋषि अपशब्द कहकर शांत हुए तो राजा अम्ब्रीक ने हाथ जोड़कर विनती की-हे महामुनि जी! जैसे पूजनीय ब्राह्मणों ने आज्ञा की, वैसे ही मैंने व्रत खोला| आपकी हम राह देखते रहे| उधर से तिथि बीत रही थी| अगर भूल गई है तो भक्त को क्षमा करें| जीव भूल कर बैठता है| आप तो महा कृपालु धैर्यवान मुनि हैं| दया करें! कृपा करें! कुछ जीवन को रोशनी प्रदान करें| मैं श्राप लेने जीवन में नहीं आया| जीव कल्याण की इच्छा पूर्ण करने के लिए पूजा की है|

लेकिन इन बातों से ऋषि दुरबाशा का क्रोध शांत न हुआ| वह और तेज हो गया जैसे वह धर्मी राजा को तबाह करने के इरादा से ही आया हो| उसने अपने क्रोध को और चमकाया तथा क्रोध में आकर दुरबाशा ने अपने बालों की एक लट उखाड़ी| उस लट को जोर से हाथों में मलकर योग बल द्वारा एक भयानक चुड़ैल पैदा की और उसके हाथ में एक तलवार थमा दी जो बिजली की तरह चमक रही थी|

उस चुड़ैल को देखकर ब्राह्मण, माननीय लोग और राजभवन के सारे व्यक्ति डर गए| अधिकतर ने अपनी आंखें बंद कर लीं लेकिन धर्मनिष्ठ और भक्ति भाव वाला राजा अम्ब्रीक न डगमगाया और न ही डरा, वह शांत ही खड़ा रहा|

जैसे ही चुड़ैल धर्मनिष्ठ राजा अम्ब्रीक पर हमला करने लगी तो राजा के द्वार के आगे जो भगवान का सुदर्शन चक्र था, वह घूमने लगा| उसने पहले चुड़ैल का बाजू काट दिया और उसके बाद उसका सिर काट कर उसका वध कर दिया| वह चक्र फिर दुरभाशा ऋषि की तरफ हो गया| आगे-आगे दुरभाशा ऋषि तथा पीछे-पीछे सुदर्शन चक्र, दोनों देव लोक में जा पहुंचे लेकिन फिर भी शांति न आई| देवराज इन्द्र भी ऋषि की रक्षा न कर सका|

दुरबाशा बहुत अहंकारी ऋषि था| वह सदा साधू-संतों, भक्त जनों और अबला देवियों को क्रोध में आकर श्राप देता रहता था| उसने शकुंतला जैसी देवी को भी श्राप देकर अत्यंत दुखी किया था| इसलिए ईश्वर ने उसके अहंकार को तोड़ने के लिए ऐसी लीला रची|

भयभीत दुरबाशा ऋषि को देवताओं ने समझाया कि राजा अम्ब्रीक के अलावा आपका किसी ने कल्याण नहीं करना और आप मारे जाएंगे| परमात्मा उसके अहंकार को शांत करने के लिए ही यह यत्न कर रहा था| उसने तप किया, पर तप करने से वह अहंकारी हो गया|

दुरबाशा परलोक और देवलोक से फिर दौड़ पड़ा| वह पुन: राजा अम्ब्रीक की नगरी में आया और अम्ब्रीक के पांव पकड़ लिए| उसने मिन्नतें की कि हे भगवान रूप राजा अम्ब्रीक! मुझे बचाएं! मैं आगे से किसी साधू-संत को परेशान नहीं करुंगा| दया करें! मेरी भूल माफ करें!

जब दुरबाशा ऋषि ने ऐसी मिन्नतें की तो राजा अम्ब्रीक को उस पर दया आ गई| उसने दुरबाशा की दयनीय दशा देखी तो वह आंसू बह रहा था| राजा को उसकी दशा पर तरस आ गया| राजा अम्ब्रीक ने हाथ जोड़कर ईश्वर का सिमरन किया| प्रभु! दया करें, प्रत्येक प्राणी भूल करता रहता है| उसकी भूलों को माफ करना आपका ही धर्म है| हे दाता! आप कृपा करें! मेहर करें! राजा अम्ब्रीक ने ऐसी विनती करके जब सुदर्शन चक्र की तरफ संकेत किया तो वह अपने स्थान पर स्थिर हो गया| दुरबाशा के प्राणों में प्राण आए| सात सागरों का जल पीने वाला दुरबाशा ऋषि धैर्यवान राजा अम्ब्रीक से पराजित हो गया| उससे क्षमा मांगकर वह अपने राह चल दिया| इस प्रकार राजा अम्ब्रीक जो बड़ा प्रतापी था, संसार में यश कमा कर गया तथा भवजल से पार होकर प्रभु चरणों में लिवलीन होकर उनका स्वरूप हो गया| कोई भेदभाव नहीं रहा| भाई गुरदास जी के वचनों के अनुसार भक्त के ऊपर परमात्मा ने कृपा की जिससे भक्त अम्ब्रीक ने संसार से मोक्ष प्राप्त किया|


Monday, 11 December 2017

गौतम मुनि और अहल्या की साखी


ॐ साँई राम जी



गौतम मुनि और अहल्या की साखी

प्राचीन काल से भारत में अनेक प्रकार के प्रभु भक्ति के साथ रहे हैं| उस पारब्रह्म शक्ति की आराधना करने वाले कोई न कोई साधन अख्तयार कर लेते थे जैसा कि उसका 'गुरु' शिक्षा देने वाला परमात्मा एवं सत्य मार्ग का उपदेश करता था भाव-प्रभु का यश गान करता था| ऐसे ही भक्तों में एक गौतम ऋषि जी हुए हैं| गुरुबाणी में विद्यमान है| 'गौतम रिखि जसु गाइओ ||' जिसका भावार्थ है कि गौतम ऋषि ने जिस तरह प्रभु का सिमरन एवं गुणगान किया था, वह प्रभु का प्यारा भक्त हुआ| पुराणों में जिसकी एक कथा का वर्णन है, जो महापुरुषों और जिज्ञासुओं को इस प्रकार सुनाई जाती है|

गौतम ऋषि सालगराम शिवलिंग के पुजारी थे| उन्होंने कई वर्ष परमात्मा की कठिन तपस्या की| भोले भंडारी शिव जी महाराज ने इन पर कृपालु होकर वर दिया-हे गौतम! जो मांगोगे वही मिलेगा| तेरी हर इच्छा पूर्ण होगी| हम तुम पर अति प्रसन्न हैं|

यह वर लेकर गौतम ऋषि बड़े प्रसन्न हुए और दिन-रात प्रभु के सिमरन में व्यतीत करने लगे| संयोग से गौतम ऋषि को एक दिन पता चला कि मुदगल की कन्या जिसका नाम अहल्या था, उसके विवाह हेतो स्वयंवर रचा जा रहा है| अहल्या इतनी सुन्दर थी कि हरेक उससे शादी करने का इच्छावान था| इन्द्र जैसे स्वर्ग के राजा महान शक्तियों वाले देवते भी तैयार थे| देवताओं और ऋषियों की इच्छा, उनके क्रोध को देखकर मुदगल ने ब्रह्मा जी से विनती की - हे प्रभु! मेरी कन्या के शुभ कार्य के बदले युद्ध होना ठीक नहीं| आप हस्तक्षेप करके देवताओं को समझाएं| वह युद्ध न करें तथा कोई और उपाय सोचकर कृपा करें|

ब्रह्मा जी ने विनती स्वीकार कर ली| वह स्वयं ही सालस बन बैठे और उन्होंने सारे देवताओं व ऋषियों-मुनियों, जो विवाह करवाने के चाहवान थे, को इकट्ठा करके कहा-देखो! मुदगल की पुत्री सुन्दर है लेकिन उसको वर एक चाहिए| आप सब चाहवान हैं| यह भूल है| यदि स्वयंवर मर्यादा पर चलना है तो आप में से जो चौबीस मिनटों में धरती का चक्कर लगाकर प्रथम आए, उससे अहल्या का विवाह कर दिया जाएगा|

ब्रह्मा जी से ऐसी शर्त सुनकर सारे देवता पहले तो बड़े हैरान हुए लेकिन फिर सबने अपने-अपने तपोबल पर मां करके यह शर्त परवान कर ली| देवराज इन्द्र तथा ब्रह्मा जी के पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन और सनत को बड़ा अभिमान था| उन्होंने मन ही मन में सोचा की वह बाजी जीत जाएंगे| त्रिलोकी की परिक्रमा करनी उनके लिए कठिन नहीं|

मुदगल की पुत्री अहल्या की सुन्दरता और शोभा सुनकर गौतम ने उससे विवाह रचाने की इच्छा रखी और अपने सालगराम से प्रार्थना की| सालगराम ने गौतम ऋषि को दर्शन दिए और कहा-हे गौतम! यदि आपकी ऐसी इच्छा है तो वह अवश्य पूर्ण होगी| आप मेरी परिक्रमा कर लें, बस त्रिलोकी की परिक्रमा हो जाएगी| आप सबसे पहले ब्रह्मा जी को दिखाई देंगे|

विवाह के लिए शर्त की दौड़ शुरू हो गई| ऋषि गौतम ने सालगराम की परिक्रमा कर ली| उधर देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता जब परिक्रमा करने लगे तो वह बहुत तेज चले| हवा से भी अधिक रफ्तार पर दौड़ते गए लेकिन जिस पड़ाव पर जाते, वहां गौतम ऋषि होते| वे बड़े हैरान हुए तथा गुस्से में आकर मारने के लिए भागे मगर वह तो माया रूपी हो चुके थे| इसलिए कोई ताकत उनको नष्ट नहीं कर सकती थी|

भगवान सालगराम की महान शक्ति से गौतम ब्रह्मा जी के पास पहले आ गए| ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए| फिर ब्रह्मा जी ने अहल्या तथा गौतम को परिणय सूत्र में बांधने का फैसला किया| यह सुनकर देवता बड़े निराश और नाराज हुए, उन्होंने बड़ी ईर्ष्या की| जबरदस्ती छीनने का प्रयास किया, पर ब्रह्मा जी की शक्ति के आगे उनकी एक न चली| वह वापिस अपने-अपने स्थानों पर चले गए| गौतम अहल्या को लेकर अपने आश्रम में आ गया| गौतम का आश्रम गंगा के किनारे था| वह तपस्या करने लगा, उसकी महिमा दूर-दूर तक फैल गई|

