शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 21 January 2017

Offer dress to Saibaba Ji In Shirdi

Om Sai Ram,
Devotees who wish to offer dress to Saibaba Ji In Shirdi Or in Any Other Temple Across the World  Can place order with us.
Baba ji dress are available in all different range and colours .
Contact
Parul Sai Gauri
9818306979
www.saidivinevastras.com

मैं हूँ बालक अनाथ

ॐ सांई राम


मैं हूँ बालक अनाथ, दुनिया ने छोड़ा साथ
आजा आजा मेरे साईं नाथ साईं नाथ

उजड़ी है मेरी दुनिया, तू ही इसे बना दे
जाना कहाँ मुझे है, तू रास्ता दिखा दे
मैं हूँ बालक अनाथ, दुनिया ने छोड़ा साथ
आजा आजा मेरे साईं नाथ साईं नाथ

शिर्डी में रहने वाले, सारा जहाँ तेरा है
सब कुछ तुझे है अर्पण, कुछ भी नहीं मेरा है
मैं हूँ बालक अनाथ, दुनिया ने छोड़ा साथ
आजा आजा मेरे साईं नाथ साईं नाथ

क्यूँ जिंदगी में मेरे, छाया हुआ अँधेरा
तू ही बता दे साईं, कब आएगा सवेरा
मैं हूँ बालक अनाथ, दुनिया ने छोड़ा साथ
आजा आजा मेरे साईं नाथ साईं नाथ


===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

Friday, 20 January 2017

साईं तेरी खातिर खुद पर, कितना बोझ उठाये

ॐ सांई राम


दुःख को बोझ समझने वाले, कौन तुझे समझाये
साईं तेरी खातिर खुद पर, कितना बोझ उठाये


वो ही है तेरे प्यार का मालिक, वो ही तेरे संसार का मालिक
हैरत  से तू क्या तकता, है दीपक बुझकर जल सकता है
वो चाहे तो रात को दिन और, दिन को रात बनाये
साईं तेरी खातिर खुद पर, कितना बोझ उठाये

तन में तेरा कुछ भी नहीं है, शाम सवेरा कुछ भी नहीं है
दुनिया की हर चीज़ उधारी, सब जायेंगे बारी बारी
चार दिनों के चोले पर तू ,क्यों इतना इतराये
साईं तेरी खातिर खुद पर, कितना बोझ उठाये

देख खुला है इक दरवाज़ा, अन्दर आ कर ले अन्दाज़ा
पोथी पोथी भटकने वाले, पड़े हैं तेरी अक्ल पे ताले
कब लगते हैं हाथ किसी के, चलते फिरते साये
साईं तेरी खातिर खुद पर कितना बोझ उठाये

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

Thursday, 19 January 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 23

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 23
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योग और प्याज, शामा का सर्पविष उतारना, विषूचिका (हैजी) निवारणार्थ नियमों का उल्लंघन, गुरु भक्ति की कठिन परीक्षा ।
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प्रस्तावना
वस्तुतः मनुष्य त्रिगुणातीत (तीन गुण अर्थात् सत्व-रज-तम) है तथा माया के प्रभाव से ही उसे अपने सत्-चित-आनंद स्वरुप की विस्मृति हो, ऐसा भासित होने लगता है कि मैं शरीर हूँ । दैहिक बुद्घि के आवरण के कारण ही वह ऐसी धारणा बना लेता है कि मैं ही कर्ता और उपभोग करने वाला हूँ और इस प्रकार वह अपने को अनेक कष्टों में स्वयं फँसा लेता है । फिर उसे उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं सूझता । मुक्ति का एकमात्र उपाय है – गुरु के श्री चरणों में अचल प्रेम और भक्ति । सबसे महान् अभिनयकर्ता भगवान् साई ने भक्तों को पूर्ण आनन्द पहुँचाकर उन्हें निज-स्वरुप में परिवर्तित कर लिया है । उपयुक्त कारणों से हम साईबाबा को ईश्वर का ही अवतार मानते है । परन्तु वे सदा यही कहा करते थे कि मैं तो ईश्वर का दास हूँ । अवतार होते हुए भी मनुष्य को किस प्रकारा आचरण करना चाहिये तथा अपने वर्ण के कर्तव्यों को किस प्रकार निबाहना चाहिए, इसका उदाहरण उन्होंने लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया । उन्होंने किसी प्रकार भी दूसरे से स्पर्द्घा नहीं की और न ही किसी को कोई हानि ही पहुँचाई । जो सब जड़ और चेतन पदार्थों में ईश्वर के दर्शन करता हो, उसको विनयशीलता ही उपयुक्त थी । उन्होंने किसी की उपेक्षा या अनादर नहीं किया । वे सब प्राणियों में भगवद्दर्शन करते थे । उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मैं अनल हक्क (सोडह्मम) हूँ । वे सदा यही कहते थे कि मैं तो यादे हक्क (दासोडहम्) हूँ । अल्ला मालिक सदा उनके होठोंपर था । हम अन्य संतों से परिचित नहीं है और नन हमें यही ज्ञात है कि वे किस प्रकार आचरण किया करते है अथवा उनकी दिनचर्या इत्यादि क्या है । ईश-कृपा से केवल हमें इतना ही ज्ञात है कि वे अज्ञान और बदृ जीवों के निमित्त स्वयं अवतीर्ण होते है । शुभ कर्मों के परिणामस्वरुप ही हममें सन्तों की कथायें और लीलाये श्रवण करने की इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं । अब हम मुख्य कथा पर आते है ।

