शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 11 March 2017

श्री साईं लीलाएं - ब्रह्म ज्ञान पाने का सच्चा अधिकारी


ॐ सांई राम





कल हमने पढ़ा था.. मिस्टर थॉमस नतमस्तक हुए

श्री साईं लीलाएं

ब्रह्म ज्ञान पाने का सच्चा अधिकारी

साईं बाबा की प्रसिद्धि अब बहुत दूर-दूर तक फैल गयी थी| शिरडी से बाहर दूर-दूर के लोग भी उनके चमत्कार के विषय में जानकर प्रभावित हुए बिना न रह सके| वह साईं बाबा के चमत्कारों के बारे में जानकर श्रद्धा से नतमस्तक हो उठते थे|एक पंडितजी को छोड़कर शिरडी में उनका दूसरा कोई विरोधी एवं उनके प्रति अपने मन में ईर्ष्या रखने वाला न था| बाबा के पास अब हर समय भक्तों का जमघट लगा रहता था| वह अपने भक्तों को सभी से प्रेम करने के लिए कहते थे|इतनी प्रसिद्धि फैल जाने के बाद भी बाबा का जीवन अब भी पहले जैसा ही था| वह भिक्षा मांगकर ही अपना पेट भरते थे| रुपयों-पैसों को वह बिल्कुल भी हाथ न लगाते थे| श्रद्धालु भक्त अपनी श्रद्धा से जो कुछ दे जाया करते थे, उनके शिष्य उनका उपयोग मस्जिद बनाने और गरीबों की सहायता करने में किया करते थे|मस्जिद के एक कोने में बाबा की धूनी सदा रमी रहती थी| उसमें हमेशा आग जलती रहती थी और साईं बाबा अपनी धूनी के पास बैठे रहा करते थे| बाबा जमीन पर सोया करते थे| बाबा सदैव कुर्ता, धोती और सिर पर अंगोछा बांधे रहते थे और नंगे पैर रहते थे, यही उनकी वेशभूषा थी|अहमदाबाद में एक गुजराती सेठ थे, उनके पास बहुत सारी धन-सम्पत्ति थी| सभी तरह से वह सम्पन्न थे| साईं बाबा की प्रसिद्धि सुनकर उनके मन में भी बाबा से मिलने की इच्छा पैदा हुई|बाबा से मिलने के पीछे उनके दिल में एक ही वंशा थी - वह मन-ही-मन सोचते, सांसारिक सुखों की तो सभी वस्तुएं मेरे पास मौजूद हैं, क्यों न कुछ आध्यात्मिक ज्ञान भी प्राप्त कर लिया जाये, जिससे स्वर्ग की प्राप्ति हो| वह अपना परलोक भी सुधार लेना चाहते थे| इसलिए साईं बाबा से मिलने को अत्यंत उत्सुक थे| इसी दौरान एक साधु उसके पास आये| यह भी साईं बाबा के भक्त थे| उन्होंने भी उस सेठ को बताया| यह सुनकर साईं बाबा से मिलने की इच्छा और भी तीव्र हो गयी| उन्होंने साईं बाबा से मिलने का निश्चय किया और शिरडी के लिए रवाना हो गये|जिस दिन वह शिरडी आये, उस दिन बृहस्पतिवार का दिन था, बाबा के प्रसाद का दिन| सेठ की सवारी जब द्वारिकामाई मस्जिद के पास आकर रुकी, उस समय लोगों की वहां पर अपार भीड़ जमा थी|बृहस्पतिवार को शिरडी गांव के ही नहीं, बल्कि दूर-दूर के अनेक गांव के लोग भी साईं बाबा की शोभायात्रा में शामिल होने के लिए द्वारिकामाई मस्जिद आते थे| बाबा की शोभायात्रा निकाली जाती थी| जो द्वारिकामाई मस्जिद से चावड़ी तक जाती थी| साईं बाबा के भक्त झांझ, मदृंग, ढोल, मंजीरे आदि वाद्य यंत्र बजाते, भक्ति गीत तथा कीर्तन गाते हुए सबसे आगे-आगे चलते थे| इस जलूस में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुआ करती थीं| उनके पीछे दर्जनों सजी हुई पालकियां होती थीं और सबसे आखिर में विशेष रूप से एक सजी हुई पालकी होती थी, जिसमें साईं बाबा बैठते थे| बाबा के शिष्य पालकी को अपने कंधों पर उठाकर चलते थे| पालकी के दोनों ओर जलती हुई मशालें लेकर मशालची चला करते थे|जुलूस के आगे-आगे आतिशबाजी छोड़ी जाती थी| सारा गांव साईं बाबा की जय, भजन तथा कीर्तन की मधुर ध्वनि से गुंजायमान हो उठता था| चावड़ी तक यह जुलूस जाकर फिर इसी तरह से द्वारिकामाई मस्जिद की ओर लौट आता था| जब पालकी मस्जिद के सामने पहुंच जाती थी, मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़ा हुआ शिष्य बाबा के आगमन की घोषणा करता था| बाबा के सिर पर छत्र तान दिया जाता था| मस्जिद की सीढ़ियों पर दोनों ओर खड़े लोग चँवर डुलाने लगते थे| रास्ते में फूल, गुलाल और कुमकुम आदि बरसाये जाते थे|साईं बाबा हाथ उठाकर वहां एकत्रित भीड़ को अपना आशीर्वाद देते हुए धीरे-धीरे चलते हुए अपनी धूनी पर पहुंच जाते थे| सारे रास्ते भर 'साईं बाबा की जय' का नारा गूंजा करता था| जुलूस के दिन शिरडी के गांव की शोभा देखते ही बनती थी| हिन्दू-मुसलमान सभी मिलकर साईं बाबा का गुणगान करते थे|साईं बाबा की शोभायात्रा को देखकर गुजराती सेठ चकित रह गया| वह बाबा के पीछे-पीछे चलते हुए अन्य भक्तों के साथ चलते हुए बाबा की धूनी तक आ गया|उन्होंने बाबा के चेहरे की ओर देखा| कुछ देर पहले ही बाबा का जुलूस राजसी शानो-शौकत से निकाला गया था, लेकिन बाबा के चेहरे पर किसी प्रकार के अहंकार या गर्व की झलक तक नहीं थी| उनके चेहरे पर सदा की तरह शिशु जैसा भोलापन छाया हुआ था| गुजराती सेठ साईं बाबा के चरणों में झुक गया| बाबा ने उन्हें बड़े स्नेह से उठाकर अपने पास बैठा लिया|गुजराती सेठ ने हाथ जोड़कर कातर स्वर में कहा - "बाबा ! परमात्मा की कृपा से मेरे पास सब कुछ है| धन-सम्पति, जायदाद, संतान सब कुछ है| संसार के सभी मुझे प्राप्त हैं| आपके आशीर्वाद से मुझे किसी प्रकार का अभाव नहीं है|"सेठ की बात सुनने के बाद बाबा ने हँसते हुए कहा - "फिर आप मेरे पास क्या लेने आए हैं ?"