इन्द्र देवता नाराज हो गए, देश में अकाल पड़ गया, सारी धरती दहक उठी| साधू, संत, ब्राह्मण तथा अन्य सब लोग बहुत दुखी हुए| उनके दुःख को देख कर गौतम ऋषि का दिल भी बड़ा दुखी हुआ| उसने सालगराम की पूजा की और प्रार्थना की कि हे भगवान! मुझे शक्ति दीजिए ताकि मैं भूखे लोगों को भोजन खिलाकर उनकी भूख को मिटा सकूं| भगवान ने गौतम की प्रार्थना स्वीकार कर ली और गौतम ने लंगर लगा दिया, भगवान की ऐसी कृपा हुई कि किसी चीज़ की कोई कमी न रही| हर किसी ने पेट भर कर और अपने मनपसंद का खाना खाया| गौतम का यश तीनों लोकों में फैल गया| उसके यश को देखकर इन्द्र और भी तड़प उठा, वह पहले ही अहल्या को लेकर क्रोधित था| इन्द्र ने माया शक्ति से काम लेना चाहा| इस माया शक्ति से उसने एक गाय बनाई, गाय की रचना इस प्रकार की कि जब गौतम उसे हाथ लगाएगा तो वह मर जाएगी|

वह गाय गौतम के आश्रम में पहुंची| गौतम आश्रम से बाहर निकला तो गाय को काटने के लिए उसने जब हाथ लगाया तो वह धरती पर गिर कर मर गई|

इन्द्र की चाल के अनुसार ब्राह्मणों ने शोर मचा दिया कि ऋषि गौतम के हाथ से गाय की हत्या हो गई, उसको अब प्रायश्चित करना चाहिए| पर सालगराम भगवान की कृपा से गौतम ऋषि को पता चल गया कि यह इन्द्र का माया जाल था| गौतम ने उन सब झूठे ब्राह्मणों को श्राप दिया और कहा-"जाओ! तुम्हारी भूख कभी नहीं मिट सकती, यह भूख जन्म-जन्म ऐसे ही रहेगी|" यह श्राप लेकर ब्राह्मण बहुत दुखी हुए और गौतम ने भोजन बंद कर दिया|

इस प्रकार दिन-प्रतिदिन गौतम का यश बढ़ता गया और वह अहल्या के साथ जीवन व्यतीत करता रहा| उसके घर एक कन्या ने जन्म लिया| वह कन्या भी बहुत रूपवती थी| वह आश्रम में खेल कूद कर पलने बढ़ने लगी|

इन्द्र ने अपना हठ न छोड़ा| वह अहल्या के पीछे लगा रहा| वह प्रेम लीला करने के लिए व्याकुल था| वासना की ज्वाला उसे दुखी करती थी| उसकी व्याकुलता बाबत भाई गुरदास जी ने वचन किया है :-

गोतम नारि अहलिआ तिस नो देखि इंद्र लोभाणा |
पर घर जाइ सराप लै होई सहस भग पछोताणा |
सुंञा होआ इन्द्र लोक लुकिआ सरवर मन शरमाणा |
सहस भगहु लोइण सहस लैदोई इन्द्र पुरी सिधाणा |
सती सतहुं टलि सिला होइ नदी किनारे बाझ पराणा |
रघुपति चरन छुहंदिआं चली स्वर्ग पुर सणे बिबाणा |
भगत वछ्ल भलीआई अहुं पतित उधारण पाप कमाणा |
गुण नो गुण सभको करै अउगुण कीते गुण तिस जाणा |
अवगति गति किआ आखि वखाणा |१८|

भाई गुरदास जी अहल्या की कथा बताते हुए कहते हैं कि अहल्या का सौंदर्य देख कर इन्द्र लोभ में आ गया था| उसे कोई बुद्धिमानों ने समझाया-हे इन्द्र! पराई-नारी का भोग मनुष्य को नरक का भागी बनाता है| इस तरह का विचार कभी भी अपने मन में नहीं लाना चाहिए| आपकी पहले ही अनेक रानियां हैं| सारी इन्द्रपुरी नारि सुन्दरता से भरी पड़ी है, उन्हें धोखा नहीं देना चाहिए| पतिव्रता नारी एक महान शक्ति है|

पर जब इन्द्र ने हठ न छोड़ा तो उसके एक धूर्त सलाहकार ने कहा कि 'गौतम जिस समय गंगा स्नान करने जाता है, तब पूजा - पाठ का समय होता है| उस समय भोग-विलास नहीं किया जाता, प्रभु का गुणगान किया जाता है| अच्छा यह है कि आप माया शक्ति से मुर्गे और चन्द्रमा से सहायता लें|

'वह क्या सहायता करेंगे?' इन्द्र ने पूछा| मुझे इसके बारे में जरा विस्तार से बताओ|

इन्द्र की बात सुनकर उसके सलाहकार ने कहा-'मुर्गे की बांग से गौतम सुबह उठता है और चन्द्रमा निकलने पर वह गंगा स्नान करने जाता है| अगर मुर्गा पहले बांग दे दे और चन्द्रमा पहले निकल जाए तो वह गंगा स्नान करने चला जाएगा और इस प्रकार आपको एक सुनहरी अवसर मिल जाएगा|'

'यह तो बहुत अच्छी चाल है|' इन्द्र ने कहा| इन्द्र खुशी से बोला - मैं अभी मुर्गे और चन्द्रमा से सहायता मांगता हूं, उनसे अभी बात करता हूं| वह अवश्य ही मेरी सहायता करेंगे| फिर साहस करके इन्द्र मुर्गे और चन्द्रमा के पास पहुंचा| उनको सारी बात बताई और अपने पाप का भागी उन्हें भी बना लिया| वे दोनों उसकी सहायता करने को तैयार हो गए| उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी|

रात नियत की गई तथा नियत रात को ही मुर्गे ने बांग दे दी| चन्द्रमा भी निकल आया| गौतम ने मुर्गे की बांग सुनी तो अपना तौलिया धोती उठा कर गंगा स्नान के लिए चल पड़ा| वास्तव में अभी गंगा स्नान का समय नहीं हुआ था| जब वह गंगा स्नान करने लगा तो आकाशवाणी हुई 'हे ऋषि गौतम! असमय आकार ही स्नान करने लगे हो, अभी तो स्नान का समय नहीं है| तुम्हारे साथ धोखा हुआ है| यह सब एक माया जाल है| तुम्हारे घर पर कहर टूट रहा है, जाओ जा कर अपने घर की खबर लो| यह आकाशवाणी सुनकर गौतम वापिस चल पड़ा|

उधर गौतम के जाने के पश्चात इन्द्र ने बिल्ले का रूप धारण किया| बिल्ले का रूप धारण करने का कारण यह था कि गौतम अहल्या को अकेले नहीं छोड़ता था क्योंकि देवता उसके पीछे पड़े थे| जब भी गौतम स्नान करने जाता तो अपनी पुत्री अंजनी को कुटिया के सामने द्वार पर बिठा जाता था|

इन्द्र ने जब देखा कि अंजनी द्वार के आगे बैठी है और पूछेगी कि आप कौन है? तो वह क्या उत्तर देगा, इसलिए इन्द्र ने बिल्ले का रूप धारण कर लिया और भीतर चला गया| अंजनी ने ध्यान न दिया| इन्द्र की माया शक्ति से अंजनी को नींद आ गई, वह बैठी रही| भीतर जाकर इन्द्र ने गौतम मुनि का भेस धारण कर लिया, उसके जैसी ही सूरत बना ली| अहल्या को कुछ भी पता न चला| इन्द्र अहल्या से प्रेम-क्रीड़ा करने लग गया| अभी वह अंदर ही था कि बाहर से गौतम आ गया|

'अंदर कौन है?' अंजनी को गौतम ने पूछा| उस समय गौतम की आंखें गुस्से से लाल थीं| वह बहुत व्याकुल था|

'माजार' अंजनी ने उत्तर दिया| इसके दो अर्थ हैं एक तो 'मां का यार' और दूसरा 'बिल्ला'| वह बहुत घबरा गई|

गौतम भीतर चला गया| उसने देखा कि इन्द्र उसी का रूप धारण करके नग्न अवस्था में ही अहल्या के पास बैठा था| उसकी यह घिनौनी करतूत देखकर गौतम ऋषि ने अपने भगवान सालगराम को याद किया और इन्द्र को श्राप दिया - "हे इन्द्र! तू एक भग के बदले पाप का भागी बना है| तुम्हारे शारीर पर एक भग के बदले हजारों भग होंगे| तुम दुखी होकर दुःख भोगोगे|"

गौतम ऋषि का यह श्राप सुनकर इन्द्र घबराया| लेकिन इन्द्र पर श्राप प्रगट होने लगा| उसका शरीर फूटने लगा| हजार भग नज़र आने लगीं| शर्म का मारा छिपता रहा|

इन्द्र से ध्यान हटाकर गौतम ऋषि ने चन्द्रमा को श्राप दिया| तुम तो धर्मी थे, जगत को रोशन करने वाले मगर तुमने एक अधर्मी, पापी का साथ दिया है इसलिए डूबते-चढ़ते रहोगे, बस एक दिन सम्पूर्ण कला होगी| जबकि चांद पहले सम्पूर्ण कला में रहता था परन्तु उसी समय श्राप के बाद उसकी कला भी कम हो गई|

मुर्गे को भी श्राप दिया-'कलयुग में तुम असमय बांग दिया करोगे| तुम्हारी बांग पर कोई भरोसा नहीं करेगा|

गौतम ऋषि तब तीनों को श्राप दे कर फिर अहल्या की ओर मुड़ा| उस समय वह बहुत ही सुन्दर लग रही थी जिसके समान कोई दूसरी नारी न थी| उसको भी गौतम ने श्राप दे दिया-'हे अहल्या! तुम एक पतिव्रता स्त्री थी| क्या तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी जो एक पराये पुरुष को पहचान न सकी, पत्थर की तरह लेटी रही जाओ - तुम पत्थर का रूप धारण कर लोगी| तुम्हारा कल्याण न होगा| इस के पश्चात नारी का धर्म कमज़ोर हो जाएगा| कलयुग में नारी बदनाम होगी|

जब यह श्राप अहल्या ने सुना तो वह हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगी-हे प्रभु! मेरा कोई दोष नहीं है, मैंने तो बस आपका रूप देखा| मुझे क्षमा करो, मेरे साथ धोखा हुआ है| मैं तो आपकी दासी हूं| मेरा धर्म है....|'

अहल्या का विलाप एवं पुकार सुनकर गौतम को दया आई और उसने दूसरा वचन किया - 'शिला के रूप में तुम्हें कुछ काल तक रहना पड़ेगा| जब श्री राम चन्द्र जी अवतार लेंगे तो उनके पवित्र चरण स्पर्श से तुम फिर से नारी रूप धारण करोगी और तुम्हारा कल्याण होगा|

आश्रम में से निकल कर अहल्या गंगा किनारे पहुंची तो उसका शरीर पत्थर हो गया| वह श्राप में सोई रही| अहल्या बहुत देर तक पत्थर बनी रही| श्री राम चन्द्र जी ने अयोध्या नगरी में जन्म लिया| श्री रामचन्द्र जी लक्ष्मण तथा विश्वामित्र के साथ जब उस तपोवन में आए तो उनके चरणों के स्पर्श से अहल्या फिर नारी रूप में आ गई|

