शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 18 March 2017

श्री साईं लीलाएं - साईं बाबा का आशीर्वाद


ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. राघवदास की इच्छा

श्री साईं लीलाएं

साईं बाबा का आशीर्वाद
सुबह-सुबह इंस्पेक्टर गोपालराव अपने दरवाजे पर खड़े थे कि गांव का एक मेहतर अपनी पत्नी के साथ उनके घर के आगे से निकला| जैसे ही उन दोनों की दृष्टि उन पर पड़ी, मेहतरानी अपने पति से बोली - "घर से निकलते ही किस निपूते का मुंह देखा है| पता नहीं हम सही से पहुंच भी पायेंगे या नहीं ? आज रहने दो, कल चलेंगे| मुंह अंधेरे ही निकलेंगे जिससे निपूते का मुंह न देखना पड़े|"

इंस्पेक्टर गोपालराव के दिल को मेहतरानी के ये शब्द तीर की भांति अंदर तक चीरते चले गये| उन्होंने संतान की इच्छा से चार विवाह किए थे| लेकिन एक भी संतान नहीं हुई थी| उन्होंने सोचा था कि शायद कोई कमी है| उन्होंने डॉक्टरों, वैद्यों, हकीमों आदि से इलाज आदि कराया| सब कुछ ठीक था, पर संतान नहीं हो रही थी|

इस घटना ने इंस्पेक्टर गोपालराव को बुरी तरह से झिंझोड़ कर रख दिया था| क्या नहीं था उनके पास-प्रतिष्ठा, जमीन-जायदाद, सरकारी पद, धन सभी कुछ तो था| नौकरी के सिलसिले में जहां भी गए थे, पर्याप्त मान-सम्मान और यश प्राप्त हुआ|

इसके बाद भी संतान न होना बड़े ही दुःख की बात थी|

संतान-प्राप्ति के लिये क्या-क्या नहीं किया-डॉक्टरों की दवाइयां, पंडितों के अनुष्ठान और ओझा, गुनियों के गंडे-ताबीज सभी कुछ बेकार सिद्ध हुए थे|

मेहतरानी की बातें सुनकर उन्हें लगा कि नि:संतान व्यक्ति का जीवन ही बेकार होता है| लोग सुबह उठकर उसका मुंह देखना अशुभ और अपशकुन समझते हैं| जब उन्होंने निश्चय कर लिया कि नौकरी छोड़ देंगे| सारी धन-सम्पत्ति चारों पत्नियों के नाम कर संन्यास लेंगे| यह निश्चय करने के बाद उन्होंने त्याग-पत्र लिखा और गहरे सोच-विचार में डूब गए|

अभी कुछ ही समय बीता था कि दरवाजे पर बाहर गाड़ी रुकने की आवाज सुनाई पड़ी| गोपालराव ने चौंककर दरवाजे की ओर देखा|

"गोपाल, गोपाल !" दरवाजे पर आवाज आयी और दूसरे ही पल उनका मित्र कमरे में आ गया|

"हैलो रामू !" गोपालराव उठकर खड़े हो गए|

"तुम इतनी सुबह-सुबह कैसे ?" गोपालराव ने अपने मित्र का स्वागत करते हुए कहा|

"ट्रेन से अहमदाबाद जा रहा था, लेकिन जैसे ही ट्रेन यहां स्टेशन पर पहुंची, तभी किसी ने मेरे कान में कहा - "रामू, यहीं उतर जा| गोपालराव तुम्हें याद कर रहा है| मैं बिना सोचे-समझ उतर गया| स्टेशन के बाहर आया तो मुझे घोड़ा-गाड़ी भी मिल गई और सीधा तुम्हारे घर चला आया|"

गोपाल अपने मित्र रामू की ओर देखने लगा| उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, यह सब क्या है ?

इस प्रकार एकाएक दोस्त का आ जाना गोपालराव के लिये बहुत आश्चर्य का विषय था|

गोपालराव ने रामू का स्वागत किया| फिर पूछा - "यह बताओ, घर में सब कैसे हैं ?"

"हां, सब कुशल हैं| एकाएक तुम्हारे पास आने का मन हो गया था|"

"ठीक किया, यदि आज न आते तो शायद फिर कभी न मिलना होता|" गोपालराव ने निराशाभरे स्वर में कहा|

"क्यों ?" रामू ने आश्चर्य से पूछा|

"क्या बताऊं !" गोपाल ने भर्राये हुए स्वर में कहा और फिर सुबह की घटना सुना दी|

"मेरी समझ में सब कुछ आ गया| अब जल्दी से तैयार हो जाओ| हम दोनों शिरडी चलेंगे|"

"दो-चार दिन यहीं रुको, फिर शिरडी चलेंगे|" गोपाल ने कहा|

"नहीं| आज ही शिरडी चलेंगे|" रामू ने जोर देते हुए कहा|

रामू के बार-बार जोर देने पर गोपालराव चुप रह गया|

उसने कहा - "तब ठीक है| मैं अभी तैयार हो जाता हूं|"

फिर वह दोनों शिरडी के लिए रवाना हो गये|

इंस्पेक्टर गोपाल और रामू जब शिरडी पहुंचे तो दिन छिप रहा था| द्वारिकामाई मस्जिद में रोशनी की तैयारियां हो रही थीं| साईं बाबा मस्जिद में चबूतरे पर बैठे थे| अनेक शिष्य उनके पास बैठे थे|