"बाबामेरा मन सांसारिक सुखों से ऊब गया हैमैंने धनोपार्जन करके अपने इस लोक को सुखी बना दिया हैअब मैं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर अपना परलोक भी सुधार लेना चाहता हूं|"



"सेठजीआपके विचार बहुत सुंदर हैंमेरे पास जो कोई भी आता हैमैं यथासंभव उसकी मदद करता हूं|"साईं बाबा की बात सुनकर सेठ को अत्यंत प्रसन्नता हुईउसे विश्वास हो चला था कि साईं बाबा उसे अवश्य ही ज्ञान प्रदान करेंगेजिस विश्वास को लेकर वह यहां आया हैवह अवश्य ही यहां पर पूरा होगावहां का वातावरण देखकर वह और प्रसन्न हो गया था|गुजराती सेठ बेफिक्र हो गया था उसे पूरा-पूरा विश्वास हो गया था कि उसका उद्देश्य पूरा हो जाएगा|अचानक साईं बाबा ने अपने एक शिष्य को अपने पास बुलाया और उससे बोले - " एक छोटा-सा काम कर दोअभी जाकर धनजी सेठ से सौ रुपये मांग लाओ|"वह शिष्य हैरानी से साईं बाबा के मुख की ओर देखता रह गयाबाबा को शिरडी में आए हुए इतने वर्ष बीत गए थेलेकिन उन्होंने आज तक कभी पैसे को हाथ भी न लगाया थाभक्त और शिष्य उन्हें जो कुछ भेंट दे जाते थेवह सब उनके दूसरे प्रमुख शिष्यों के पास ही रहता थाउनके आसन के नीचे पांच-दस रुपये अवश्य रख दिये जाते थेवह इसलिए कि यदि बाबा प्रसन्न होकर अपने भक्त को कुछ देना चाहेंतो दे देंबाबा जब कभी-कभार किसी भक्त पर प्रसन्न होते थेतो अपने आसन के नीचे से निकालकर दो-चार रुपये दे दिया करते थेआज बाबा को अचानक इतने रुपयों की क्या आवश्यकता पड़ गयी शिष्य इसी सोच में डूबा हुआ धनजी सेठ के पास चला गया|कुछ देर बाद उसने लौटकर बताया कि धनजी सेठ तो पिछले दो दिन से बम्बई (मुम्बई) गए हुए हैं|

"कोई बात नहींतुम बड़े भाई के पास चले जाओवह तुम्हें सौ रुपये दे देंगे|"हैरान-परेशान-सा वह फिर से चला गया|तभी बृहस्पतिवार को होने सामूहिक भोजन का कार्यक्रम शुरू हो गयाउस दिन जितने भी लोग शोभायात्रा में शामिल हुआ करते थे वह सभी मस्जिद में ही खाना खाया करते थेजात-पातऊंच-नीच छुआ-छूत की भावना का त्याग करके सभी लोग एक साथ बैठकर बाबा के भंडारे का प्रसाद पूरी श्रद्धा के साथ ग्रहण किया करते थे|साईं बाबा ने उस गुजराती सेठ से कहा - "सेठजीआप भी प्रसाद ग्रहण कीजिए|"