उधर बृहस्पति के कहने पर इन्द्र फिर गौतम के पास गया और अपनी भूल की माफी मांगी हाथ जोड़े, पैर पकड़े, कहा-फिर कभी पर-नारी कोई नहीं देखूंगा| तब इन्द्र का रोगी शरीर भी ठीक हो गया| वह अपने इन्द्र लोक चला गया|


Sunday, 10 December 2017

गनिका जी

ॐ साँई राम जी



गनिका जी

गनिका एक वेश्या थी जो शहर के एक बाजार में रहती थी| वह सदा पाप कर्म में कार्यरत रहती थी| उसके रूप और यौवन सब बाजार में बिकते रहते थे| वह मंदे कर्म करके पापों की गठरी बांधती जा रही थी| जब से हो जाती तो उसके घर में रौनकें बढ़ जाती तथा महफिलें सजी रहतीं| रात को दीया जलते ही वह हार-श्रृंगार करके अपने सुन्दर यौवन को आकर्षित करती हुई बैठ जाती|

पर - सुआ पड़ावत गनिका तरी ||
सो हरि नैनहु की पूतरी ||

भक्तों ने वचन किया है कि तोते को पढ़ाती हुई गनिका भवजल से तर गई| वह परमात्मा के नयनों की पुतली बनी| वह भक्तों में गिनी जाने लगी| उसका ऐसा जीवन बदल गया|

उसके पाप एवं नरकी जीवन में से निकलने की कथा इस प्रकार है - वह बुरे कर्मों में व्यस्त हुई जीवन को ही भूल गई थी| मनुष्य जीवन के मनोरथ का उसे बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था| एक दिन एक साधू जिसके पास एक तोता था, वहां आ गया|

कहते हैं कि वह साधू नगर से बाहर रहता था| वह भीड़-भाड़ में कम ही आता| उस रात इतनी वर्षा हुई कि वहां ऊंची-नीची धरती जल-थल दिखाई देने लगी| साधू ने देखा कि सर्दी से उसका तोता भी मरने लगा है| यह तोता उसको प्राणों से भी प्यारा था, क्योंकि वह 'राम-राम' जपता था| उसने तोते के पिंजरे को उठाया तथा नगर की ओर चल पड़ा| उसने अपनी गोदड़ी तथा अन्य वस्त्र ऊपर लिए हुए थे| कुदरत की शक्ति का मुकाबला करना उसके वश से बाहर था| वह पैदल चलता हुआ नगर आ गया, पर कोई ठिकाना न मिला| रात का समय था| सब लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद करके बैठे हुए थे| बहुत घूमने-फिरने पर भी साधू को कोई ठिकाना न मिला, वह चलता रहा|

गनिका का घर आया| दिया जल रहा था, द्वार भी खुला हुआ था| वह राम का नाम लेकर भीतर चला गया| गनिका उसे देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई| उसने सोचा कि वर्षा और तूफान में भी उसके पास ग्राहक आया है, जो उसके तन का सौदा करेगा और उसको पैसे खटाएगा| उसने बड़ी खुशी से कहा.... आओ, मेरी आंखों में बैठो, मैं आपका रास्ता देख रही थी|

गनिका की यह बात सुन कर और उसके रूप तथा श्रृंगार को देख कर साधू बड़ा हैरान हुआ| साधू ने गनिका से कहा-'पुत्री! बाहर वर्षा बहुत हो रही है जिस कारण मेरी झोंपड़ी बह गई| मैं अपने तोते सहित सहारा लेने आया हूं|'

'पुत्री' शब्द से गनिका का पापी मन कांप उठा| वह एक बार कांपी तथा फिर मायूस होकर बोली-'आप ने रात ठहरना है?

हां, 'पुत्री! हमने रात ठहरना है| हरेक आत्मा परमात्मा का अंश है और शरीर आत्मा का घर| शरीर को आश्रय देना नेक मार्ग पर चलना होता है| पुत्री! परमात्मा ने तुम्हें सुख के सभी साधन दिए हैं, तुम उसे याद करती होगी|

साधू सहज स्वभाव बोलता गया| उसकी आत्मा सचमुच ही बड़ी निर्मल थी, परन्तु गनिका जिसका वास्तविक नाम 'चन्द्रमणी' था, वह साधू की बातें सुनकर घबराने लगी| वह तो पापिन थी, उसने घबरा कर कहा - 'आप साधू हैं?'

हां, ' मैं साधू हूं| मेरे मालिक ने मुझे साधू बना कर अपने नाम के सिमरन में लगाया है| वही मालिक सबका जीवन दाता और अन्न दाता है|'

गनिका के मन में भी कुछ नेक भाव आए, क्योंकि उस दिन से पहले उस जैसा साधू महात्मा पुरुष पहले कभी भी उसके पास नहीं आया था जो उसको पाप कर्म की ओर न लगाता| उसके पास वहीं पुरुष आते जो उसके तन का सौदा करके उसके मैले मन पर और अधिक मैल फैंक देते| उस दिन गनिका सुबह स्नान करके घूमती रही| वर्षा अभी भी हो रही थी|

'आप साधू हैं, भगवान के भक्त! ठीक है| आओ.... बैठो और भीगे वस्त्र उतार कर दूसरे वस्त्र पहन लो| गनिका को शायद जीवन में पहली बार साधू की सेवा करने का अवसर मिला है| आओ.... क्या पता मेरे जीवन में ऐसी घटना होनी होगी|'

यह कह कर उसने साधू के भीगे वस्त्र उतरवाए और उसे गर्म वस्त्र दिए| उसने साधू और तोते के लिए आग जलाई| जब वह गर्म होकर अपने आपको ठीक अनुभव करने लगे तो तोते ने अपनी आदत अनुसार राम का नाम लेना शुरू कर दिया| चन्द्रमुखी गनिका को उनकी बातें अनोखी लगी| उसने साधू से पूछा - 'महाराज! भोजन करोगे?'

हां, 'पुत्री! मैं भी भूखा हूं और यह पक्षी भी भूखा है, जो भगवान ने हमारी किस्मत में लिखा है, वह देगा| आज नहीं तो कल| उसकी जैसी इच्छा है वैसा ही होना है|' साधू ने उत्तर दिया|

'मेरे पास जो कुछ है उसको स्वीकार करें-पर मैं गनिका (वेश्या) हूं, जिसे इस घर में आए बारह साल हो गए हैं| पुरुषों के मन की खुशियां पूरी करती रही हूं| मैं तो पापिन हूं, पापिन के घर का भोजन! गनिका चन्द्रमुखी ने कहा| उसके चेहरे पर गम्भीरता आ गई, शायद उसके जीवन में यह पहली घटना थी|

साधू ने देखा, गनिका ने अपने पाप कर्मों को अनुभव कर लिया है| अब इसको उपदेश देना ठीक है| साधू ने कहा -'तुम्हारा दिया भोजन स्वीकार होगा| इस जगत में माया का प्रवेश है| माया का प्रभाव जब जीव पर पड़ता है तो वह भगवान को भूल कर काम, क्रोध और मोह में फंस जाता है| जीवन मार्ग से दूर हो जाता है, राम नाम का सिमरन नहीं करता| कुछ ऐसे पुरुष होते हैं जो अपने ही स्वार्थ के लिए किसी दूसरे को कुमार्ग पर भेज देते हैं, ऐसा ही जगत का दस्तूर है|'

ठीक है महाराज! आप सत्य कहते हैं| पुरुषों ने ही मुझे कुमार्ग पर डाला है| मैं पापिन हूं, पर पापिन होने का ज्ञान मुझे आपके ही दर्शन करने पर हुआ है| जब आपने मुझे 'पुत्री' कहा| मेरे घर में चाहे जवान आए चाहे बूढ़ा, कभी मुझे बहन या पुत्री किसी ने नहीं कहा| न ही मुझे पता है कि मेरी मां कौन थी और पिता कौन? बस ऐसे ही जीवन व्यतीत होने लगा| वर्षा होते दो दिन हो गए लेकिन वह नहीं आए जो अपने स्वार्थ के लिए आते थे|

इस प्रकार गनिका चन्द्रमुखी को ज्ञान होता गया| उसका शरीर और मन कांपने लगा| उसको ऐसा अनुभव होने लगा जैसे उसमें एक महान परिवर्तन आ रहा हो| एक दर्द और पीड़ा हो रही थी|

मतलब ही तो सब कुछ है, इस समाज की जान है| मुझे और मेरे तोते को मतलब था आसरा लेने का, हम चल कर आ गए| इस मतलब के दो रूप हैं - एक तो है मायावादी तथा दूसरा ईश्वरवादी| अगर जीवन को यह मतलब हो कि उसका जीवन अच्छा बने, तो वह राम नाम का सिमरन करने के लिए साधू-सन्तों और नेक पुरुषों की संगत करे| सेवा का भाव अपने मन में रखे| धर्म और समाज की मर्यादा कायम रखे तो ठीक है| देख पुत्री! अगर तुमने एक पति धारण किया होता, उसकी सेवा करती, उससे ही तन और मन की जरूरत पूरी किया करती तो बच्चे होते| बच्चों और पति की सुख-शांति के लिए पूजा-पाठ करती, सभी तुझे देवी कहते| जीव कर्म से जाना जाता है शरीर से नहीं| इसलिए भला है, जो बीत गया सो बीत गया, आगे से नेक मार्ग पर चलना| भगवान, जिसने जीवन दिया है, वह रोजी-रोटी भी देता है|

गनिका चन्द्रमुखी ने साधू को भोजन कराया| उसने तोते को चूरी खिलाई और उनके चरणों में लग गई| साधू की संगत ने उसके मन को बदल दिया तथा उसको पापों का एहसास करा दिया| इसीलिए तो सद्पुरुष हमेशा कहते हैं कि सदा साधू-सन्त, गुरु पीर, नेक पुरुषों की संगत करनी चाहिए| भाई गुरदास जी ने संगत का बहुत ही बड़ा महत्व बताया है| भाई गुरदास जी फरमाते हैं :-

सण वण वाड़ी खेत इक परउपकार विकार जणावै |खल कढाइ वढाइ सण रसा बंधन होई बनावै |खासा मलमल सिरिसाफ सूत कताइ कपाह वणावै |लजण कजण होइकै साध असाध बिरद बिरदावै |संग दोख निरदोख मोख संग सुभाउ न मान मिटावै |त्रपड़ होवै धरमसाल साध संगति पग धूड़ धुमावै |कुटकुट सण किरतास कर हरिजस लिख पुराण सुणावै |पतित पुनीत करे जन भावै |पथर चित कठोर है चूना होवै अगीं दधा |अग बुझै जल छिड़कीअै चूने अग उठै अति वधा |पाणी पाए विहु न जाइ अगन न फुटे अवगुण बधा |जीभै उते रखिआ छाले पवन संग दुख लधा |पान सुपारी कथ मिल रंग सुरंग संपूरण सधा |साध संगति मिल साध होइ गुरमुख महां असाध समधा |पाप गवाइ मिले पल अधा|