तभी गोपाल और रामू ने एक साथ मस्जिद में कदम रखा|

"आओ गोपाल, आओ रामू ! बहुत देर कर दी तुम लोगों ने| तुम तो सुबह दस बज चले थे शायद|" साईं बाबा ने मुस्कराहट के साथ दोनों का स्वागत किया|

गोपाल और रामू ने ठिठक कर एक-दूसरे की ओर देखा| फिर उन्होंने आगे बढ़कर साईं बाबा के चरणों पर अपना सिर रख दिया|

"आज तुम दोनों ने एक साथ पांव छुए हैं| मस्जिद में भी एक साथ कदम रखा| मैं चाहता हूं तुम दोनों की मन की मुरादें भी एक साथ ही पूरी हों|" साईं बाबा ने दोनों को अपने पैरों पर से उठाते हुए कहा|

फिर बाबा ने पास खड़े हाजी सिद्दीकी से कहा - "सिद्दीकी आप तो हज कर आए हैं| बुजुर्ग व्यक्ति हैं और तजुर्बेकार भी| अब तक लाखों व्यक्ति आपकी नजरों के सामने से गुजरे होंगे, इंसान की आपको जबर्दस्त पहचान है| क्या आप यह बता सकते हैं कि इन दोनों में कौन हिन्दू है| और कौन मुसलमान ?"

हाजी सिद्दीकी गोपालराव और रामू के चेहरों को बड़े ध्यान से देखने लगे और कुछ देर बाद बोले - "साईं बाबा, आज तो मेरी बूढ़ी और तजुर्बेकार आँखें भी मुझे धोखा दे रही हैं| मैं नहीं बता सकता हूं कि इन दोनों में से कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान ? मुझे दोनों ही हिन्दू भी दिखाई दे रहे हैं और मुसलमान भी|"

"तुम ठीक कहते हो हाजी ! ये दोनों हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी| मैं भी यही चाहता हूं कि इनका रूप ऐसे ही बना रहे| ये दोनों हिन्दू भी रहें और मुसलमान भी|" साईं बाबा ने हँसते हुए कहा|

"साईं बाबा ! जिस दिन हम दोनों के मन की मुरादें पूरी हो जायेंगी, उस दिन हम ऐसा काम करेंगे, जो समाज के लिए एक मिशाल बनेगी|" रामू ने साईं बाबा के पैर छूकर कहा|

"हां, बाबा ! हम दोनों मित्र मिलकर जिस तरह से एक बन गए हैं, और उसी तरह हिन्दू और मुसलमान भी धर्म के भेद मिटा दें|" गोपाल ने कहा|

रामू का वास्तविक नाम अहमद अली था, पर उसने जानबूझकर अपने को रामू कहना, कहलाना शुरू कर दिया था| उसकी वेषभूषा देखने में सदा मुसलमान के समान रहती थी, पूछने पर वह अपना नाम रामू ही बतलाता था|

"मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद तुम दोनों के साथ हैं|"

साईं बाबा ने उन दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा - "तुम्हारी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी|" साईं बाबा ने उन दोनों को मन से आशीर्वाद दिया|

ठीक नौ महीने बाद एक दिन गोपाल और रामू के घरों पर एक साथ शहनाइयां बज उठीं|

साईं बाबा के आशीर्वाद से दोनों की मनोकामना पूरी हो गई थी|

दोनों के घर एक ही दिन, एक ही समय बच्चे पैदा हुए थे और दोनों ही लड़के थे| यह भी संयोग ही था कि जिस समय गोपाल ने मस्जिद की सीढ़ियों पर कदम रखा, ठीक उसी समय रामू भी मस्जिद की सीढ़ियों पर सामने से आ रहा था|

"ठहरो गोपाल !" रामू ने आवाज दी|

गोपाल रुक गया| दौड़कर रामू के गले लिपट गया - "रामू, आज मैं बहुत खुश हूं| साईं बाबा की कृपा से आज मेरे माथे का कलंक मिट गया| आज तक लोग मेरा मुंह देखना अशुभ समझते थे|"

"और गोपाल, आज सवेरे तुम्हारा एक छोटा-सा भतीजा आ गया|" रामू ने गोपाल को अपनी बांहों में कसकर कहा|

ऐसा लग रहा था, मानो उनको दुनिया की सारी खुशी मिल गयी हो|

दोनों साईं बाबा के आशीर्वाद से पिता बन गये थे|

साईं बाबा ने हम दोनों की मुरादें एक साथ पूरी कर दीं| गोपाल ने हँसते हुए कहा - "अब हम दोनों एक साथ चलकर बाबा को यह खुशखबरी सुनायेंगे|"

दोनों मित्रों ने जैसे ही अगला कदम रखा, मस्जिद की सीढ़ी पर उनके मुंह से एक साथ निकला - "साईं बाबा ! और फिर दोनों ने साईं बाबा के चरण स्पर्श किए|"

साईं बाबा ने दोनों को आशीर्वाद दिया| फिर उनका हाथ पकड़कर अपनी धूनी के पास ले गये|