योग और प्याज
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एक समय कोई एक योगाभ्यासी नानासाहेब चाँदोरकर के साथ शिरडी आया । उसने पातंजलि योगसूत्र तथा योगशास्त्र के अन्य ग्रन्थों का विशेष अध्ययन किया था, परन्तु वह व्यावहारिक अनुभव से वंचित था । मन एकाग्र न हो सकने के कारण वह थोड़े समय के लिये भी समाधि न लगा सकता था । यदि साईबाबा की कृपा प्राप्त हो जाय तो उनसे अधिक समय तक समाधि अवस्था प्राप्त करने की विधि ज्ञात हो जायेगी, इस विचार से वह शिरडी आया और जब मसजिद में पहुँचा तो साईबाबा को प्याजसहित रोटी खाते देख उसे ऐसा विचार आया कि यह कच्च प्याजसहित सूखी रोटी खाने वाला व्यक्ति मेरी कठिनाइयों को किस प्रकार हल कर सकेगा । साईबाबा अन्तर्ज्ञान से उसका विचार जानकर तुरन्त नानासाहेब से बोले कि ओ नाना । जिसमें प्याज हजम करने की श्क्ति है, उसको ही उसे खाना चाहिए, अन्य को नहीं । इन शब्दों से अत्यन्त विस्मित होकर योगी ने साईचरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया । शुदृ और निष्कपट भाव से अपनी कठिनाइयँ बाबा के समक्ष प्रस्तुत करके उनसे उनका हल प्राप्त किया और इस प्रकार संतुष्ट और सुखी होकर बाबा के दर्शन और उदी लेकर वह शिरडी से चला गया ।