साधू-संगत का ऐसा फल है कि जो गनिका के मन पर प्रभाव डाल गया| वह सारी-सारी रात सत्संग करती रहती|

अगले दिन वर्षा बंद हो गई| आकाश बिल्कुल साफ हो गया| धूप निकली तो साधू ने चलने की तैयारी की| तब गनिका चन्द्रमणी ने प्रार्थना की 'महाराज! मुझ पर एक उपकार करो, यह तोता दे जाओ| मैं इससे 'राम नाम' सुना करुंगी, इसको पढ़ाया करुंगी| अच्छा हो अगर आप भी यहां पर ही रहें|

अच्छा पुत्री! अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो यह लो पिंजरा| इसको संभाल कर रखना, हम अपनी कुटिया में जाते हैं| तुम्हारे घर रहने से लोग तुम्हारी और मेरी दोनों की निंदा करेंगे| लोक निंदा करानी अच्छी नहीं होती| हम चलते हैं|'

यह कह कर साधू चला गया| वह अपना तोता छोड़ गया| वह तोता राम का नाम बोलता| गनिका कहती, बोल गंगा राम 'राम-राम'|

गनिका चन्द्रमणी को ऐसी लगन लगी कि वह दिन-रात गंगा राम को 'राम' नाम का पाठ पढ़ाने लगी| उसका मन पाप कर्मों से हट गया| उसने राम नाम की धुनी गानी शुरू कर दी| धीरे-धीरे उसकी बैठक खाली रहने लगी और 'राम नाम' की गूंज आने लगी| उसे तन और मन की होश न रही| वह भूखी ही 'राम' नाम जपती रहती|

गनिका चन्द्रमणी की भक्ति देख कर भगवान प्रसन्न हो गया| उसने चन्द्रमणी को अपने पास बुलाने के लिए एक बहाना बना लिया| वह बहाना यह था कि उसने पिंजरे में सांप का रूप धारण करके अपने काल दूत को भेजा| उसने पहले तोते को डंक मारा, उसकी आत्मा को पहले भेज दिया तथा फिर बैठा रहा| गनिका उठी, उसने तोते को बुलाया, बोल गंगा राम 'राम-राम|' पर उसको कोई आवाज़ न आई| उसने अपना हाथ पिंजरे में डाल कर तोते को हिलाया तो सांप ने उसको डंस लिया| उसी समय उसकी आत्मा शरीर त्याग गई| आत्मा के लिए बिबान आया, नरसिंघे बजे| शंखों की धुन में वह मृत्यु-लोक से स्वर्ग-लोक में पहुंच गई| इस कथा पर भाई गुरदास जी ने कहा है -

गई बैकुण्ड बिमान चढ़ नाम नाराइण छोत अछोता |


थाऊं निथावें माण मणोता |

Saturday, 9 December 2017

अजामल जी

ॐ साँई राम जी



अजामल जी 

अजामल उधरिआ कहि ऐक बार ||

हे भक्त जनो! अजामल की कथा श्रवण करो| इस कथा के श्रवण करने वाले को यम भी तंग नहीं करता| वह ऊंचे चाल-चलन वाला बनता है| सुनने वाले के पाप मिटते हैं| उसका कल्याण होता है, उसे मोक्ष मिलता है|

अजामल उस समय का बहुत बड़ा पापी माना गया है| वह पापी किसलिए था? उसने क्या कसूर किया था? इसकी कथा इस प्रकार है :-

अजामल एक राज-ब्राह्मण का पुत्र था| उसका पिता राजा के पास पुरोहित भी था और वजीर भी| वह बहुत अक्लमंद था| उसके सूझवान होने की चर्चा चारों ओर थी|

अजामल की आयु जब पांच साल की हुई तो उसके माता-पिता ने उसको विद्यालय में दाखिल करवा दिया| वह जिस गुरु से पढ़ता था वह बहुत ही सूझवान था| सूझवान गुरु को जब सूझवान शिष्य मिल जाता है तो वह बहुत खुश हो जाता है ऐसी ही हालत अजामल के गुरु की भी थी| उसने देखा कि अजामल की जुबान पर सरस्वती बैठी है वह जो भी शब्द पढ़ता या सुनता वही कंठस्थ कर लेता| उसका कंठ भी रसीला था| जब वह वेद मंत्र पढ़ता तो एक अनोखा ही रंग दिखाई देता था| वह बहुत ही बुद्धिमान निकला| उसने केवल दस साल में ही बीस साल की विद्या प्राप्त कर ली| उसकी विद्वता की चहुं ओर प्रसिद्धि हो गई| ऐसी प्रसिद्धि कि बड़े-बड़े विद्वान भी उसके दर्शन करने आते थे|

एक दिन अजामल के गुरु ने कहा - 'अजामल! अभी तुम शिष्य हो!'

'हां, गुरुदेव मैं शिष्य हूं - पर कितनी देर शिष्य रहूंगा?' 'कोई चार साल और लगेंगे| चारों वेद और उपनिषद पूरे हो जाएंगे|'

'जो आज्ञा गुरुदेव|'

उसके गुरु ने उसकी ओर ध्यान से देख कर कहा - अजामल जब मेरे पास आओ या अपने घर को जाओ तो नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो| नगर में कभी नहीं जाना, क्योंकि अभी तुम्हारे वस्त्र विद्यार्थी के हैं| गुरु कि आज्ञा का पालन करना होगा| आज्ञा का पालन न किया तो दुःख उठाओगे| सुखी वही रहता है जो गुरु की आज्ञा का पालन करता है, क्योंकि गुरु को हर प्रकार के ज्ञान और कर्म का बोध होता है|'

हे गुरुदेव! क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप मुझे नगर में आने से क्यों रोकते हो? अजामल ने उत्तर दिया| उसका उत्तर सुनकर गुरु चुप कर गया| केवल इतना ही कहा-नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो, ऐसा ही कर्म है|

अजामल ने गुरु की आज्ञा का पालन किया| वह नगर के बाहर बाहर ही आया-जाया करता था| न ही वह इस बारे किसी से बात किया करता था कि उसके गुरु ने उसको नगर में जाने से मना किया है| इस तरह कई साल बीत गए| वह विद्या पढ़ता रहा| उसकी आयु अब बीस साल की हो गई| वह बहुत सुन्दर दर्शनी जवान निकला| नेत्रों में डोरे आए उसकी विद्या पूरी होने वाली थी| उसके पश्चात उसने गुरु दक्षिणा दे कर आज़ाद हो जाना था|

एक दिन उसका अपने मन से झगड़ा हो गया| उसने कहा, गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करके नगर में से जाना ही ठीक है| आखिर यह तो देखा जाए, गुरु जी रोकते क्यों हैं?

उसके एक मन का यह भी कहना था कि अजामल! गुरु की आज्ञा का पालन नहीं करेगा तो नरक का भागी होगा, बहुत दुःख भोगेगा|

देखा जाएगा, अजामल ने मन सुदृढ़ किया और वह अपने गुरु के पास से उठ कर उस मार्ग को छोड़ कर जिससे वह रोज़ आया-जाया करता था, अनदेखे रास्ते से नगर में से चल पड़ा|

अजामल के गुरु ने उसको इसलिए नगर में जाने से रोका था क्योंकि नगर में माया का विस्तार था| धन के रूप के चमत्कार ऐसे थे कि नौजवान का मन उस ओर शीघ्र आकर्षित हो जाता था| नवयुवक को पूर्ण ज्ञान नहीं होता था| गुरु के आश्रम के वेश्याओं का बाजार था, सारी ही वेश्या नगरी थी| उस मुहल्ले में वेश्याएं बैठती थीं| वह युवा-पुरुषों को अपने वश में करती थी| ऐसी हवा से बचाने के लिए ही गुरु ने अजामल को रोका था| गुरु चाहता था कि अजामल राजपुरोहित बन जाए| जब विवाह हो जाएगा तो फिर इस ओर ध्यान नहीं जाएगा| ऐसा ही विचार गुरु का था, क्योंकि गुरु के लिए शिष्य ही उसका पुत्र होता है, उसका ध्यान रखना गुरु का कर्त्तव्य और धर्म होता है| शिष्य का भी धर्म है कि वह गुरु की सेवा करे, उसकी आज्ञा का पालन करे| अजामल जब जाने लगा तो गुरु ने स्मरण करवाया कि अजामल! शहर के अन्दर मत जाना|

'बहुत अच्छा गुरुदेव' कह कर अजामल चल पड़ा| पर वह आश्रम में से निकल कर नगर के अंदर ही अंदर द्वार की ओर चल पड़ा| वह जैसे ही द्वार के भीतर गया, वैसे ही उसे नगर की महिमा बड़ी अनोखी-सी लगी| बहुत चहल-पहल थी| सबसे बड़ी बात यह थी कि सुन्दर नारियां हाव-भाव करती इधर-उधर घूमती दिखाई दीं| वह पुरुषों से मधुर बातें करती थीं| उनके रूप बहुत सुन्दर थे| नरगिस के फूल जैसे नयन थे| उनके अर्द्ध-नग्न तन तुलाब की पत्तियों की तरह चमकते थे| वह शोभा वाली थी|

उन सुन्दर नारियों को देखता हुआ अजामल अपने घर को चला गया| घर जाकर उसका मन पढ़ने और पाठ याद करने में न लगा| उसका मन बेचैन हो गया तथा जो कुछ देखा था वहीं सामने घूमने लगा| जब रात को नींद आई तो वही सपने आते रहे जो उसने नगर में देखा था| सुबह उठ कर स्नान किया| जब गुरु के पास गया तो गुरु ने उसकी आंखों में लाली देखी और पूछा-अजामल! रात सोए नहीं, क्या बात है?