गोपाल बोला - "साईं बाबा, हम दोनों यह चाहते हैं कि आज से शिरडी में हिन्दू और मुस्लमानों के जितने भी त्यौहार होते हैं, दोनों धर्मों के लोग एक साथ मिलकर उन त्यौहारों को मनाया करें और इसकी शुरूआत इसी राम-नवमी से करना चाहते हैं, क्योंकि इस दिन हिन्दुओं के भगवान राम का जन्मदिन है और मुसलमानों के पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब का भी जन्मदिन है| हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ाने के लिए इस परम्परा के लिए इससे शुभ दिन और कोई नहीं हो सकता|"

"गोपाल की बात का मैं भी समर्थन करता हूं|" नई मस्जिद के इमाम साहब जल्दी से बोले - "मैं शिरडी के मुसलमानों की ओर से आप सबसे वायदा करता हूं कि हिन्दुओं के जितने भी त्यौहार हैं हम लोग भी उन त्यौहारों का भी मनाया करेंगे|"

"ठीक है|" साईं बाबा मुस्कराये और बोले - "मेरे लिये यह सबसे बड़ी खुशी की बात है| दोनों धर्म वालों के बीच भाईचारा स्थापित करना ही मेरा उद्देश्य है, तुम लोग तैयारी करो| कल भगवान राम और हजरत साहब का जन्मदिन एक साथ मनाया जायेगा|"

यह सुनकर मस्जिद में उपस्थित सभी लोग खुशी से फूले न समाए| सबके लिए यह प्रसन्नता के साथ-साथ एकता बढ़ाने की भी महत्वपूर्ण बात थी|
कल चर्चा करेंगे..पानी से दीप जले 
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 17 March 2017

श्री साईं लीलाएं - राघवदास की इच्छा


ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था.. जब सिद्दीकी को अक्ल आयी

श्री साईं लीलाएं



राघवदास की इच्छा

कोपीनेश्वर महादेव के नाम से बम्बई (मुम्बई) के नजदीक थाणे के पास ही भगवन् शिव का एक प्राचीन मंदिर है|
इसी मंदिर में साईं बाबा का एक भक्त उनका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गुणगान किया करता था| मंदिर में आने वाला राघवदास साईं बाबा का नाम और चमत्कार सुनकर ही, बिना उनके दर्शन किए ही इतना अधिक प्रभावित हुआ कि वह उनका अंधभक्त बन चुका था और अंतर्मन से प्रेरणा पाकर निरंतर उनका गुणवान किया करता था|

कई वर्ष पहले उसने साईं बाबा का नाम और उनकी लीलाओं के बारे में सुना था, परंतु परिस्थितिवश वह अब तक बाबा के दर्शन करने जाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त कर सका था| इस बात का उसे दुःख हर समय सताता रहता था|

साईं बाबा की लीलाओं के विषय में सुनाते-सुनाते श्रद्धा से उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती थी| वह मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा - "हे साईं बाबा ! क्या मैं इतना ही दुर्भाग्यशाली हूं, जो मुझे आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा? क्या मैं सदैव ऐसे ही लाचार रहूंगा, जो आपके दर्शन करने के लिए शिरडी आने तक का साधन भी न जुटा सकूंगा ? मामूली-सी नौकरी और उस पर इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी, क्या मुझे कभी इस जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं मिलेगी?"

उसकी आँखों से झर-झर करके आँसू बहे जा रहे थे और वह अपने मन की व्यथा अपने से कई मील दूर अपने आराध्य साईं बाबा को सुनाये जा रहा था| वह तो हर क्षण बस साईं बाबा के दर्शन करने के बारे में ही सोचता रहता था, परंतु धन के अभाव के कारण मजबूर था|

इसी वर्ष उसकी विभागीय परीक्षा भी होनी थी| यदि वह परीक्षा में पास हो गया तो उसकी नौकरी पक्की हो जानी थी| फिर उसके वेतन में वृद्धि हो जाएगी, जिससे उसकी जिम्मेवारियों का बोझ कुछ हल्का हो जाता| वह परीक्षा में सफलता दिलाने के लिए साईं बाबा से प्रार्थना किया करता था|

समय पर परीक्षा हुई और राघवदास की मेहनत और प्रार्थना रंग लाई| नौकरी पक्की हो गयी और वेतन में भी वृद्धि हो गयी| राघवदास अत्यंत प्रसन्न था| अब उसे इस बात का पूरा विश्वास हो गया था कि वह साईं बाबा के दर्शन करने जरूर जा सकेगा|

अब वह अपने रोजमर्रा के खर्चों में कटौती करने लगा| वह एक-एक पैसा देखभालकर खर्च करता था, ताकि वह जल्द-से-जल्द शिरडी आने-जाने लायक रकम इकट्ठी कर सके| राघवदास की लगन ने अपना रंग दिखाया और शीघ्र ही उसके पास शिरडी जाने लायक रकम इकट्टा हो गयी| उसने बाजार जाकर पूरी श्रद्धा के साथ नारियल और मिश्री प्रसाद के लिए खरीदी| फिर अपनी पत्नी से बोला - " अब हम शिरडी जायेंगे|"

पत्नी हैरानी से उका मुंह तांकने लगी|

"शिरडी...|" उसे बड़ी हैरानी हुई|

"हां, शिरडी|" राघवदास ने कहा - "शिरडी जाकर हम वहां साईं बाबा के दर्शन करेंगे|"