"मैं तो भोजन कर चूका हूं बाबा ! खाने की मेरी इच्छा नहीं हैआप मुझे ज्ञान दीजिएमेरे लिए यही आपका सबसे बड़ा प्रसाद होगा|" सेठ ने हाथ जोड़कर कहा|तभी शिष्य सेठ की दूकान से वापस लौट आयाउसने बताया कि सेठ का भाई भी अपने किसी संबंधी के यहां गया हुआ हैदो-तीन दिन बाद लौटेगा|

"कोई बात नहींतुम जाओ|" साईं बाबा ने एक लंबी सांस लेकर कहा|शिष्य की परेशानी की कोई सीमा न थीउसकी समझ में नहीं आ रहा था कि साईं बाबा को अचानक इतने रुपयों की क्या आवश्यकता पड़ गयी साईं बाबा उठकर मस्जिद के चबूतरे के पास चले गएजहां शोभायात्रा से आए हुए लोग प्रसाद ग्रहण कर रहे थे|बाबा चबूतरे के पास ही एक टूटी दीवार पर जा बैठे और अपने शिष्यों तथा भक्तों को देखने लगेइस समय उनके चेहरे पर ठीक वैसी ही प्रसन्नता के भाव थेजैसे किसी पिता के चेहरे पर उस समय होते हैंजब वह अपनी संतान को भोजन करते हुए देखता हैगुजराती सेठ साईं बाबा के पास खड़ा कार्यक्रम को देखता रहाकुछ देर बाद जब बाबा अपने आसन पर आकर बैठ गए तो गुजराती सेठ ने फिर से अपनी प्रार्थना दोहरायी|बाबा इस बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ेहँसने के बाद उन्होंने गुजराती सेठ की ओर देखते हुए पूछा - "सेठजीक्या आपने यह सोचा है कि आप ज्ञान प्राप्त करने के योग्य हैं भी अथवा नहीं ?"

"मैं कुछ समझा नहीं|" सेठ बोला|

"देखो सेठजी ! ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी वह व्यक्ति होता हैजिसके मन में कोई मोह न होसांसारिक विषय वस्तुओं के लिए लालसा न होत्याग की भावना हो और जो संसार के प्रत्येक प्राणी को चाहे वह मनुष्य होपशु हो या कीट-पतंग सभी को अपने समान समझकर समान भाव से प्यार करता हो|"

"आप बिल्कुल ठीक कहते हैं|" गुजराती सेठ बोला|

"नहीं सेठतुम झूठ बोलते होतुम्हारे मन में सारी बुराइयां अभी भी मौजूद हैंयदि तुम्हारे मन में धन के प्रति आसक्ति न होती और कुछ त्याग की भावना होतीतो जब मैंने अपने शिष्य को दो बार रुपये लाने के लिए भेजा था और वह दोनों बार खाली हाथ लौटकर आया थातब तुम अपनी जेब से भी निकालकर रुपये दे सकते थेजबकि तुम्हारी जेब में सौ-सौ के नोट रखे हुए थेपर तुमने यह सोचा कि मैं सौ रुपये बाबा को मुफ्त में क्यों दूं मैंने तुमसे भण्डारे में प्रसाद ग्रहण करने के लिए कहातो तुमने प्रसाद ग्रहण करने से तुरंत इंकार कर दियाक्योंकि वहां सभी जातियों और धर्मों के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण कर रहे थेइसलिए तुम किसी भी दशा में ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो|जिस व्यक्ति के मन में लोभ नहीं होता हैजिसकी दृष्टि में समभाव होता हैउसे स्वयं ही ज्ञान प्राप्त हो जाता हैतुम ज्ञान पाने के अधिकारी तभी हो सकते होजब तुम में यह बातें पैदा हो जायेंगी|"गुजराती सेठ को ऐसा लगा जैसे बाबा ने उसकी आत्मा को झिंझोड़कर रख दिया होउसका चेहरा उतर गया|साईं बाबा ने सेठ को वापस चले जाने के लिए कह दियावह चुपचाप उठा और बाबा के चरण स्पर्श करके वापस चल दियाउसके पास अब कहने को कुछ नहीं बचा था|