शामा की सर्पदंश से मुक्ति
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कथा प्रारंभ करने से पूर्व हेमाडपंत लिखते है कि जीव की तुलना पालतू तोते से की जा सकती है, क्योंकि दोनों ही बदृ है । एक शरीर में तो दूसरा पिंजड़े में । दोनों ही अपनी बद्घावस्था को श्रेयस्कर समझते है । परन्तु यदि हरिकृपा से उन्हें कोई उत्तम गुरु मिल जाय और वह उनके ज्ञानचक्षु खोलकर उन्हें बंधन मुक्त कर दे तो उनके जीवन का स्तर उच्च हो जाता है, जिसकी तुलना में पूर्व संकीर्ण स्थिति सर्वथा तुच्छ ही थी ।
गत अध्यया में किस प्रकार श्री. मिरीकर पर आने वाले संकट की पूर्वसूचना देकर उन्हें उससे बचाया गया, इसका वर्णन किया जा चुका है । पाठकवृन्द अब उसी प्रकार की और एक कथा श्रवण करें ।
एक बार शामा को विषधर सर्प ने उसके हाथ की उँगली में डस लिया । समस्त शरीर में विष का प्रसार हो जाने के कारण वे अत्यन्त कष्ट का अनुभव करके क्रंदन करने लगे कि अब मेरा अन्तकाल समीप आ गया है । उनके इष्ट मित्र उन्हें भगवान विठोबा के पास ले जाना चाहते थे, जहाँ इस प्रकार की समस्त पीड़ाओं की योग्य चिकित्सा होती है, परन्तु शामा मसजिद की ओर ही दौड़-अपने विठोबा श्री साईबाबा के पास । जब बाबा ने उन्हें दूर से आते देखा तो वे झिड़कने और गाली देने लगे । वे क्रोधित होकर बोले – अरे ओ नादान कृतघ्न बम्मन । ऊपर मत चढ़ । सावधान, यदि ऐसा किया तो । और फिर गर्जना करते हुए बोले, हटो, दूर हट, नीचे उतर । श्री साईबाबा को इस प्रकार अत्यंत क्रोधित देख शामा उलझन में पड़ गयाऔर निराश होकर सोचने लगा कि केवल मसजिद ही तो मेरा घर है और साईबाबा मात्र किसकी शरण में जाऊँ । उसने अपने जीवन की आशा ही छोड़ दी और वहीं शान्तीपूर्वक बैठ गया । थोड़े समय के पश्चात जब बाबा पूर्वव्त शांत हुए तो शामा ऊपर आकर उनके समीप बैठ गया । तब बाबा बोले, डरो नहीं । तिल मात्र भी चिन्ता मत करो । दयालु फकीर तुम्हारी अवश्य रक्षा करेगा । घर जाकर शान्ति से बैठो और बाहर न निकलो । मुझपर विश्वास कर निर्भय होकर चिन्ता त्याग दो । उन्हें घर भिजवाने के पश्चात ही पुछे से बाबा ने तात्या पाटील और काकासाहेब दीक्षित के द्घारा यह कहला भेजा कि वह इच्छानुसार भोजन करे, घर में टहलते रहे, लेटें नही और न शयन करें । कहने की आवश्यकता नहीं कि आदेशों का अक्षरशः पालन किया गया और थोड़े समय में ही वे पूर्ण स्वस्थ हो गये । इस विषय में केवल यही बात स्मरण योग्य है कि बाबा के शब्द (पंच अक्षरीय मंत्र-हटो, दूर हट, नीचे उतर) शामा को लक्ष्य करके नहीं कहे गये थे, जैसा कि ऊपर से स्पष्ट प्रतीत होता है, वरन् उस साँप और उसके विष के लिये ही यह आज्ञा थी (अर्थात् शामा के शरीर में विष न फैलाने की आज्ञा थी) अन्य मंत्र शास्त्रों के विशेषज्ञों की तरह बाबा ने किसी मंत्र या मंत्रोक्त चावल या जल आदि का प्रयोग नहीं किया ।
इस कथा और इसी प्रकार की अन्य अथाओं को सुनकर साईबाबा के चरणों में यह दृढ़ विश्वास हो जायगा कि यदि मायायुक्त संसार को पार करना हो तो केवल श्री साईचरणों का हृदय में ध्यान करो ।