"साईं बाबा के दर्शन !" पत्नी ने उदास स्वर में कहा - "मैं तो यह सोच रही थी कि आप मुझे कुछ गहना आदि बनवाकर देंगे|"

"सुन भाग्यवान् ! साईं बाबा से बढ़कर और कोई दूसरा गहना इस दुनिया में नहीं है| तू चल तो सही, फिर तुझे असली और नकली गहनों के अंतर के बारे में पता चल जायेगा|"

फिर वह अपनी पत्नी को साथ लेकर शिरडी के लिए चल दिया| वह पूरी यात्रा में साईं बाबा का गुणगान करता रहा| शिरडी की धरती पर कदम रखते ही वह चिंता से मुक्त हो गया| उसे ऐसा लगा जैसे उसने इस धरती का सबसे बड़ा खजाना पा लिया हो| वह अपने को बहुत भाग्यशाली मान रहा था|

वह रात में शिरडी पहुंचा था| सुबह होने के इंतजार में उसने सारी रात साईं बाबा का गुणवान करते-करते काट दी| साईं बाबा के प्रति उसकी श्रद्धा-भक्ति देखकर सभी हैरान थे| सुबह होते ही पति-पत्नी जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो गए और फिर नारियल और मिश्री लेकर साईं बाबा के दर्शन के लिए चल दिए|

द्वारिकामाई मस्जिद में पहुंचते ही साईं बाबा ने अपनी सहज और स्वाभाविक वात्सल्यभरी मुस्कान के साथ राघवदास और उसकी पत्नी का स्वागत करते हुए बोले - "आओ राघव, तुम्हें देखने के लिए मेरा मन कब से बेचैन था| बहुत अच्छा हुआ कि तुम आ गए|"

राघवदास और उसकी पत्नी दोनों ने श्रद्धा के साथ साईं बाबा के चरण स्पर्श किए और फिर नारियल और मिश्री उनके चरणों में अर्पित की|

राघवदास और उसकी पत्नी बड़े आश्चर्यचकित थे कि साईं बाबा को उनका नाम कैसे मालूम हुआ ? वे तो अपने जीवन में पहली बार शिरडी आए थे|

"बैठो राघवदास बैठो|" साईं बाबा ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर आशीर्वाद देते हुए कहा - "तुम दोनों बेवजह इतने परेशान क्यों हो ? आज तुमने मुझे प्रत्यक्ष रूप से पहली बार देखा है, लेकिन फिर भी तुम मुझे पहचानते थे| ठीक इसी तरह मैं भी तुम दोनों से न जाने कब से परिचित हूं| तुम दोनों को मैं कई वर्षों से जानता-पहचानता हूं|"

राघवदास और उसकी पत्नी राधा की खुशी का कोई ठिकाना न रहा| वे स्वयं को बहुत धन्य मान रहे थे| बाबा के शिष्य उनके पास ही बैठे थे| बाबा ने उनकी ओर देखकर कहा - "आज हम चाय पियेंगे| चाय बनवाइए|"

राघवदास भाव-विभोर होकर बाबा के चरणों से लिपट गया और उसकी आँखों से प्रसन्नता के मारे अश्रुधारा बह निकली और वह रुंधे गले से बोला - "बाबा ! आप तो अंतर्यामी हैं| आज आपके दर्शनों का शौभाग्य प्राप्त कर मुझे सब कुछ मिल गया| मैं धन्य हो गया| अब मेरे मन में और किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा बाकी नहीं है|"

"अरे राघवदास, तुम जैसे लोग इस संसार में बस गिनती भर के हैं| मेरे मन में सदा ऐसे लोगों के लिए जगह रहती है| अब तुम जब भी शिरडी आना चाहो, आ जाना|"

तभी शिष्य चाय लेकर आ गया| साईं बाबा ने राघवदास और उसकी पत्नी राधा को अपने हाथों से चाय डालकर दी| फिर राघवदास द्वारा लाई नारियल और मिश्री साईं बाबा ने वहां बैठे भक्तों में बांट दी|

राघवदास और राधा को प्रसाद देने के बाद साईं बाबा ने अपनी जेब में हाथ डाला और उसमें से दो सिक्के निकाले| एक सिक्का उन्होंने राघवदास को और एक सिक्का राधा को दिया और फिर हँसते हुए बोले - "इन रुपयों को तुम अपने पूजाघर में संभालकर अलग-अलग रख देना| इनको खो मत देना| मैंने पहले भी तुम्हें दो रुपये दिये थे, लेकिन तुमने वह खो दिए| यदि वे रुपए खोए होते तो तुम्हें कोई कष्ट न होता| अब इनको अच्छी तरह से संभालकर रखना|"

राघवदास और राधा दोनों ने रुपये अच्छी तरह से संभालकर रखे और फिर साईं बाबा को प्रणाम करके उनसे चलने के लिए आज्ञा प्राप्त की|

द्वारिकामाई मस्जिद से बाहर आते ही राघवदास और राधा को एकदम से याद आया, बाबा ने कहा था कि मैंने तुम्हें पहले भी दो रुपये दिये थे, लेकिन तुमने खो दिए| पर हमने तो साईं बाबा के दर्शन आज जीवन में पहली बार किए हैं| फिर बाबा ने हमें दो रुपये कब दिये थे ? उन्होंने एक-दूसरे से पूछा| इन रुपयों वाली बात उनकी समझ में नहीं आयी|