कल चर्चा करेंगे..तात्या को बाबा का आशीर्वाद



ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===


बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 10 March 2017

श्री साईं लीलाएं - मिस्टर थॉमस नतमस्तक हुए

ॐ सांई राम




परसों हमने पढ़ा था.. ऊदी का एक और चमत्कार

श्री साईं लीलाएं
मिस्टर थॉमस नतमस्तक हुए 

उस समय तक शिरडी गांव की गिनती पिछड़े हुए गांवों में हुआ करती थी| उस समय शिरडी और उसके आस-पास के लगभग सभी गांवों में ईसाई मिशनरियों ने अपने पैर मजबूती से जमा लिये थे| ईसाइयों के प्रभाव-लोभ में आकर शिरडी के कुछ लोगों ने भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था| उन्होंने वहां गांव में एक छोटा-सा गिरजाघर भी बना लिया था| वहां पर उन्हें यह सिखाया जाता था कि हिन्दू या मुसलमान जिन बातों को मानें, चाहे वह उचित ही क्यों न हों, तुम उनका विरोध करो| हिन्दू और मुस्लिम जैसा आचरण करें, तुम उसके विपरीत आचरण करो, ताकि तुम उन सबसे अलग दिखाई पड़ी|
उनका एकमात्र उद्देश्य हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच द्वेष उत्पन्न करके वैमनस्य था, जिससे वे अपना मकसद सिद्ध कर सकें|
वे कहते थे कि ईसामसीह में ही विश्वास करो| केवल वही ईश्वर का सच्चा पुत्र है| उसके अलावा जितने भी अवतार, पैगम्बर आदि हैं वे हिन्दुओं और मुसलमानों की अपनी बनाई हुई मनगढ़ंत कहानियां हैं| ईसाई संतों का आदर-सम्मान करो, क्योंकि वही एकमात्र सम्मान योग्य हैं| हिन्दू साधु-संत या मुस्लिम फकीरों की बात मत सुनो| वह सब ढोंगी होते हैं| इस प्रकार की द्वेष भावना वह समाज में बराबर फैला रहे थे|
आस-पास के इलाके में जब हैजे की महामारी फैली तो वह लोग भी इस महामारी से अछूते न रहे| ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाली मिशनरियों ने यह देखकर ब्रिटिश सरकार से सहायता प्राप्त कर उस इलाके में अस्पताल बनवा दिया| इस अस्पताल में दवा केवल उन्हीं लोगों को दी जाती थी, जो ईसाई थे|
जो व्यक्ति ईसाई बनने के लिए तैयार हो जाते थे, उनका मुफ्त इलाज करने के साथ-साथ रुपया-पैसा भी दिया जाता था|
मिशनरी अस्पताल के इंजेक्शन और दवा से भी जब कोई भी फायदा होता हुआ दिखाई न पड़ा तो अनेक ईसाई भी अपने पादरियों की कड़ी चेतावनी को अनसुना कर, साईं बाबा की शरण में आने लगे|
साईं बाबा के लिए जात-पात का कोई महत्त्व न था| वह सभी मनुष्यों के प्रति समभाव रखते थे, जो कोई भी उनके पास पहुंचता था, वह उसी को अपनी ऊदी दे देते| उस ऊदी का तुरंत चमत्कारिक असर होता था और रोगी व्यक्ति मौत के मुंह में जाने से साफ बच निकलता था|
यह सब देख-सुनकर पादरियों ने पहले तो ईसाइयों को धन का लालच दिया, फिर डराया-धमकाया भी, कि यदि साईं बाबा के पास दवा लेने के लिए गए तो सारी सुविधाएं छीन ली जाएंगी| पर लोगों पर इन बातों का जरा-सा भी असर न हुआ| वह उनकी धमकियों में नहीं आये, क्योंकि यह उनकी जिंदगी और मौत का सवाल था|
साईं बाबा की दवा तो रामबाण थी| वह निश्चित रूप से बीमारी का समूल नाश कर देती थी| इसका उन सब लोगों को पूरा विश्वास था| वह स्वयं भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देख रहे थे| इस कारण वह सब साईं बाबा के पास आने लगे| उन्होंने रविवार को गिरजे में जाना भी बंद कर दिया|
यह सब देखकर मिस्टर थॅामस के गुस्से का कोई ठिकाना न रहा| वह शिरडी में अपना पवित्र ईसाई धर्म फैलाने के लिये आये थे| वह एक पादरी थे|साईं बाबा के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए थॉमस ने यह निर्णय किया कि साईं बाबा को ढोंगी, झूठा सिद्ध कर दिया जाए| एक बड़े पैमाने पर उनके विरुद्ध प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया जाए|
वह सीधे शिरडी गांव पहुंचे| साईं बाबा से मिलने के लिए, उनके दर्शन करने और प्रवचन सुनने के लिए लोग बड़ी-बड़ी दूर-दूर से आते रहते थे| लेकिन जब तक साईं बाबा की आज्ञा नहीं मिल जाती थी, किसी भी व्यक्ति को उनके पास दर्शन, चरणवंदना करते हेतु नहीं जाने दिया जाता था|