'सोया था गुरुदेव!''
आंखें लाल और मन उखड़ा-सा क्यों है?''
पता नहीं गुरुदेव?''
नगर से बाहर-बाहर गया था, बाहर-बाहर आया था|'

अजामल ने पहले तो गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया और बाद में दूसरी महान भूल यह की कि गुरु से झूठ बोल दिया| उसने झूठ बोलते हुए कहा - गुरुदेव बाहर-बाहर गया था| वह झूठ बोला| इसलिए उसकी आत्मा कांपी, पर वह झूठ बोल चुका था|

उस दिन पढ़ने में मन न लगा| दो दोष हो गए| अजामल के मन पर बहुत भार रहा| दूसरा उसकी आंखों के सामने नगर के नजारे थे वह पाठ को पढ़ने नहीं देते थे| जैसे तैसे उसने समय व्यतीत किया| जब छुट्टी मिली तो फिर उस नगर के रास्ते ही चल पड़ा| उस नगर की वासना भरी महिमा को देखता रहा| देखता-देखता वह घर चला गया|

इस प्रकार दस-बारह दिन व्यतीत हो गए| वह नगर आता-जाता रहा| नारी रूप लीला ने उसके युवा मन को प्रभावित कर दिया| जादू जैसा असर और उसका मन डगमगाने लगा| जब मन डगमगा जाए तो मनुष्य शीघ्र शिकार हो जाता है| एक दिन एक रूपवती नवयौवना अभी खिलती जवानी 16-17 वर्ष की आयु वाली वेश्या ने उसका बाजू पकड़ लिया| उसे जाल में फंसा कर पाप कर्म की तरफ लगा लिया| वह अधिकतर समय उसके पास बैठा रहा| वह भोग-विलास में डूब गया और फिर घर चला गया| घर उसे पराया-सा लगा| उसकी आंखों में नींद न आई| सुबह पढ़ने के लिए गुरु आश्रम में समय पर न पहुंच सका|

पहले ही अजामल ने मंदे कर्म-दोष किए थे| एक गुरु की आज्ञा की अवज्ञा तथा दूसरा झूठ बोलना| उसने अब दो पाप और कर दिए| एक जूठन खाई और पराई नारी का गमन करना| वह वासना की ओर बढ़ गया| वेश्या का जूठा भोजन भी खा लिया| इन चारों ही महां-दोषों ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी| वह गुरु के पास जाता लेकिन मन भटकने से पाठ न कर पाता|

उसका सूझवान गुरु यह सब कुछ जान गया था लेकिन अपने मन की तसल्ली करने के लिए एक दिन अपने शिष्य अजामल के पीछे-पीछे चल पड़ा| उसने अपनी आंखों से देख लिया कि उसका बुद्धिमान शिष्य अजामल एक वेश्या के दर पर चला गया है| वह वापिस लौट आया और बहुत बैचेन रहा| अगले दिन जब अजामल आया तो गुरु ने उसे कहा-अजामल इस आश्रम से चले जाओ, तुमने जो कुछ पढ़ना था वह पढ़ लिया है| यह कह कर गुरु ने अजामल को भेज दिया| तदुपरांत गुरु ने अजामल के पिता को बुलाकर कर कहा -

'आप अजामल का विवाह कर दें| इसका अब कुंवारा रहना योग्य नहीं|'

अजामल का पिता राजपुरोहित था| राजपुरोहित होने के कारण उसके लिए अजामल का विवाह करना कोई मुश्किल कार्य न था| उसने शीघ्र ही अजामल के लिए योग्य कन्या देखकर उसे परिणय सूत्र में बांध दिया|

अजामल का विवाह हो गया| उसके घर एक सुन्दर, सुशील, गुणवंती तथा तेजवान दुल्हन आ गई| लेकिन अजामल का मन अब भी चंचल ही रहा| वह अपनी पत्नी से तृप्त न हुआ| वह वेश्या के द्वार पर फिर जाने लग गया| परन्तु उसका वेश्या के पास जाना छिपा न रह सका| इसका सब को पता चल गया| उसकी धर्मपत्नी ने काफी यत्न किए कि वह उसके पास ही रहे| सोलह श्रृंगार भी किए, नृत्य तथा संगीत से उसे प्रसन्न करने का प्रयास किया लेकिन अजामल का मन पापी ही रहा| वेश्या की जूठन और शराब ने उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था| उसकी सत्यवंती पत्नी अनेक प्रयास करके हार गई|

एक दिन अजामल का पिता परलोक गमन कर गया| उसके पश्चात राजा ने अजामल को राजपुरोहित बना दिया| राजपुरोहित बनने पर उसकी जिम्मेदारी और बढ़ गई| वह धर्म, समाज और राज्य का अध्यक्ष बन गया| धन-दौलत काफी बढ़ गई| किसी बात की कमी न रही, तब भी उसने न सोचा| वह सोचता भी कैसे? पांच दोष उसके ऊपर लग गए थे| गुरु की आज्ञा की अवज्ञा| झूठ बोलना| जूठन खानी और मदिरापान| पांचवा महान दोष-वेश्या का गमन करना था|

उसने उच्च पदवी मिलने पर भी वेश्या के पास जाना न छोड़ा| शहर में आम चर्चा होने लगी| जो बात छिपी थी, वह दुनिया में जाहिर हो गई, जाहिर भी सूर्य की तरह हुई| उसका नया प्यार एक कलावंती वेश्या से हो गया| वह पापों की पुतली माया रूप धारण कर बैठी थी|

एक दिन अजामल को राजा ने अपने पास बुलाया और पूछा-अजामल! 'आप राजपुरोहित हैं|'

हां, महाराज! अजामल ने कहा|

आपके विरुद्ध एक आरोप लगा है|

'क्या आरोप है?'

'आप कलावंती वेश्या के पास जाते हैं| मदिरा पान करके रंगरलियां मनाते हैं|'

'सत्य है महाराज, इसमें झूठ नहीं| मैं कलावंती के पास जाता हूं, क्योंकि मैं उससे प्रेम करता हूं|'

'क्या यह नहीं मालूम कि कोई भी पंडित कभी ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जिससे राज्य में बदनामी का कारण बने और जिसका देश की प्रजा पर बुरा असर पड़े?'

'यह भी पता है महाराज|'

'फिर कलावंती के पास क्यों जाते हो? क्या तुम ने अपनी ही बदनामी स्वयं नहीं सुनी?'

'सुनी है! लेकिन मैं विवश हूं| मैं कलावंती को छोड़ नहीं सकता| उसके रूप ने मुझे मोह लिया है|'

अजामल और आगे बढ़ गया| वह 'निर्लज्ज' भी हो गया, क्योंकि जिसके पास निर्लज्जता आ गए उसके पास कुछ भी नहीं रहता| निर्लज्जता सबसे महान दोष या पाप है|

राजा बुद्धिमान था| उसकी आयु अजामल के पिता जितनी थी| वह जान गया कि उसका राजपुरोहित पापों का भागीदार बन गया है| पाप इसको अच्छे लग रहे हैं| उसने अजामल से कहा - 'यदि आप की बात सही है कि वह आपको अपना पति स्वीकार कर चुकी है तो उसे अपने घर ले आओ, घर रहेगी तो लोगों को पता नहीं चलेगा| जितनी देर वहां रहेगी उतनी देर वेश्या है| कर्म करना भी स्थान की जांच करता है| जगह पर ही हर चीज़ की शोभा होती है| आप भी राज पुरोहित है| राज पुरोहित को शोभा नहीं देता कि वह वेश्या के बाजार में जाए|'

'मैं उसको घर नहीं ला सकता, न ही मैं उसको छोड़ सकता हूं| अजामल ने अपना फैसला दे दिया|'

'यह पक्का फैसला है?' राजा ने पूछा|

'जी हां पक्का फैसला!'

'सोच लो!'

'जी सोच लिया है!'

'देखो अजामल! आज तो नहीं, अभी से तुम राज पुरोहित नहीं! खामियां यह हैं! गुरु की आज्ञा को भंग करना, झूठ बोलना| जूठ खानी, वेश्या गमन, शराब पीनी और निर्लज्जता से मंद कर्मों से रुकने से मना करना| ऐसे दोषों के रहते हुए आप राज पुरोहित रहने के अधिकारी नही| आपको अब शहर से बाहर रहना पड़ेगा| सारी जायदाद और राज महल जो है वह अब आपकी पत्नी और उसके बच्चे को दे दिया जाएगा| आज के बाद इस शहर में मत आना| कलावंती को भी इस शहर से बाहर निकाल दिया जाता है| यह हुक्म है, कोई अपील नहीं न कोई साधन जाओ!'

राजा के हुक्म को सुन कर राज दरबारी और अहलकार सब घबरा गए, लेकिन अजामल पर कोई असर न हुआ| उस समय राजदूतों ने अजामल को धक्के मार कर बाहर निकाल दिया| उसको शहर से बाहर निकालने का हुक्म हो गया|

अजामल की पत्नी ने जब यह हुक्म सुना तो वह बहुत दुखी हुई| पर राजा ने हुक्म को टालना भी कठिन था| नगर वासी भी हैरान हुए| पर अजामल को कोई रोक नस सका|

अजामल ने कलावंती को साथ लेकर शहर से बाहर झोंपड़ी बना ली| कलावंती का सारा सामान वहां गया! गरीबों और अछूतों में रहने लगे| रात दिन भोग-विलास में लगे रहे तो चार बच्चे हो गए| उन बच्चों के लिए अन्न वस्त्र की जरूरत थी| राजा का हुक्म था कि कोई मदद न करें| सभी उसको 'अजामल-पापी' कहने लग पड़े थे और वे चिड़िया-पक्षी मार कर खाने लगे! नंगे रहने लगे| दुर्दशा इतनी बुरी हो गई कि वह पागलों की तरह खीझ कर बात करने लग गया| शरीर रोगी हो गया| ऐसा रोगी की जीवन की उम्मीद कम हो गई| जब शरीर ऐसा हुआ उससे पहले सात पुत्र हो गए| सातवें पुत्र का नाम नारायण रखा| जैसे भाई गुरदास जी फरमाते हैं : -

पतित अजामल पाप करि जाइ कलावतनी दे रहिआ |
गुर ते बेमुख होइ कै पाप कमावै दुरमति दहिआ |
बिरथा जनमु गवाइअनु भवजल अंदर फिरदा वहिआ |
छिअ पुत जाऐ वेसना पापां दे फल इछे लहिआ |
पुत उपंना सतवां नाऊं धरन नो चिति उमहिआ |
गुरु दुआरै जाइ कै गुरमुखि नाउं नराइण कहिआ |

उसने सातवें पुत्र का नाम नारायण रख लिया| दुखी होने लगा| वह पापों और दुखों का एक पुतला बन गया| वह सुबह जंगल को चला जाता और शाम को शिकार करके वापस आ जाता| कलावंती अब एक भारी गृहिणी थी| सात बच्चों की मां थी, और रूप भी अब ढल गया था| वह दुखी होने लगी|

स्त्री-पुरुष का यह स्वभाव है, जब दुःख-कष्ट तन को आए तो भगवान या नेकी याद आती है| कलावंती को अब पछतावा होने लगा कि उसने एक उच्च ब्राह्मण का जीवन नष्ट किया और अपना भी| पापिन बनी| अगर राजा से क्षमा मांग लेती तो इतना कष्ट न पाती| झौंपड़ी के पास से कोई साधू-संतों की तरफ देखती रहती|

एक दिन देवनेत के साथ समय बन गया कि दो साधू उसकी झौंपड़ी के पास ठहर गए| वह महापुरुष बहुत सूझवान थे| भगवान रूप! मगर कलावंती के पास कुछ नहीं था, जो उनको खाने को देती| वह वैष्णव साधू थे| अजामल शाम को घर आया| वह चिड़िया, बटेर और कबूतर आदि मार कर लाया तो कलावंती ने उस दिन उसको बनाने न दिए| उसने कहा-हे पति देव! पहले ही पता नहीं किस कुकर्म के बदले यह दशा हुई है| हमें आज मांस नहीं बनाना चाहिए| साधू वैष्णव हैं| हो सकता है कि कोई अच्छा वचन कर जाएं तो हमारे जीवन में कोई सुख का समय आ जाए| सुना है साधू भगवान के भक्त होते हैं|

अजामल-'हे प्रियतमा! बात तो आपकी ठीक है, पर हम क्या खाएं और इनको क्या दें| मेहमान हैं| घर आए अतिथि को भोजन न देना भी तो घोर पाप है|

कलावंती-यह बात तो ठीक है| इनको खाने के लिए क्या दें| हां, कुछ दाने हैं भूने हुए और गुड़ भी है| वह ही दें दे| आप भी मुठ्ठी-मुठ्ठी चबाकर संतोष से रात बिता लें! सुबह जो होगा देखा जाएगा|

अजामल-बात ठीक है| ऐसा ही करो|

दम्पति ने भूने हुए दाने और गुड़ साधुओं को खाने के लिए दिए| अनुरोध किया, 'महाराज! हमारे पास तो यही कुछ है| हम गरीब और पापी हैं| कृपा करो! दया करो! हे महाराज! हमारे लिए भगवान से प्रार्थना करो!