घर पर आने के बाद राघवदास ने अपने माता-पिता को शिरडी यात्रा की सारी बातें विस्तार से बताने के बाद बाबा द्वारा दो रुपये दिये जाने वाली बात भी बतायी|

तब रुपयों की बात सुनकर राघवदास के माता-पिता की आँखों में आँसू भर आये| उसके पिता ने कहा - "साईं बाबा ने सत्य कहा है, आज से कई वर्ष पूर्व मंदिर में एक महात्मा जी आए थे| वह मंदिर में कुछ दिनों के लिए रुके थे| यह उस समय की बात है जब तुम बहुत छोटे थे| लोग उन्हें भोले बाबा कहकर बुलाया करते थे| एक दिन उन्होंने मुझे और तुम्हारी माँ को चांदी का एक-एक सिक्का दिया था और कहा था कि इन रुपयों को अपने पूजाघर में रख देना| कई वर्ष तक हम उन रुपयों की पूजा करते रहे और हमारे घर में धन भी निरंतर आता रहा| हमें किसी चीज की कोई कमी नहीं रही, पर मेरी बुद्धि अचानक फिर गई| मैं ईश्वर को भूल गया और पूजा-पाठ भी करना छोड़ दिया था|"

"दीपावली के दिन मैंने पूजाघर में देखा तो वह दोनों रुपये अपनी जगह पर नहीं थे| मैंने सब जगह पर उन्हें ढूंढा, पर वह कहीं नहीं मिले| उन रुपयों के गायब होते ही जैसे हमारे घर पर शनि की क्रूर दृष्टि पड़ गई| व्यापार ठप्प होता चला गया| मकान, दुकान, जेवर आदि सब कुछ बिक गए| हमें बड़ी गरीबी में दिन बिताने पड़े|"

राघवदास ने वह दोनों रुपये निकालकर अपने पिता की हथेली पर रख दिए| उन्होंने बार-बार उन रुपयों को अपने माथे से लगाया, चूमा और बिलख-बिलखकर रोने लगे|

साईं बाबा के आशीर्वाद से अब फिर से राघवदास के परिवार के दिन बदलने लगे| उसे अपने ऑफिस में उच्च पदक की प्राप्ति हो गयी| वह हर माह साईं बाबा के दर्शन करने शिरडी जाता था| साईं बाबा के आशीर्वाद से उसके परिवार की मान-प्रतिष्ठा, सुख-समृद्धि फिर से लौट आयी थी|



कल चर्चा करेंगे..साईं बाबा का आशीर्वाद
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 16 March 2017

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 31

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा |


किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 31

मुक्ति-दान
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1. सन्यासी विरजयानंद
2. बालाराम मानकर
3. नूलकर
4. मेघा और
5. बाबा के सम्मुख बाघ की मुक्त

इस अध्याय में हेमाडपंत बाबा के सामने कुछ भक्तों की मृत्यु तथा बाघ के प्राण-त्याग की कथा का वर्णन करते है ।

प्रारम्भ

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मृत्यु के समय जो अंतिम इच्छा या भावना होती है, वही भवितव्यता का निर्माण करती है । श्री कृष्ण ने गीता (अध्याय-8) में कहा है कि जो अपने जीवन के अंतिम क्षण में मुझे सम्रण करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है तथा उस समय वह रजो कुछ भी दृश्य देखता है, उसी को अन्त में पाता है । यह कोई भी निश्चयात्मक रुप से नहीं कह सकता कि उस क्षण हम केवल उत्तम विचार ही कर सकेंगे । जहाँ तक अनुभव में आया है, ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय अनेक कारणों से भयभीत होने की संभावना अधिक होती है । इसके अनेक कारण है । इसलिये मन को इच्छानुसार किसी उत्तम विचार के चिंतन में ही लगाने के लिए नित्याभ्यास अत्यन्त आवश्यक है । इस कारण सभी संतों ने हरिस्मरण और जप को ही श्रेष्ठ बताया है, ताकि मृत्यु के समय हम किसी घरेलू उलझन में न पड़ जायें । अतः ऐसे अवसर पर भक्तगण पूर्णतः सन्तों के शरणागत हो जाते है, ताकि संत, जो कि सर्वज्ञ है, उचित पथप्रदर्शन कर हमारी यथेष्ठ सहायता करें । इसी प्रकार के कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते है ।