थॉमस के साथ भी ऐसा ही हुआ| वह द्वारिकामाई मस्जिद में पहुंचे तो साईं बाबा के भक्तों ने उन्हें मस्जिद के बाहर ही रोक दिया| थॉमस को मस्जिद के बाहर खड़े-खड़े घंटों हो गए, लोग आते-जाते रहे| बाबा उनसे मिलते रहे, लोकिन थॉमस को उन्होंने नहीं बुलाया|
उस जमाने में प्रत्येक अंग्रेज अपने आपको बड़ा आदमी समझता था| थॉमस अंग्रेज थे| साईं बाबा ने उन्हें मस्जिद के बाहर रोककर उनका अपमान किया था| वह इस अपमान को कैसे सहन कर सकते थे ! उन्होंने साईं बाबा के शिष्यों से कहा कि वह बाबा से पूछ लें कि वह मुझसे मिलेंगे या नहीं, यदि वह नहीं मिलेंगे, तो मैं अभी लौट जाऊंगा|
साईं बाबा का एक शिष्य थॉमस की खबर लेकर बाबा के पास गया| बाबा ने थॉमस का संदेश सुना और फिर मुस्कराकर कहा - "जिन लोगों के मन में शंका, घृणा, क्रोध, पक्षपात आदि बुराइयां हैं, मैं उनसे मिलना नहीं चाहता| मिस्टर थॉमस से कहो, वह चले जायें| वैसे मैं उनसे कल मिल सकता हूं, आज की रात वह यहीं ठहरें| यदि वह अनिष्ट से बचना चाहते हैं तो उन्हें आज रात यहीं पर रुकना चाहिये| रुकेंगे, तो मैं उनसे जरूर मिलूंगा|"
बाबा का संदेश थॉमस तक पहुंचाने के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह रात को यहीं पर ठहरें| उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था कर दी जाएगी| किसी भी तरह की असुविधा नहीं होगी|
थॉमस ने उसका आग्रह ठुकरा दिया और वह वापस चल दिए| वह तांगे में बैठकर शिरडी तक आए थे| उन्हें साईं बाबा की अनिष्ट की भविष्यवाणी ढोंग का ही एक अंग मालूम पड़ी|
उनका तांगा अभी स्टेशन से आधे रास्ते पर ही होगा कि अचानक एक साईकिल सवार तेजी से उनके तांगे वाले ने घोड़े को रोकने की अपनी ओर से भरपूर उठा| तेजी से भागा, तांगे वाले ने घोड़े को रोकने की अपनी ओर से भरपूर कोशिश की, पर घोड़ा नहीं रुका| तांगा उलट गया| मिस्टर थॉमस तांगे से नीचे गिर पड़े और वह लहुलुहान हो गये| तब सड़क पर आते-जाते राहगीरों ने उन्हें उठाया और अस्पताल में जाकर भर्ती कर दिया|
रात को अस्पताल में जब थॉमस बेसुध सोए पड़े थे, अचानक उन्होंने देखा कि साईं बाबा उनके पलंग के पास खड़े हैं और उनके सर पर बंधी पट्टियों पर हाथ फेरते हुए कर रहे हैं - " तुमने मेरी बात का विश्वास नहीं किया थक, फिर भी मैंने तुम्हारी रक्षा की| इस दुर्घटना में तुम्हारी मृत्यु निश्चित थी| यदि तुम मेरा कहना मानकर वहीं पर रुक गये होते तो मैं तुम्हें बचने का उपाय बता देता| तुम्हारे मन में तो मेरे प्रति अविश्वास भरा हुआ था, फिर भी तुम्हारी रक्षा करना मेरा धर्म था| मैंने तुम्हें बचा लिया|"
बाबा के अंतर्ध्यान होते थॉमस की आँख खुल गई, वह चौंककर इधर-उधर देखने लगे, लेकिन कहीं कोई भी न था| चारों ओर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था|
कुछ दिनों के बाद ठीक हो जाने पर डॉक्टरों ने थॉमस को अस्पताल से छुट्टी दे दी|
अस्पताल से छुट्टी मिलते ही मिस्टर थॉमस शिरडी की ओर चल पड़े| साईं बाबा के प्रति उनके मन में भरा अविश्वास जाता रहा| धार्मिक कट्टरता भी अब न रही|
थॉमस जब शिरडी आए तो साईं बाबा ने उनका स्वागत किया| थॉमस ने आते ही साईं बाबा के चरणों में अपना सिर रख दिया| आँखों में आँसू आ गये| वह बार-बार अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगने लगे|
वहां उपस्थित सब लोग यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि एक पादरी साईं बाबा के चरणों में नतमस्तक हो रहा है| सबने इसे एक चमत्कार ही माना|
थॉमस ने सबके सामने साईं बाबा से क्षमा मांगी| फिर खुले शब्दों में कहा - "साईं बाबा ! आप एक महापुरुष हैं, पहुंचे हुए संत हैं| मैंने इस बात का प्रमाण स्वयं देख लिया है| आप मानव जाति का उद्धार करने के लिये ही इस धरती पर आये हैं|"
इस घटना के पश्चात् शिरडी ही नहीं, आस-पास के तमाम गांवों में भी साईं बाबा की जय-जयकार होने लगी| साईं बाबा के नाम का डंका दूर-दूर तक बजने लगा था|
सर्वत्र ही उनके नाम की धूम मच गयी थी|