भगवान रूप साधू ने वचन किया-'हे अजामल! त्रिकाल दृष्टि द्वारा हम सब जान गए हैं| आप ब्राह्मण के पुत्र थे, वासना की अग्नि ने आप की बुद्धि सब भस्म कर दी, ठीक है पर जल्दी ही आपका कल्याण होगा| जो आपने अपने पुत्र का नाम 'नारायण' रखा है यह भगवान की प्रेरणा है| इसके साथ प्यार किया करो| नारायण! नारायण! पुकारो| एक दिन अवश्य नारायण आप की पुकार सुन लेंगे|'

ये वचन करके सुबह वह वहां से चले गए| अजामल ने अपने पुत्र को उठा लिया और उससे प्यार करता हुआ कहने लगा-'पुत्र नारायण! आओ बेटा नारायण| रोटी खाओ नारायण! दूध पीओ नारायण!' ऐसी बातें करने लगा| उसकी बातें उसके मन को शांति देने लगी|

कुछ ऐसी प्रभु की लीला हुई, वह जो शिकार मार कर लाता वही बिक जाता| जिससे उसको पैसे मिल जाते इस तरह उसे अन्न खाने को मिलने लगा| उसके दिन अब अच्छे व्यतीत होने लगे| वह झौंपड़ी में रह कर भी सुख महसूस करने लगा|

काल महाबली है| काल की मार से कोई नहीं बचता जो दिखाई देता है, सब नाशवान है सब के काम अधूरे रह जाते हैं जब काल आता है| काल का भारी हाथ सब के सिर के ऊपर रखा जाता है| अजामल का भी काल आ गया| वह बीमार पड़ गया और बिमारी भी उसको कष्ट देने वाली| वह कष्टदायक बीमारी से दुखी होने लगा| एक दिन ऐसा आया जब आंखें बन्द करते ही यमदूत भी नजर आने लगे| नरक की आग जलती हुई दिखाई देने लगी, वह बहुत भयानक रूप में थी, उसकी दशा बहुत डरावनी थी! नरक की झांकी व अंतकाल नजदीक नज़र आया देखकर उसने बहुत ऊंची-ऊंची पुकारा-'नारायण आओ! नारायण आओ!

अजामल पापी ने आवाज़ तो अपने पुत्र को दी परन्तु पुत्र शब्द का इस्तेमाल न किया! सत्य ही उसका कल्याण हो गया जैसे ही उसने 'नारायण' कहा वैसे ही धर्मराज के यमदूत भी पीछे हट गए| अचानक रोशनी हुई| नाद शंख बजे| इधर आत्मा ने शरीर छोड़ा, उधर से फूलों की वर्षा हुई| अजामल की आत्मा स्वर्ग में चली गई| नारायण कहने से पापी का कल्याण हो गया| इस संबंध में चौथे पातशाह का वचन है :-

अजामल प्रीति पुत्र प्रति कीनी करि नाराइण बोलारे ||
मेरे ठाकुर कै मनि भाइ भावणी जम कंकर मारि बिदारे ||

Friday, 8 December 2017

साखी पिंगला की

ॐ साँई राम जी



साखी पिंगला की

अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गऐ हरि कै पासि ||

उपरोक्त तुक में भक्त रविदास जी ने कथन किया है कि अजामल, पिंगला और हाथी जैसे हरि परमात्मा के पास चले गए| हरि परमात्मा सब भक्तों को शरण देता है| जो उसका नाम जपता है; उसको याद करता है प्रभु उसी को अपने चरणों में लगाता है क्योंकि आत्मा और परमात्मा में माया की जुदाई है| माया भेद कर के ही वह परमात्मा से बिछुड़ा है| जब माया का अम्बार दूर हो जाता है तो ज्ञान आ जाता है और खुद ही आत्मा परमात्मा से घुल-मिल जाती है| बाहर क्यों रहते हैं? जुदाई क्यों पैदा होती है? इसका उत्तर है कि उनको ज्ञान प्राप्त नहीं होता| ज्ञान क्यों नहीं होता? क्योंकि उसने गुरु धारण नहीं किया होता| गुरु पर भरोसा न होने के कारण है|

सच्चे सतिगुरु के बिना आल जंजाल माया के चमत्कारों में फंसे रहते हैं| विमुख या समक्ष रहते हैं ऐसे पुरुषों का कभी कल्याण नहीं होता वह विमुख होते हैं| उनका नेकी की ओर ध्यान नहीं होता| जब नेकी, सत्य, धर्म, कर्म, भक्ति की ओर ध्यान नहीं और वह यदि ईश्वर का भय नहीं रखते तब कैसे उनका कल्याण हो सकता है? कभी नहीं होता चाहे कहीं घूमते रहें|


गंगा जमन गोदावरी कुलखेत सिधारे |
मथुरा माइआ अजुधिआ काशी केदारे |
गइआ पिराग सुरसवती गोतमी दुआरे |
जप तप संजम होम जगि सभ देव जुहारे |
अखीं परणै जे भवै तिहु लोइ मझारे |
मूलि न उतरै हतिआ बेमुख गुरदुआरे |

जब तक आत्मा पवित्र न हो, तब तक धर्म, कर्म, पूजा-पाठ और तीर्थ पर जाना लाभदायक नहीं होता| गुरु की शरण में जाएं| पिंगला उसी तरह का जीवन था जिस तरह भाई गुरदास जी फरमाते हैं:-


नारि भतारहुं बाहरी सुखि सेज न चड़ीऐ |
पुत न मंनै मापिआं कमजातीं वड़ीऐ |

पिंगला भरी जवानी में थी, पर एक पति के बिना वह कभी सुख की सेज नहीं सोई| उसके ग्राहक आते थे, वह भी विभिन्न स्वभाव के होते थे| कोई शराबी, कोई भंगी-नशेड़ी, पर उसने तो सब का स्वागत करना था| ऐसी दशा में धर्मप्रिय की नगरी में रहती थी| जब वह बाहर जाती तो गृहस्थ औरतें उसकी तरफ घूर-घूर कर देखतीं, वह सदा उनसे घृणा करती थी| उसके पास अत्यन्त धन होने के बावजूद भी समाज और धार्मिक स्थल पर सम्मान न होता| उसको एक अछूत तथा एक कोढ़ गिना जाता लेकिन मंद कर्मी पुरुष उसको आंखों पर बैठाते|

एक समय वह बाहर घूमने निकली| वह जब राजा की ओर से बनाए सरोवर के पास पहुंची तो वहां एक महात्मा नारी की महानता और पतिव्रता धर्म का उपदेश दे रहा था| सैकड़ों स्त्री-पुरुष एकाग्रचित ध्यान लगा कर उपदेश सुन रहे थे| उनका ध्यान कथा भाव के साथ जुड़ा हुआ था!
महात्मा उपदेश कर रहा था कि नारी का धर्म पति की सेवा करना है, वह भी एकाग्रचित होकर और घर गृहस्थी को चलाना क्योंकि घर गृहस्थी और नारी जगत उत्पति का मूल है| नारी की सूजना इसलिए की गई है| लेकिन यदि नारी एक पति की सेवा नहीं करती एक के भरोसे पर नहीं रहती और पराए पुरुष के पीछे भटकती फिरती है तो वह नारी एक डायन बन जाती है| इसलिए नारी को पतिव्रता रहना चाहिए|

ऐसा उपदेश जब हो रहा था तो पिंगला ने भी सुन लिया, वह कभी मन्दिर, कथा कीर्तन स्थान के पास कभी खड़ी नहीं होती थी पर उस समय उसके मन में आ गया, वह खड़ी हो गई और महात्मा का उपदेश वरदान की तरह हृदय को छू गया| वह खड़ी रही| आगे का उपदेश वरदान की तरह हृदय को छू गया| वह खड़ी रही| आगे उसके पांव न चले| उसको ऐसा महसूस हुआ कि सच्ची बातों का उपदेश उसको दिया जा रहा था| वह उपदेश सुन रही थी|

महात्मा जब उपदेश करके रुके तो उसने आगे बढ़ कर महात्मा के चरणों को छू कर विनम्रता से प्रार्थना की-'महाराज! मैं एक वेश्या हूं, हर रात तन बेचती और मूल्य लेती हूं, नाचती और गाती हूं, मदिरापान भी करती हूं! जो भी पुरुष आता है उससे झूठ बोल कर कहती हूं, 'मैं तुम्हारी हूं| तुम्हें ही प्यार करती हूं| और किसी को प्यार नहीं करती|' होता झूठ है, झूठ के साथ जूठन भी खानी पड़ती है, बताएं ऐसे कुकर्म करने वालों का भी कभी कल्याण हो सकता है?