1. विजयानन्द
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एक मद्रसी सन्यासी विजयानंद मानसरोवर की यात्रा करने निकले । मार्ग में वे बाबा की कीर्ति सुनकर शिरडी आये, जहाँ उनकी भेंट हरिद्घार के सोमदेव जी स्वामी से हुई और इनसे उन्होंने मानसरोवर की यात्रा के सम्बन्ध में पूछताछ की । स्वामीजी ने उन्हें बताया कि गंगोत्री से मानसरोवर 500 मील उत्तर की ओर है तथा मार्ग में जो कष्ट होते है, उनका भी उल्लेख किया जैसे कि बर्फ की अधिकता, 50 कोस तक भाषा में भिन्नता तथा भूटानवासियों के संशयी स्वभाव, जो यात्रियों को अधिक कष्ट पहुँचाया करते है । यह सब सुनकर सन्यासी का चित्त उदास हो गयाऔर उसने यात्रा करने का विचार त्यागकर मसजिद में जाकर बाबा के श्री चरणों का स्पर्श किया । बाबा क्रोधित होकर कहने लगे – इस निकम्मे सन्यासी को निकालो यहाँ से । इसका संग करना व्यर्थ है । सन्यासी बाबा के स्वभाव से पूर्ण अपरिचित था । उसे बड़ी निराशा हुई, परन्तु वहाँ जो कुछ भी गतिविधियाँ चल रही थी, उन्हें वह बैठे-बैठे ही देखता रहा । प्रातःकाल का दरबार लोगों से ठसाठस भरा हुआ था और बाबा को यथाविधि अभिषेक कराया जा रहा था । कोई पाद-प्रक्षालन कर रहा था तो कोई चरणों को छूकर तथा कोई तीर्थस्पर्श से अपने नेत्र सफल कर रहा था । कुछ लोग उ्हें चन्दन का लेप लगा हे थे तो कोई उनके शरीर में इत्र ही मल रहा था । जातिपाँति का भेदभाव भुलाकर सब भक्त यह कार्य कर रहे थे । यघपि बाबा उस पर क्रोधित हो गये थे तो भी सन्यासी के हृदय में उनके प्रति बड़ा प्रेम उत्पन्न हो गया था । उसे यह स्थान छोड़ने की इच्छा ही न होती थी । दो दिन के पश्चात् ही मद्रास से पत्र आया कि उसकी माँ की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है, जिसे पढ़कर उसे बड़ी निराशा हुई और वह अपनी माँ के दर्शन की इच्छा करने लगा, परन्तु बाबा की आज्ञा के बिना वह शिरडी से जा ही कैसे सकता था । इसलिये वह हाथ में पत्र लेकर उनके समीप गया और उनसे घर लौटने की अनुमति माँगी । त्रिकालदर्शी बाबा को तो सबका भविष्य विदित ही था । उन्होंने कह कि जब तुम्हें अपनी माँ से इतना मोह था तो फिर सन्यास धारण करने का कष्ट ही क्यों उठाया । ममता या मोह भगवा वस्त्रधारियों को क्या शोभा देता है । जाओ, चुपचाप अपने स्थान पर रहकर कुछ दिन शांतिपूर्वक बिताओ । परन्तु सावधान । वाड़े में चोर अधिक है । इसलिए द्घार बंद कर सावधानी से रहना, नहीं तो चोर सब कुछ चुराकर ले जायेंगे । लक्ष्मी यानी संपत्ति चंचला है और यह शरीर भी नाशवान् है, ऐसा ही समझ कर इहलौकिक व पालौकिक समस्त पदार्थों का मोह त्याग कर अपना कर्त्व्य करो । जो इस प्रकार का आचरण कर श्रीहरि के शरणागत हो रजाता है, उसका सब कष्टों से शीघ्र छुटकार हो उसे परमानंद की प्राप्ति हो जाती है । जो परमात्मा का ध्यान व चिंतन प्रेंम और भक्तिपूर्वक करता है, परमात्मा भी उसकी अविलम्ब सहायता करते है । पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों के फलस्वरुप ही तुम यहाँ पहुँचे हो और अब जो कुछ मैं कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और अपने जीवन के अंतिम ध्येय पर विचार करो । इच्छारहित होकर कल से भागवत का तीन सप्ताह तक पठन-पाठन प्रारम्भ करो । तब भगवान् प्रसन्न होंगे और तुम्हारे सब दुःख दूर कर देंगे । माया का आवरण दूर होकर तुम्हें शांति प्राप्त होगी । बाबा ने उसका अंतकाल समीप देखकर उसे यह उपचार बता दिया और साथ ही रामविजय पढ़ने की भी आज्ञा दी, जिससे यमराज अधिक प्रसन्न् होते है । दूसरे दिन स्नानादि तथा अन्य शुद्घि के कृत्य कर उसने लेंडी बाग के एकांत स्थान में बैठकर भागवत का पाठ आरम्भ कर दिया । दूसरी बार का पठन समाप्त होने पर वह बहुत थक गया और वाड़े में आकर दो दिन ठहरा । तीसरे दिन बड़े बाबा की गोद में उसके प्राण पखेरु उड़े गये । बाबा ने दर्शनों के निमित्त एक दिन के लिये उसका शरीर सँभाल कर रखने के लिये कहा । तत्पश्चात् पुलिस आई और यथोचित्त जाँच-पडताल करने के उपरांत मृत शरीर को उठाने की आज्ञा दे दी । धार्मिक कृत्यों के साथ उसकी उपयुक्त स्थान पर समाधि बना दी गई । बाबा ने इस प्रकार सन्यासी की सहायता कर उसे सदगति प्रदान की ।