कल चर्चा करेंगे.. ब्रह्म ज्ञान पाने का सच्चा अधिकारी

ॐ सांई राम

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 9 March 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...




श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30
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शिरडी को खींचे गये भक्त
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1. वणी के काका वैघ
2. खुशालचंद
3. बम्बई के रामलाल पंजाबी ।
इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गये ।


प्राक्कथन
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जो बिना किसी कारण भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर है तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो ऐसे भक्त और समस्त कष्ट दूर हो जाते है, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम क्यों न नमन करें । भक्तों को आत्मदर्शन कराना ही सन्तों का प्रधान कार्य है । श्री साई, जो सन्त शिरोमणि है, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है । जो उनके श्री-चरणों की शरण में जाते है , उनके समस्त पाप नष्ट होकर निश्चित ही दिन-प्रतिदिन उनकी प्रगति होती है । उनके श्री-चरणों का स्मरण कर पवित्र स्थानों से भक्तगण शिरडी आते और उनके समीप बैठकर श्लोक पढ़कर गायत्री-मंत्र का जप किया करते थे । परन्तु जो निर्बल तथा सर्व प्रकार से दीन-हीन है और जो यह भी नहीं जानते कि भक्ति किसे कहते है, उनका तो केवल इतना ही विश्वास है कि अन्य सब लोग उन्हें असहाय छोड़कर उपेक्षा भले ही कर दे, परन्तु अनाथों के नाथ और प्रभु श्री साई मेरा कभी परित्याग न करेंगे । जिन पर वे कृपा करे, उन्हें प्रचण्ड शक्ति, नित्यानित्य में विवेक तथा ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता है । वे अपने भक्तों की इच्छायें पूर्णतः जानकर उन्हें पूर्ण किया करते है, इसीलिये भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाया करती है और वे सदा कृतज्ञ बने रहते है । हम उन्हें साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना करते है कि वे हमारी त्रुटियों की ओर ध्यान न देकर हमें समस्त कष्टों से बचा लें । जो विपति-ग्रस्त प्राणी इस प्रकार श्री साई से प्रार्थना करता है, उनकी कृपा से उसे पूर्ण शान्ति तथा सुख-समृद्घि प्राप्त हती है । श्री हेमाडपंत कहते है कि हे मेरे प्यारे साई । तुम तो दया के सागर हो । यह तो तुम्हारी ही दया का फल है, जो आज यह साई सच्चरित्र भक्तों के समक्ष प्रस्तुत है, अन्यथा मुझमें इतनी योग्यता कहाँ थी, जो ऐसा कठिन कार्य करने का दुस्साहस भी कर सकता । जब पूर्ण उत्ततरदायित्व साई ने अपने ऊपर ही ले लिया तो हेमाडपंत को तिलमात्र भी भार प्रतीत न हुआ और न ही इसकी उन्हें चिन्ता ही हुई । श्री साई ने इस ग्रन्थ के रुप में उनकी सेवा स्वीकार कर ली । यह केवल उनके पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के कारण ही सम्भव हुआ, जजिसके लिये वे अपने को भाग्यशाली और कृतार्थ समझते है । नीचे लिखी कथा कपोलकल्पित नहीं, वरन् विशुदृ अमृततुल्य है । इसे जो हृदयंगम करेगा, उसे श्री साई की महानता और सर्वव्यापकता विदित हो जायेगी, परन्तु जो वादविवाद और आलोचना करना चाहते है, उन्हें इन कथाओं की ओर ध्यान देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ तर्क की नहीं, वरन् प्रगाढ़ प्रेम और भक्ति की अत्यन्त अपेक्षा है । विद्घान् भक्त तथा श्रद्घालु जन अथवा जो अपने को साई-पद-सेवक समझते है, उन्हें ही ये कथाएँ रुचिकर तथा शिक्षाप्रद प्रतीत होगी, अन्य लोगों के लिये तो वे निरी कपोल-कल्पनाएँ ही है । श्री साई के अंतरंग भक्तों को श्री साईलीलाएँ कल्पतरु के सदृश है । श्री साई-लीलारुपी अमृतपान करने से अज्ञानी जीवों को मोक्ष, गृहस्थाश्रमियों को सन्तोष तथा मुमुक्षुओं को एक उच्च साधन प्राप्त होता है । अब हम इस अध्याय की मूल कथा पर आते है ।