हैजा महामारी
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एक बार शिरडी विषूचिका के प्रकोप से दहल उठी और ग्रामवासी भयभीत हो गये । उनका पारस्परिक सम्पर्क अन्य गाँव के लोगों से प्रायः समाप्त सा हो गया । तब गाँव के पंचों ने एकत्रित होकर दो आदेश प्रसारित किये । प्रथम-लकड़ी की एक भी गाड़ी गाँव में न आने दी जाय । द्घितीय – कोई बकरे की बलि न दे । इन आदेशों का उल्लंघन करने वाले को मुखिया और पंचों द्घारा दंड दिया जायगा । बाबा तो जानते ही थे कि यह सब केवल अंधविश्वास ही है और इसी कारण उन्होंने इन हैजी के आदेशों की कोई चिंता न की । जब ये आदेशलागू थे, तभी एक लकड़ी की गाड़ी गाँव में आयी । सबको ज्ञात था कि गाँव में लगड़ी का अधिक अभाव है, फिर भीलोग उस गाड़वाले को भगाने लगे । यह समाचार कहीं बाबा के पास तक पहुँच गया । तब वे स्वयं वहाँ आये और गाड़ी वाले से गाड़ी मसजिद में ले चलने को कहा । बाबा के विरुदृ कोई चूँ—चपाट तक भीन कर सका । यथार्थ में उन्हें धूनी के लिए लकड़ियों की अत्यन्त आवश्यकता थी और इसीलिए उन्होंने वह गाड़ी मोल ले ली । एक महान अग्निहोत्री की तरह उन्होंने जीवन भर धूनी को चैतन्य रखा । बाबा की धूनी दिनरात प्रज्वलित रहती थी और इसलिए वे लकड़ियाँ एकत्रित कर रखते थे । बाबा का घर अर्थात् मसजिद सबके लिए सदैव खुली थी । उसमें किसी ताले चाभी की आवश्यकता न थी । गाँव के गरीब आदमी अपने उपयोग के लिए उसमें से लकडियाँ निकाल भी ले जाया करते थे, परन्तु बाबा ने इस पर कभी कोई आपत्ति न की । बाबा तो सम्पूर्ण विश्व को ईश्वर से ओतप्रोत देखते थे, इसलिये उनमें किसी के प्रति घृणा या शत्रुता की भावना न थी । पूर्ण विरक्त होते हुए भी उन्होंने एक साधारण गृहस्थ का-सा उदाहरण लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया ।


गुरुभक्ति की कठिन परीक्षा
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अब देखिये, दूसरे आदेश की भी बाबा ने क्या दुर्दशा की । वह आदेश लागू रहते समय कोई मसजिद में एक बकरा बलि देने को लाया । वह अत्यन्त दुर्बल, बूढ़ा और मरने ही वाला था । उस समय मालेगाँव के फकीर पीरमोहम्मद उर्फ बड़े बाबा भी उनके समीप ही खड़े थे । बाबा ने उन्हें बकरा काटकर बलि चढ़ाने को कहा । श्री साईतबाबा बड़े बाबा का अधिक आदर किया करते थे । इस कारण वे सदैव उनके दाहिनीओर ही बैठा करते थे । सबसे पहने वे ही चिलम पीते और फिर बाबा को देते, बाद में अन्य भक्तों को । जब दोपहर को भोजन परोस दिया जाता, तब बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपने दाहिनी ओर बिठाते और तब सब भोजन करते । बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्रित होती, उसमेंसे वे 50 रु. प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे । जब वे लौटते तो बाबा भी उनके साथ सौ कदम जाया करते थे । उनका इतना आदर होते हुए भी जब बाबा ने उनसे बकरा काटने को कहा तो उन्होंने अस्वीकार कर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि बलि चढ़ाना व्यर्थ ही है । तब बाबा ने शामा से बकरे की बलि के लिये कहा । वे राधाकृष्ण माई के घर जाकर एक चाकू ले आये और उसे बाबा के सामने रख दिया । राधाकृष्माई को जब कारण का पता चला तो उन्होंने चाकू वापस मँगवालिया । अब शामा दूसरा चाकू लाने के लिये गये, किन्तु बड़ी देर तक मसजिद में न लौटे । तब काकासाहेब दीक्षित की बारी आई । वह सोना सच्चा तो था, परन्तु उसको कसौटी पर कसना भी अत्यन्त आवश्यक था । बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा । वे साठेवाड़े से एक चाकू ले आये और बाबा की आज्ञा मिलते ही काटने को तैयार हो गये । उन्होंने पवित्र ब्राहमण-वंश में जन्म लिया था और अपने जीवन में वे बलिकृत्य जानते ही न थे । यघपि हिंसा करना निंदनीय है, फिर भी वे बकरा काटने के लिये उघत हो गये । सब लोगों को आश्चर्य था कि बड़े बाबा एक यवन होते हुए भी बकरा काटने को सहमत नहीं हैं और यह एक सनातन ब्राहमण बकरे की बलि देने की तैयारी कर रहा है । उन्होंने अपनी धोती ऊपर चढ़ा फेंटा कस लिया और चाकू लेकर हाथ ऊपर उठाकर बाबा की अन्तिम आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे । बाबा बोले, अब विचार क्या कर रहे हो । ठीक है, मारो । जब उनका हाथ नीचे आने ही वाला था, तब बाबा बोले ठहरो, तुम कितने दुष्ट हो । ब्राहमण होकर तुम बके की बलि दे रहे हो । काकासाहेब चाकू नीचे रख कर बाबा से बोले आपकी आज्ञा ही हमारे लिये सब कुछ है, हमें अन्य आदेशों से क्या । हम तो केवल आपका ही सदैव स्मरण तथा ध्यान करते है और दिन रात आपकी आज्ञा का ही पालन किया करते है । हमें यह विचार करने की आवश्यकता नहीं कि बकरे को मारना उचित है या अनुचित । और न हम इसका कारण ही जानना चाहते है । हमारा कर्तव्य और धर्म तो निःसंकोच होकर गुरु की आज्ञा का पूर्णतः पालन करने में है । तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैं स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करुँगा । तब ऐसा निश्चित हुआ कि तकिये के पास जहाँ बहुत से फकीर बैठते है, वहाँ चलकर इसकी बलि देनी चाहिए । जब बकरा वहाँ ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में गिर कर वह मर गया ।
भक्तों के प्रकार का वर्णन कर श्री. हेमाडपंत यह अध्याय समाप्त करते है । भक्त तीन प्रकार के है