2. बालाराम मानकर
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बालाराम मानकर नामक एक गृहस्थबाबा के परम भक्त थे । जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया तो वो बड़े निराश हो गये और सब घरबार अपने लड़के को सौंप वे शिरडी में आकर बाबा के पास रहने लगे । उनकी भक्ति देखकर बाबा उनके जीवन की गति परिवर्तित कर देना चाहते थे । इसीलिये उन्होंने उन्हें बारह रुपये देकर मच्छिंग्रगढ़ (जिला सातार) में जाकर रहने को कहा । मानकर की इच्छा उनका सानिध्य छोड़कर अन्यत्र कहीं जाने की न ती, परन्तु बाबा ने उन्हें समझाया कि तुम्हारे कलायाणार्थ ही मैं यह उत्तम उपाय तुम्हें बतलता रहा हूँ । इसीलिये वहाँ जाकर दिन में तीन बार प्रभु का ध्यान करो । बाबा के शब्दों में व्श्वास कर वह मच्छंद्रगढ़ चाल गया और वहाँ के मनोहर दृश्यों, शीतल जल तथा उत्तम पवन और समीपस्थ दृश्यों को देखकर उसके चित्त को बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा द्घारा बतलाई विधि से उसने प्रभु का ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया और कुछ दिनों पश्चात् ही उसे दर्शन प्राप्त हो गया । बहुधा भक्तों को समाधि या तुरीयावस्था में ही दर्शन होते है, परन्तु मानकर जब तुरीयास्था से प्राकृतावस्था में आया, तभी उसे दर्शन हुए । दर्शन होने के पश्चात् मानकर ने बाबा से अपने को वहाँ भेजने का कारण पूछा । बाबा ने कहा कि शिरडी में तुम्हारे मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठने लगे थे । इसी कारण मैंने तुम्हें वहाँ भेजा कि तुम्हारे चंचल मन को शांति प्राप्त हो । तुम्हारी धारणा थी कि मैं शिरडी में ही विघमान हूँ और साढ़ेतीन हाथ के इस पंचतत्व के पुतले के अतिरिक्त कुछ नही हूँ, परन्तु अब तुम मुझे देखकर यह धारणा बना लो कि जो तुम्हारे सामने शिरडी में उपस्थित है और जिसके तुमने दर्शन किये, वह दोनों अभिन्न है या नहीं । मानकर वह स्थान छोडकर अपने निवास स्थान बाँद्रा को रवाना हो गया । वह पूना से दादर रेल द्घारा जाना चाहता था । परन्तु जब वह टिकट-घर पर पहुँचा तो वहाँ अधिक भीड़ होने के कारण वह टिकट खरीद न सका । इतने में ही एक देहाती, जिसके कंधे पर एक कम्बल पड़ा था तथा शरीर पर केवल एक लंगोटी के अतिरिक्त कुछ न था, वहाँ आया और मानकर से पूछने लगा कि आप कहाँ जा रहे है । मानकर ने उत्तर दिया कि मैं दादर जा रहा हूँ । तब वह कहने लगा कि मेरा यह दादर का टिकट आप ले लीजिय, क्योंकि मुझे यहाँ एक आवश्यक कार्य आ जाने के कारण मेरा जाना आज न हो सकेगा । मानकर को टिकट पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई और अपनी जेब से वे पैसे निकालने लगे । इतने में ही टिकट देने वाला आदमी भीड़ में कहीं अदृस्य हो गया । मानकर ने भीड़ में पर्याप्त छानबीन की, परन्तु सब व्यर्थ ही हुआ । जब तक गाड़ी नहीं छूटी, मानकर उसके लौटने की ही प्रतीक्षा करता रहा, परन्तु वह अन्त तक न लौटा । इस प्रकार मानकर को इस विचित्र रुप में द्घितीय बार दर्शन हुए । कुछ दिन अपने घर ठहरकर मानकर फिर शिरडी लौट आया और श्रीचरणों में ही अपने दिन व्यतीत करने लगा । अब वह सदैव बाबा के वचनों और आज्ञा का पालन करने लगा । अन्ततः उस भाग्यशाली ने बाबा के समक्ष ही उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने प्राण त्यागे ।

3. तात्यासाहेब नूलकर
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हेमाडपंत ने तात्यासाहेब नूलकर के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं लिखा है । केवल इतना ही लिखा है कि उनका देहांत शिरडी में हुआ था । साईलीला पत्रिका में संक्षिप्त विवरण प्रकाशित हुआ था, रजो नीचे उद्घृत है – सन 1909 में जिस समय तात्यासाहेब पंढरपुर में उपन्यायाधीश थे, उसी समय नानासाहेब चाँदोरकर भी वहाँ के मामलतदार थे । ये दोनो आपस में बहुधा मिला करते और प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया करते थे । तात्यासाहेब सन्तों में अविश्वास करते थे, जबकि नानासाहेब की सन्तों के प्रति विशेष श्रद्घा थी । नानासाहेब ने उन्हें साईबाबा की लीलाएँ सुनाई और एक बार शिरडी जाकर बाब का दर्शन-लाभ उठाने का आग्रह भी किया । वे दो शर्तों पर चलने को तैयार हुए –

1. उन्हें ब्राहमण रसोइया मिलना चाहिये ।

2. भेंट के लिये नागपुरसे उत्तम संतरे आना चाहिये ।

शीघ्र ही ये दोनों शर्ते पूर्ण हो गयी । नानासाहेब के पास एक ब्राहमण नौकरी के लिये आया, जिसे उन्होंने तात्यासाहेब के पास भिजवा दिया और एक संतरे का पार्सन भी आया, जिसपर भेजने वाले का कोई पता न लिखा था । उनकी दोनों शर्ते पूरी हो गई थी । इसीलिये अब उन्हें शिरडी जाना ही पड़ा । पहले तो बाबा उन पर क्रोधित हुए, परन्तु जब धीरे-धीरे तात्यासाहेब को विश्वास हो गया कि वे सचमुच ही ईश्वरावतार है तो वे बाबा से प्रभावित हो गये और फिर जीवनपर्यन्त वहीं रहे । जब उनका अन्तकाल समीप आया तो उन्हें पवित्र धार्मिक पाठ सुनाया गया और अंतिम क्षणों में उन्हें बाबा का पद तीर्थ भी दिया गया । उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर बाबा बोल उठे – अरे तात्या तो आगे चला गया । अब उसका पुनः जन्म नहीं होगा ।