काका जी वैघ
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नासिक जिले के वणी ग्राम में काका जी वैघ नाम के एक व्यक्ति रहते थे । वे श्रीसप्तशृंगी देवी के मुख्य पुजारी थे । एक बार वे विपत्तियों में कुछ इस प्रकार ग्रसित हुए कि उनके चित्त की शांति भंग हो गई और वे बिलकुल निराश हो उअठे । एक दिन अति व्यथित होकर देवी के मंदिर में जाकर अन्तःकरण से वे प्रार्थना करने लगे कि हे देवि । हे दयामयी । मुझे कष्टों से शीघ्र मुक्त करो । उनकी प्रार्थना से देवी प्रसन्न हो गई और उसी रात्रि को उन्हें स्वप्न में बोली कि तू बाबा के पास जा, वहाँ तेरा मन सान्त और स्थिर हो जायेगा । बाबा का परिचय जानने को काका जी बड़े उत्सुक थे, परन्तु देवी से प्रश्न करने के पूर्व ही उनकी निद्रा भंग हो रगई । वे विचारने लगे कि ऐसे ये कौन से बाबा है, जिनकी ओर देवी ने मुझे संकेत किया है । कुछ देर विचार करने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सम्भव है कि वे त्र्यंबकेश्वर बाबा (शिव) ही हों । इसलिये वे पवित्र तीर्थ त्र्यंबक (नासिक) को गये और वहाँ रहकर दस दिन व्यतीत कियये । वे प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो, रुद्र मंत्र का जप कर, साथ ही साथ अभिषेक व अन्य धार्मिक कृत्य भी करने लगे । परन्तु उनका मन पूर्ववत् ही अशान्त बना रहा । तब फिर अपने घर लौटकर वे अति करुण स्वर में देवी की स्तुति करने लगे । उसी रात्रि में देवी ने पुनः स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तू व्यर्थ ही त्र्यम्बकेश्वर क्यो गया । बाबा से तो मेरा अभिप्राय था शिरडी के श्री साई समर्थ से । अब काका जी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह उपस्थित हो गया कि वे कैसे और कब शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाये । यथार्थ में यदि कोई व्यक्ति, किसी सन्त के दर्शने को आतुर हो तो केवल सन्त ही नही, भगवान् भी उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है । वस्तुतः यिद पूछा जाय तो सन्त और अनन्त एक ही है और उनमें कोई भिन्नता नही । यदि कोई कहे कि मैं स्वतः ही अमुक सन्त के दर्शन को जाऊँगा तो इसे निरे दम्भ के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । सन्त की इचत्छा के विरुदृ उनके समीप कौन जाकर द्रर्शन ले सकता है । उनकी सत्त के बिना वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । जितनी तीव्र उत्कंठा संत दर्शन की होती, तदनुसार ही उसकी भक्ति और विश्वास में वृद्घि होती जायेगी और उतनी ही शीघ्रता से उनकी मनोकामना भी सफलतापूर्वक पू4ण होगी । जो निमंत्रण देता है, वह आदर आतिथ्य का प्रबन्ध भी करता है । काका जी के सम्बन्ध में सचमुच यही हुआ ।

शामा की मान्यता
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जब काका जी शिरडी यात्रा करने का विचार कर रहे थे, उसी समय उनके यहाँ एक अतिथि आया (जो शामा के अतिरिक्त और कोई न था) । शामा बाबा के अंतरंग भक्तों में से एक थे । वे ठीक इसी समय वणी में क्यों और कैसे आ पहुँचे, अब हम इस पर दृष्टि डालें । बाल्यावस्था में वे एक बार बहुत बीमार पड़ गये थे । उनकी माता ने अपनी कुलदेवी सप्तशृंगी से प्रार्थना की कि यदि मेरा पुत्र नीरोग हो जाये तो मैं उसे तुम्हारे चरणों पर लाकर डालूँगी । कुछ वर्षों के पश्चात् ही उनकी माता के स्तन में दाद हो गई । तब उन्होंने पुनः देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं रोगमुक्त हो जाऊँ तो मैं तुम्हें चाँदी के दो स्तन चाढाऊँगी । पर ये दोनों वचन अधूरे ही रहे । परन्तु जब वे मृत्युशैया पर पड़ी ती तो उन्होंने अपने पुत्र शामा को समीप बुलाकर उन दोनों वचनों की स्मृति दिलाई तथा उन्हें पूर्ण करने का आश्वासन पाकर प्राण त्याग दिये । कुछ दिनों के पश्चात् वे अपनी यह प्रतिज्ञा भूल गये और इसे भूले पूरे तीस साल व्यतीत हो गये । तभी एक प्रसिदृ ज्योतिषी शिरडी आये और वहाँ लगभग एक मास ठहरे । श्री मान् बूटीसाहेब और अन्य लोगों को बतलाये उनके सभी भविष्य प्रायः सही निकले, जिनसे सब को पूर्ण सन्तोष था । शामा के लघुभ्राता बापाजी ने भी उनसे कुछ प्रश्न पूछे । तब ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता ने अपनी माता को मृत्युशैया पर जो वचन दिये थे, उनके अब तक पूर्ण न किये जाने के कारण देवी असन्तुष्ट होकर उन्हें कष्ट पहुँचा रही है । ज्योतिषी की बात सुनकर शामा को उन अपूर्ण वचनों की स्मृति हो आई । अब और विलम्ब करना खतरनाक समझकर उन्होंने सुनार को बुलाकर चाँदी के दो स्तन शीघ्र तैयार कराये और उन्हें मसजिद मं ले जाकर बाबा के समक्ष रख दिया तथा प्रणाम कर उन्हें स्वीकार कर वचनमुक्त करने की प्रार्थना की । शामा ने कहा कि मेरे लिये तो सप्तशृंगी देवी आप ही है, परन्तु बाबा ने साग्रह कहा कि तुम इन्हें स्वयं ले जाकर देवी के चरणों में अर्पित करो । बाबा की आज्ञा व उदी लेकर उन्होंने वणी को प्रस्थान कर दिया । पुजारी का घर पूछते-पूछते वे काका जी के पास जा पहुँचे । काका जी इस समय बाबा के दर्शनों को बड़े उत्सुक थे और ठीक ऐसे ही मौके पर शामा भी वहाँ पहुँच गये । वह संयोग भी कैसा विचित्र था । काका जी ने आगन्तुक से उनका परिचय प्राप्त कर पूछा कि आप कहाँ से पधार रहे है । जब उन्होंने सुना कि वे शिरडी से आ रहे तो वे एकदम प्रेमोन्मत हो शामा से लिपट गये और फिर दोनों का श्री साई लीलाओं पर वार्तालाप आरम्भ हो गया । अपने वचन संबंधी कृत्यों को पूर्ण कर वे काकाजी के साथ शिरडी लौट आये । काकाजी मसजिद पहुँच कर बाबा के श्रीचरणों से जा लिपटे । उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी और उनका चित्त स्थिर हो गया । देवी के दृष्टांतानुसार जैसे ही उन्होंनें बाबा के दर्शन किये, उनके मन की अशांति तुरन्त नष्ट तहो गई और वे परम शीतलता का अनुभव करने लगे । वे विचार करने लगे कि कैसी अदभुत शक्ति है कि बिना कोई सम्भाषण या प्रश्नोत्तर किये अथवा आशीष पाये, दर्शन मात्र से ही अपार प्रसन्नता हो रही है । सचमुच में दर्शन का महत्व तो इसे ही कहते है । उनके तृषित नेत्र श्री साई-चरणों पर अटक गये और वे अपनी जिहा से एक शब्द भी न बोल सके । बाबा की अन्य लीलाएँ सुनकर उन्हें अपार आनन्द हुआ और वे पूर्णतः बाबा के शरणागत हो गये । सब चिन्ताओं और कष्टों को भूलकर वे परम आनन्दित हुए । उन्होंने वहाँ सुखपूर्वक बारह दिन व्यतीत किये और फिर बाबा की आज्ञा, आशीर्वाद तथा उदी प्राप्त कर अपने घर लौट गये ।