1. उत्तम

2. मध्यम और

3. साधारण

प्रथम श्रेणी के भक्त वे है, जो अपने गुरु की इच्छा पहले से ही जानकर अपना कर्तव्य मान कर सेवा करते है । द्घितीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा मिलते ही उसका तुरन्त पालन करते है । तृतीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा सदैव टालते हुए पग-पग पर त्रुटि किया करते है । भक्तगण यदि अपनी जागृत बुद्घि और धैर्य धारण कर दृढ़ विश्वास स्थिर करें तो निःसन्देह उनका आध्यात्मिक ध्येय उनसे अधिक दूर नहीं है । श्वासोच्ध्वास का नियंत्रण, हठ योग या अन्य कठिन साधनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है । जब शिष्य में उपयुक्त गुणों का विकास हो जाता है और जब अग्रिम उपदेशों के लिये भूमिका तैयार हो जाती है, तभी गुरु स्वयं प्रगट होकर उसे पूर्णता की ओर ले जाते है । अगले अध्याय में बाबा के मनोरंजक हास्य-विनोद के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे


।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

आओ साईं - Remembering Megha - A Great Devotee of Baba

Dear Sai Devotees,

OM SRI SAI RAM to all...

Time to remember MEGHA, a great devotee of Baba. All Sai Devotees know  about Megha and how he was fully devoted to Baba and how much Baba loved him in return.

Wednesday, 18 January 2017

मिले जिसे साईं का प्रसाद

ॐ सांई राम


मिले जिसे साईं का प्रसाद, तो समझो उसने किया है याद 
कोई माने या ना माने, मगर यही कहे गुरु उस्ताद

मिले जिसे साईं का प्रसाद, तो समझो उसने किया है याद 

एक हाथ में लोभ की गठड़ी, एक हाथ में माला है
धन के ग़म में घूमे खुद को, इस दुविधा में डाला है 
वोही सुनेगा तेरा रोना, वोही तेरी फ़रियाद 
मिले जिसे साईं का प्रसाद, तो समझो उसने किया है याद 

किसी से भी नफरत न कर तू, किसी की छाँव और धूप न देख 
सब हैं उसके फूल और पौधे, किसी का रंग और रूप न देख 
वोही मात-पिता है सबका, सब उसकी औलाद
मिले जिसे साईं का प्रसाद, तो समझो उसने किया है याद 

शमा बेचारी चले अकेली, तू कैसा परवाना है 
उसके द्वार पे जान चढ़ा, चाहे लोग कहें दीवाना है 
एक नई मंजिल आएगी, जनम मरण के बाद 
मिले जिसे साईं का प्रसाद, तो समझो उसने किया है याद
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===


बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

Tuesday, 17 January 2017

ये बन्दा तेरा सवाली है

ॐ सांई राम


एक हाथ में मोती है, एक हाथ मेरा खाली है
ये बन्दा  तेरा सवाली है, ये बन्दा  तेरा सवाली है

तो हैं पतझड़ के पत्ते, धूप लगे तो सूखेंगे
तूने की जो दया की वर्षा, इक दिन हम भी महकेंगे
हम तो हैं मासूम कली, तू ही हमारा माली है
ये बन्दा  तेरा सवाली है, ये बन्दा  तेरा सवाली है

मैं तेरी चौखट पे आऊँ, तू मुझको वरदान दे
तेरी सेवा करता रहूँ मैं, मुझको ऐसी शान दे
एक हाथ में फूल की माला, एक हाथ में जाली है
ये बन्दा  तेरा सवाली है, ये बन्दा  तेरा सवाली है

जिसको चाहे साईं बाबा, वो ही दर पे आता है
जिस की सेवा लेना चाहे, जगराता करवाता है
साईंनाथ के आने से हुई रात बड़ी मतवाली है
ये बन्दा  तेरा सवाली है, ये बन्दा  तेरा सवाली है

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===


बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

Monday, 16 January 2017

तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे

ॐ सांई राम


तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे 
तेरी मिट्टी में बैठेंगे, तेरे पत्थर पे बैठेंगे

चमन रंगीं बनेगा जब, तेरी आँखों की लाली से
हमें जिस फूल को चुनना है, उसे ले लेंगे माली से
तेरे काँटों में बैठेंगे, तेरी चादर में बैठेंगे
तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे

हमें इक काम है छोटा सा, इसे तुम ही कर सकते हो
दया से झोली भर देना, इसे तुम ही भर सकते हो
तेरी रहमत में बैठेंगे, तेरे तेवर में बैठेंगे
तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे

अँधेरा सामने भी हो, तो कोई गम नहीं होगा
तिलक है लाल जो मस्तक का, दीये से कम नहीं होगा
तेरी कश्ती में बैठेंगे, तेरे सागर में बैठेंगे
तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे

इबादत का नशा हमको, तेरी महफ़िल में लाया है
नई मंज़िल दिखाई है, नया रास्ता दिखाया है
तेरी मस्जिद में बैठेंगे, तेरे मंदिर में बैठेंगे
तेरी चौखट पे आये हैं, तेरे ही घर में बैठेंगे
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

Sunday, 15 January 2017

कौन आता है शिर्डी मेरे लिये

ॐ सांई राम


कौन आता है शिर्डी मेरे लिये
सभी आते यहां पे अपने लिये

कौन करता किसी के लिये
सब ही कहते है सांई मेरे लिये

कौन आता है शिर्डी मेरे लिये
सभी आते यहां पे अपने लिये

मेरे दिल में है उनकी चाहत भरी
जो सब ही के काम आता है
मुझे उनसे भी शिकवा नहीं है कोई
मागते है जो खुशिया अपने लिये
और करता नहीं कुछ भी रब के लिये

कौन आता है शिर्डी मेरे लिये
सभी आते यहां पे अपने लिये

मैं तो खुद एक फकीर हूँ तुमहे क्या मैं दूँ
फकीरी की मस्ती में रमता रहूँ
मैं तो बन्दा हूँ उनका मैं किससे कहूँ
अल्ल्हा मालिक के कहने से करता रहूं
भला हो सब ही का ये है चाहत मेरी
ऐसे भक्तों की झोली मैं भरता रहूं

कौन आता है शिर्डी मेरे लिये
सभी आते यहां पे अपने लिये

सुन लेता हूँ मैं भी सभी की कही
भले हो बुरे हो या जो कोई
सब के रंज़ो सितम भी सहूं
और मौला से मेरी मैं कहता रहूं
भर दे झोली तूं उनकी मेरे नाम से
और गुनाह को तूं उनके ज़रा बक्श दे

कौन आता है शिर्डी मेरे लिये
सभी आते यहां पे अपने लिये

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा की कृपा आप पर सदा बरसती रहे ।

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For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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