महात्मा ने पिंगला की बात को ध्यान से सुना| उसकी और देखकर उसके चेहरे और उसकी आंखों और हृदय की बात जानने का विचार किया| उस समय उसको उत्तर दिया -'हां देवी! तेरा भी कल्याण हो सकता है| केवल मन बदलने की जरूरत है| बुरे कामों से निकल कर स्नान करके अच्छे वस्त्र पहनने की आवश्यकता है| ऐसा कर लो तो ईश्वर प्रसन्न होगा| धन पदार्थ तो ईश्वर के हैं| यह लीला है जो होती रहती है| हर एक जीव आत्मा अमलों के कारण ही तो पवित्र है, वह जैसे वातावरण से निकलती है वैसा ही रंग ले लेती है और कोई बात नहीं|'

पिंगला - 'कीचड़ में से कैसे निकलूं, मैं तो दलदल तक फंसी हूं|'

महात्मा - 'यत्न करने की आवश्यकता है| मन पर काबू पा सको तो|

पिंगला - जैसे आप बताएंगे वैसा ही करूंगी| आपको गुरु धारण करती हूं| 'आज्ञा करें|'

यह कह कर पिंगला ने महात्मा के चरण पकड़ लिए|

महात्मा ने उसकी पसीजी आत्मा की ओर देखा और कहा - 'देवी! एक पर्ण करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है|'

पिंगला - 'आज्ञा करें महाराज|'

महात्मा - 'वचन का पालन करोगी?'

पिंगला - 'महाराज! जीवन भर आपकी आज्ञा का पालन करूंगी, मेरा मन कह रहा है|'

महात्मा - 'देख, तेरे जीवन का वातावरण ऐसा है, गृहस्थ धर्म ग्रहण करो| एक पति की पूजा करो| पति प्यार और श्रद्धा से तेरा कल्याण हो जाएगा|'

पिंगला - 'पति मेरा कोई नहीं, विवाह मेरे साथ कौन करेगा? मैं कैसे तपस्या करूंगी?'

महात्मा - 'जो पुरुष तुम्हारे पास पहले आए, उसको पति मान ले और उसकी सेवा करती रहना अन्य किसी के पास तन भेंट मत करना, उसी से तुम्हारी मुक्ति होगी|

पिंगला - 'आप ने मुझे ज्ञान दिया है, मेरे गुरु बने हैं, क्या मैं अपनी सारी दौलत आपको अर्पण कर सकती हूं? सारी दौलत किस काम की|'

महात्मा - 'जो कुछ तेरे पास है, वह अपने पास ही रखो, धन-पूंजी रखो| जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा|'

इस तरह उपदेश लेकर पिंगला अपने घर आ गई| उसको ऐसा लगा जैसे उसका शरीर और दिल-दिमाग हल्का हो गया हो| घर आई तो हर वस्तु उसको पराई और नई-नई लगी| उस शाम को उसने स्नान किया| नए वस्त्र पहने और तैयार होकर बैठ गई| महात्मा की बात पर अमल करना था, जो पुरुष पहले आए, जिस के साथ मेल हो, उसको अपना पति मान ले| उसके बगैर किसी और के नजदीक न जाए|

एक पुरुष आया, वह जवान था और घर से भी अच्छा था| उसके आने पर उसने घर के दरवाजे बंद कर लिए और उसको कहा, 'देखो प्रिय! मैंने फैसला किया है, एक पुरुष के बगैर किसी अन्य के निकट नहीं जाऊंगी, आप मेरा साथ देंगे तो मैं आपकी ही रहूंगी और आप मेरे, ऐसा ही करना होगा|'

'....यदि ऐसा हो जाए तो और क्या चाहिए, मैं तो आपका प्रेमी हूं| जान देने को तैयार हूं|' पुरुष ने उत्तर दिया|

यह बात सुन कर पिंगला खुश हो गई और उसने अपना तन और मन उस पुरुष के हवाले कर दिया| उसके बाद किसी अन्य पुरुष के पास न गई, नाचगान सब कुछ एक पुरुष के लिए हो गया| इस प्रकार कई साल बीत गए| लोग पिंगला की बैठक को भूल गए| और वह एक गृहिणी बन गई, उसकी रूचि बदल गई| उसने मदिरा पान छोड़ दिया| वह धर्म-कर्म की और बढ़ गई| प्यारा पति आता तो उसकी सेवा करती और उसका दिया खाती और किसी के हाथ का खाना ज़हर समझती| कहते हैं इस तरह बारह साल बीत गए| वह एक पुरुष की दासी रही| उसकी भक्ति देखकर लोग हैरान हो गए| उसके प्रेमी ने विवाह न किया और वह मर गया| फिर जो पुरुष पहले आता उसी को पति मानती.... पर उसकी मूल मंशा पूरी न हुई|

एक दिन भगवान विष्णु ने उसकी परीक्षा लेकर उसका कल्याण के लिए मार्ग ढूंढा| उसका धर्म देखने और महात्मा के वचनों पर कितना चली है परीक्षा लेने आए भगवान विष्णु|

शाम हुई तो भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पिंगला की बैठक पर आ गए| पिंगला ने उनका स्वागत किया| चरणों को धोया| हालचाल पूछा और आदर से बिठाया| पहले उनके चरण दबाए| जब उसके मन की इच्छा पूर्ण करने का विचार आया तो वह बीमार हो गया| उसको हैजा हो गया| टट्टियां आने लगी और दसतों का रूप धारण करके और भी हालत बिगड़ गई| पिंगला सेवा करती रही| रात भर जरा भी आराम न किया परन्तु माथे पर बल न आया| एक पतिव्रता स्त्री की तरह खिले माथे सेवा करती रही| सुबह होते ही वह ब्राह्मण मर गया| उसके मरने पर रोने लगी| बाजार वाले हैरान हुए| किसी ने कुछ कहा| पर उसने कोई बात न सुनी| उसने अपने पास से ब्राह्मण की चिता का प्रबन्ध किया| हाथ में सधौरा लेकर साथ ही सती होने के लिए तैयार हो गई| जब लोगों ने रोका तब भी न रुकी| तब भगवान विष्णु ने अपना हाथ छोड़ दिया और वह उस चिता से उठ खड़े हुए| वह विष्णु रूप ब्राह्मण जीवित हो गया| लोग काफी हैरान हुए| पिंगला खुश हो गई| उस समय वह ब्राहमण विष्णु का रूप हो गया| शंखों की धुन अपने आप प्रगट हुई| सभी लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए| विष्णु ने पिंगला को कहा - 'धन्य है देवी! मांग लो जो मांगना है| तेरी भक्ति प्रवान हुई|'

पिंगला भगवान विष्णु के चरणों में झुक गई| उसने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि, 'महाराज! कोई इच्छा नहीं| बस पापिन का कल्याण हो|'

यह सुन कर विष्णु जी बहुत खुश हुए और उन्होंने कहा, 'तथास्तु' तेरी इच्छा पूर्ण होगी| बाकी जीवन उसने भक्ति में गुजारा और अंतकाल वह स्वर्ग में गई|

इस कथा का संक्षेप भाव है कि जो भी मंद कर्मी जब किसी नेक पुरुष, गुरु पीर का उपदेश ग्रहण कर अपना जीवन बदल लेता है, उसका कल्याण होता है| जगत में यश होता है|

Thursday, 7 December 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 21

ॐ सांई राम



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आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है 

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है



श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 21

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श्री. व्ही. एच. ठाकुर, अनंतराव पाटणकर और पंढ़रपुर के वकील की कथाएँ

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इस अध्याय में हेमाडपंत ने श्री विनायक हिश्चन्द्र ठाकुर, बी. ए., श्री. अनंतराव पाटणकर, पुणे निवासी तथा पंढरपुर के एक वकील की कथाओं का वर्णन किया है । ये सब कथाएँ अति मनोरंजक है । यदि इनका साराँश मननपूर्वक ग्रहण कर उन्हें आचरण में लाया जाय तो आध्यात्मिक पंथ पर पाठकगण अवश्य अग्रसर होंगें ।


प्रारम्भ
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यह एक साधारण-सा नियम है कि गत जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरुप ही हमें संतों का स्न्ध्य और उनकी कृपा प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ हेमाडपंत स्वयं अपनी घटना प्रस्तुत करते है । वे अनेक वर्षों तक बम्बई के उपनगर बांद्रा के स्थानीय न्यायाधीश रहे । पीर मौलाना नामक एक मुस्लिम संत भी वहीं निवास करते थे । उनके दर्शनार्थ अनेक हिन्दू, पारसी और अन्य धर्मावलंबी वहाँ जाया करते थे । उनके मुजावर (पुजारी) ने हेमाडपंत से भी उलका दर्शन करने के लिये बहुत आग्रह किया, परन्तु किसी न किसी कारण वश उनकी भेंट उनसे न हो सकी । अनेक वर्षों के उपरान्त जब उनका शुभ काल आया, तब वे शिरडी पहुँचे और बाबा के दरबार में जाकर स्थायी रुप से सम्मिलित हो गए । भाग्यहीनों को संतसमागम की प्राप्ति कैसे हो सकती है । केवल वे ही सौभाग्यशाली हे, जिन्हें ऐसा अवसर प्राप्त हो ।


संतों द्घारा लोकशिक्षा
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संतों द्घारा लोकशिक्षा का कार्य चिरकाल से ही इस विश्व में संपादित होता आया है । अनेकों संत भिन्न-भिन्न स्थानों पर किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिये स्वयं प्रगट होते है । यघपि उनका कार्यस्थल भिन्न होता है, परन्तु वे सब पूर्णतः एक ही है । वे सब उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की संचालनशक्ति के अंतर्गत एक ही लहर में कार्य करते है । उन्हें प्रत्येक के कार्य का परस्पर ज्ञान रहता है और आवश्यकतानुसार परस्पर कमी की पूर्ति करते है, जो निम्नलिखित घटना द्घारा स्पष्ट है ।