खुशालचन्द (राहातानिवासी)
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ऐसा कहते है कि प्रातःबेला में जो स्वप्न आता है, वह बहुधा जागृतावस्था में सत्य ही निकलता है । ठीक है, ऐसा ही होता होगा । परन्तु बाबा के सम्बन्ध में समय का ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था । ऐसा ही एक उदाहरण प्रस्तुत है – बाबा ने एक दिन तृतीय प्रहर काकासाहेब को ताँगा लेकर राहाता से खुशालचन्द को लाने के लिये भेजा, क्योंकि खुशालचन्द से उनकी कई दोनों से भेंट न हुई थी । राहाता पहुँच कर काकासाहेब ने यह सन्देश उन्हें सुना दिया । यह सन्देश सुनकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि दोपहर को भोजन के उपरान्त थोड़ी देर को मुझे झपकी सी आ गई थी, तभी बाबा स्वप्न में आये और मुझे शीघ्र ही शिरडी आने को कहा । परन्तु घोडे का उचित प्रबन्ध न हो सकने के कारण मैंने अपने पुत्र को यह सूचना देने के लिये ही उनके पास भेजा था । जब वह गाँव की सीमा तक ही पहुँचा था, तभी आप सामने से ताँगे में आते दिखे । वे दोनों उस ताँगे में बैठकर शिरडी पहुँचे तथा बाबा से भेंटकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा की यह लीला देख खुशालचन्द गदगद हो गये ।

बम्बई के रामलाल पंजाबी
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बम्बई के एक पंजाबी ब्राहमण श्री. रामलाला को बाबा ने स्वप्न में एक महन्त के वेश में दर्शन देकर शिरडी आने को कहा । उन्हें नाम ग्राम का कुछ भी पता चल न रहा था । उनको श्री-दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा तो थी, परन्तु पता-ठिकाना ज्ञात न होने के कारण वे बड़े असमंजस में पड़े हुये थे । जो आमंत्रण देता है, वही आने का प्रबन्ध भी करता है और अन्त में हुआ भी वैसा ही । उसी दिन सन्ध्या समय जब वे सड़क पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक दुकान पर बाबा का चित्र टंगा देखा । स्वप्न में उन्हें जिस आकृति वाले महन्त के दर्शन हुए थे, वे इस चित्र के समक्ष ही थे । पूछताछ करने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह चित्र शिरडी के श्री साई समर्थ का है और तब उन्होंने शीघ्र ही शिरडी को प्रस्थान कर दिया तथा जीवनपर्यन्त शिरडी में ही निवास किया । इस प्रकार बाबा ने अपने भक्तों को अपने दर्शन के लिये शिरडी में बुलाया और उनकी लौकिक तथा पारलौकिक समस्त इच्छाँए पूर्ण की ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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