श्री. ठाकुर
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श्री. व्ही. एच. ठाकुर, बी. ए. रेव्हेन्यू विभाग में एक कर्मचारी थे । वे एक समय भूमिमापक दल के साथ कार्य करते हुए बेलगाँव के समीप वडगाँव नामक ग्राम में पहुँचे । वहाँ उन्होंने एक कानड़ी संत पुरुष (आप्पा) के दर्शन कर उनकी चरण वन्दना की । वे अपने भक्तों को निश्चलदासकृत विचार-सागर नामक ग्रंथ (जो वेदान्त के विषय में है) का भावार्थ समझा रहे थे । जब श्री. ठाकुर उनसे विदाई लेने लगे तो उन्होंने कहा, तुम्हें इस ग्रंथ का अध्ययन अवश्य करना चाहिये और ऐसा करने से तुम्हारी इच्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी तथा जब कार्य करते-करते कालान्तर में तुम उत्तर दिशा में जाओगे तो सौभाग्यवश तुम्हारी एक महान् संत से भेंट होगी, जो मार्ग-पर्दर्शन कर तुम्हारे हृदय को शांति और सुख प्रदान करेंगे । बाद में उनका स्थानांतरण जुन्नर को हो गया, जहाँ कि नाणेघाट पार करके जाना पड़ता था । यह घाट अधिक गहरा और पार करने में कठिन था । इसलिये उन्हें भैंसे की सवारी कर घाट पार करना पड़ा, जो उन्हें अधिक असुविधाजनक तथा कष्टकर प्रतीत हुआ । इसके पश्चात् ही उनका स्थानांतरण कल्याण में एक उच्च पद पर हो गया और वहाँ उनका नानासाहेब चाँदोरकर से परिचय हो गया । उनके द्घारा उन्हें श्री साईबाबा के संबंध में बहुत कुछ ज्ञात हुआ और उन्हें उनके दर्शन की तीव्र उत्कण्ठा हुई । दूसरे दिन ही नानासाहेब शिरडी को प्रस्थान कर रहे थे । उन्होंने श्री. ठाकुर से भी अपने साथ चलने का आग्रह किया । ठाणे के दीवानी-न्यायालय में एक मुकदमे के संबंध में उनकी उपस्थिति आवश्यक होने के कारण वे उनके साथ न जा सके । इस कारण नानासाहेब अकेले ही रवाना हो गये । ठाणे पहुँचने पर मुकदमे की तारीख आगे के लिए बढ़ गई । इसलिए उन्हें ज्ञात हुआ कि नानासाहेब पिछले दिन ही यहाँ से चले गये है । वे अपने कुछ मित्रों के साथ, जो उन्हें वहीं मिल गये थे, श्री साईबाबा के दर्शन को गए । उन्होंने बाबा के दर्शन किये और उनके चरणकमलों की आराधना कर अत्यन्त हर्षित हुए । उन्हें रोमांच हो आया और उनकी आँखों से अश्रुधाराएँ प्रवाहित होने लगी । त्रिकालदर्शी बाबा ने उनसे कहा – इस स्थान का मार्ग इतना सुमा नही, जितना कि कानड़ी संत अप्पा के उपदेश या नाणेघाट पर भैंसे की सवारी थी । आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिये तुम्हें घोर परिश्रम करना पडेगा, क्योंकि वह अत्यन्त कठिन पथ है । जब श्री. ठाकुर ने हेतुगर्भ शब्द सुने, जिनका अर्थ उनके अतिरिक्त और कोई न जानता था तो उनके हर्ष का पारावार न रहा और उन्हें कानड़ी संत के वचनों की स्मृति हो आई । तब उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बाबा के चरणों पर अपना मस्तक रखा और उनसे प्रार्थना की कि प्रभु, मुझ पर कृपा करो और इस अनाथ को अपने चरण कमलों की शीतलछाया में स्थान दो । तब बाबा बोले, जो कुछ अप्पा ने कहा, वह सत्य था । उसका अभ्यास कर उसके अनुसार ही तुम्हें आचरण करना चाहिये । व्यर्थ बैठने से कुछ लाभ न होगा । जो कुछ तुम पठन करते हो, उसको आचरण में भी लाओ, अन्यथा उसका उपयोग ही क्या । गुरु कृपा के बिना ग्रंथावलोकन तथा आत्मानुभूति निरर्थक ही है । श्री. ठाकुर ने अभी तक केवल विचार सागर ग्रन्थ में सैद्घांतिक प्रकरण ही पढ़ा था, परन्तु उसकी प्रत्यक्ष व्यवहार प्रणाली तो उन्हें शिरडी में ही ज्ञात हुई । एक दूसरी कथा भी इस सत्य का और अधिक सशक्त प्रमाण है ।

श्री. अनंतराव पाटणकर
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पूना के एक महाशय, श्री. अनंतराव पाटणकर श्री साईबाबा के दर्शनों के इच्छुक थे । उन्होंने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किये । दर्शनों से उनके नेत्र शीतल हो गये और वे अति प्रसन्न हुए । उन्होंने बाबा के श्री चरण छुए और यथायोग्य पूजन करने के उपरान्त बोले, मैंने बहुत कुछ पठन किया । वेद, वेदान्त और उपनिषदों का भी अध्ययन किया तथा अन्य पुराण भी श्रवण किये, फिर भी मुझे शान्ति न मिल सकी । इसलिये मेरा पठन व्यर्थ ही सिदृ हुआ । एक निरा अज्ञानी भक्त मुझसे कहीं श्रेष्ठ है । जब तक मन को शांति नहीं मिलती, तब तक ग्रन्थावलोकन व्यर्थ ही है । मैंने ऐसा सुना है कि आप केवल अपनी दृष्टि मात्र से और विनोदपूर्ण वचनों द्घारा दूसरों के मन को सरलतापूर्वक शान्ति प्रदान कर देते है । यही सुनकर मैं भी यहाँ आया हूँ । कृपा कर मुझ दास को भी आर्शीवाद दीजिये ।

ततब बाबा ने निम्नलिखित कथा कही - घोड़ी की लीद के नो गोले (नवधा भक्ति) ...

एक समय एक सौदागर यहाँ आया । उसके सम्मुख ही एक घोड़ी ने लीद की । जिज्ञासु सौदागर ने अपनी धोती का एक छोर बिछाकर उसमें लीद के नौ गोले रख लिये और इस प्रकार उसके चित्त को शांति पत्राप्त हुई । श्री. पाटणकर इस कथा का कुछ भी अर्थ न समझ सके । इसलिये उन्होंने श्री. गणेश दामोदर उपनाम दादा केलकर से अर्थ समझाने की प्रार्थना की और पूछा कि बाबा के कहने का अभिप्राय क्या है । वे बोले कि जो कुछ बाबा कहते है, उसे मैं स्वयं भी अच्छी तरह नहीं समझ सकता, परंतु उनकी प्रेरणा से ही मैं जो कुछ समझ सका हूँ, वह तुम से कहता हूँ । घोड़ी है ईश-कृपा, और नौ एकत्रित गोले है नवविधा भक्ति-यथा –

1. श्रवण
2. कीर्तन
3. नामस्मरण
4. पादसेवन
5. अर्चन
6. वन्दन
7. दास्य या दासता
8. सख्यता और
9. आत्मनिवेदन ।

ये भक्ति के नौ प्रकार है । इनमें से यदि एक को भी सत्यता से कार्यरुप में लाया जाय तो भगववान श्रीहरि अति प्रसन्न होकर भक्त के घर प्रगट हो जायेंगे । समस्त साधनाये अर्थात् जप, तप, योगाभ्यास तथा वेदों के पठन-पाठन में जब तक भक्ति का समपुट न हो, बिल्कुल शुष्क ही है । वेदज्ञानी या व्रहमज्ञानी की कीर्ति भक्तिभाव के अभाव में निरर्थक है । आवश्यकता है तो केवल पूर्ण भक्ति की । अपने को भी उसी सौदागर के समान ही जानकर और व्यग्रता तथा उत्सुकतापूर्वक सत्य की खोज कर नौ प्रकार की भक्ति को प्राप्त करो । तब कहीं तुम्हें दृढ़ता तथा मानसिक शांति प्राप्त होगी । दूसरे दिन जब श्री. पाटणकर बाबा को प्रणाम करने गये तो बाबा ने पूछा कि क्या तुमने लीद के नौ गोले एकत्रित किये । उन्होंने कहा कि मैं अनाश्रित हूँ । आपकी कृपा के बिना उन्हें सरलतापूर्वक एकत्रित करना संभव नहीं है । बाबा ने उन्हें आर्शीवाद देकर सांत्वना दी कि तुम्हें सुख और शांति प्राप्त हो जायेगी, जिसे सुनकर श्री. पाटणकर के हर्षे का पारावार न रहा ।

पंढ़रपुर के वकील
...................

भक्तों के दोष दूर कर, उन्हें उचित पथ पर ला देने की बाबा की त्रिकालज्ञता की एक छोटी-सी कथ का वर्णन कर इस अध्याय को समाप्त करेंगे । एक समय पंढरपुर से एक वकील शिरडी आये । उन्होंने बाबा के दर्शन कर उन्हं प्रणाम किया तथा कुछ दक्षिणा भेंट देकर एक कोने में बैठ वार्तालाप सुनने लगे । बाबा उनकी ओर देख कर कहने लगे कि लोग कितने धूर्त है, जो यहाँ आकर चरणों पर गिरते और दक्षिणा देते है, परंतु भीतर से पीठ पीछे गालियाँ देते रहते है । कितने आश्चर्य की बात है न । यह पगड़ी वकील के सिर पर ठीक बैठी और उन्हें उसे पहननी पड़ी । कोई भी इन शब्दों का अर्थ न समझ सका । परन्तु वकील साहब इसका गूढ़ार्थ समझ गये, फिर भी वे नतशिर बैठे ही रहे । वाड़े को लौटकर वकील साहब ने काकासाहेब दीक्षित को बतलाया कि बाबा ने जो कुछ उदाहरण दिया और जो मेरी ही ओर लक्ष्य कर कहा गया था, वह सत्य है । वह केवल चेतावनी ही थी कि मुझे किसी की निन्दा न करनी चाहिए । एक समय जब उपन्यायाधीश श्री. नूलकर स्वास्थ्य लाभ करने के लिये पंढरपुर से शिरडी आकर ठहरे तो बताररुम में उनके संबंध में चर्चा हो रही थी । विवाद का विषय था कि जीस व्याधि से उपन्यायाधीश अस्वस्थ है, क्या बिना औषधि सेवन किये केवल साईबाबा की शरण में जाने से ही उससे छुटकारा पाना सम्भव है । और क्या श्री. नूलकर सदृश एक शिक्षित व्यक्ति को इस मार्ग का अवलम्बन करना उचित है । उस समय नूलकर का और साथ ही श्री साईबाबा का भी बहुत उपहास किया गया । मैंने भी इस आलोचना में हाथ बँटाया था । श्री साईबाबा ने मेरे उसी दूषित आचरण पर प्रकाश डाला है । यह मेरे लिये उपहास नही, वरन् एक उपकार है, जो केवल परामर्श है कि मुझे किसी की निनदा न करनी चाहिए और न ही दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना चाहिए । शिरडी और पंढरपुर में लगभग 300 मील का अन्तर है । फिर भी बाबा ने अपनी सर्वज्ञता द्घारा जान लिया कि बाररुम में क्या चल रहा था । मार्ग में आने वाली नदियाँ, जंगल और पहाड़ उनकी सर्वज्ञता के लिये रोड़ा न थे । वे सबके हृदय की गुहृ बात जान लेते थे और उनसे कुछ छिपा न था । समीपस्थ या दूरस्थ प्रत्येक वस्तु उन्हें दिन के प्रकाश के समान जाज्वल्यमान थी तथा उनकी सर्वव्यापक दृष्टि से ओझल न थी । इस घटना से वकीलसाहब को शिक्षा मिलीकि कभी किसी का छिद्रान्वेषण एवं निंदा नहीं करनी चाहिए । यह कथा केवल वकीलसाहव को ही नहीं, वरन सबको शिक्षाप्रद है । श्री साईबाबा की महानता कोई न आँक सका और न ही उनकी अदभुत लीलाओं का अंत ही पा सका । उनकी जीवनी भी तदनुरुप ही है, क्योंकि वे परब्रहास्वरुप है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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