4. मेघा
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28वे अध्याय में मेघा की कथा का वर्णन किया जा चुका है । जब मेघा का देहांत हुआ तो सब ग्रामबासी उनकी अर्थी के साथ चले और बाबा भी उनके साथ सम्मिलित हुए तथा उन्होंने उसके मृत शरीर पर फूल बरसाये । दाह-संस्कार होने के पश्चात् बाबा की आँखों से आँसू गिरने लगे । एक साधारण मनुष्य के समान उनका भी हृदय दुःख से विदीर्ण हो गया । उनके शरीर को फूलों से ढँककर एक निकट समबन्धी के सदृश रोते-पीटते वे मसजिद को लौटे । सदगति प्रदान करते हुए अनेक संत देखने में आये है, परन्तु बाबा की महानता अद्घितीय ही है । यहाँ तक कि बाघ सरीखा एक हिंसक पशु भी अपनी रक्षा के लिये बाबा की शरण में आया, जिसका वृतान्त नीचे लिखा है -

 5. बाघ की मुक्ति

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बाबा के समाधिस्थ होने के सात दिन पूर्व शिरडी में एक विचित्र घटना घटी । मसजिद के सामने एक बैलगाड़ी आकर रुकी, जिसपर एक बाघ जंजीरों से बँधा हुआ था । उसका भयानक मुख गाड़ी के पीछे की ओर था । वह किसी अज्ञात पीड़ा या दर्द से दुःखी था । उसके पालक तीन दरवेश थे, जो एक गाँव से दूसरे गाँव में जाकर उसके नित्य प्रदर्शन करते और इस प्रकार यथेएष्ठ द्रव्य संचय करते थे और यही उनके जीविकोवपार्जन का एक साधन था । उन्होंने उसकी चिकित्सा के सभी प्रयत्न किये, परन्तु सब कुछ व्यर्थ हुआ । कहीं से बाबा की कीर्ति भी उनके कानों में पड़ गई और वे बाघ को लेकर साई दरबार में आये । हाथों से जंजीरें पकड़कर उन्होंने बाघ को मसजिद के दरवाजे पर खड़ा कर दिया । वह स्वभावतः ही भयानक था, पर रुग्ण होने के कारण वह बेचैन था । लोग भय और आश्चर्य के साथ उसकी ओर देखने लगे । दरवेश अन्दर आये और बाबा को सब हाल बताकर उनकी आज्ञा लेकर वे बाघ को उनके सामने लाये । जैसे ही वह सीढ़ियों के समीप पहुँचा, वैसे ही बाबा के तेजःपुंज स्वरुप का दर्शन कर एक बार पीछे हट गया और अपनी गर्दन नीचे झुका दी । जब रदोनों की दृष्टि आपस में एक हुई तो बाघ सीढ़ी पर चढ़ गया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से बाबा की ओर निहारने लगा । ुसने अपनी पूँछ हिलाकर तीन बार जमीन पर पटकी और फिर तत्क्षम ही अपने प्राण त्याग दिये । उसे मृत देखकर दरवेशी बड़े निराश और दुःखी हुए । तत्पश्चात जब उन्हें बोध हुआ तो उन्होंने सोचा कि प्राणी रोगग्रस्त थी ही और उसकी मृत्यु भी सन्निकट ही थी । चलो, उसके लिये अच्छा ही हुआ कि बाबा सरीखे महान् संत के चरणों में उसे सदगति प्राप्त हो गई । वह दरवेशियों का ऋणी था और जब वह ऋम चुक गया तो वह स्वतंत्र हो गया और जीवन के अन्त में उसे साई चरणों में सदगति प्राप्त हुई । जब कोई प्राणीससंतों के चरणों पर अपना मस्तक रखकर प्राण त्याग दे तो उसकी मुक्ति हो जाती है । पूर्व जन्मों के शुभ संस्कारों के अभाव में ऐसा सुखद अंत प्राप्त होना कैसे संभव है ।


।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 15 March 2017

श्री साईं लीलाएं - जब सिद्दीकी को अक्ल आयी

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. बाबा के श्रीचरणों में प्रयाग

श्री साईं लीलाएं




जब सिद्दीकी को अक्ल आयी
इसी प्रकार एक मुसलमान सिद्दीकी की बड़ी इच्छा थी कि किसी तरह वह मुसलमानों के पवित्र तीर्थ मक्का-मदीना कीई यात्रा पर जाए| पर, उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी न थी कि वह हज के लिए पैसा इकट्ठा कर पाता| फिर भी वह इच्छा कर रहा था| वह प्रतिदिन द्वारिकामाई मस्जिद में पौधों को पानी देता था| साईं बाबा की धूनी के लिए भी जंगल से लकड़ियां काटकर लाता था| इस आशा से कि कभी साईं बाबा की उस पर कृपा हो जाए और वह हज की मुराद पूरी कर दें|

एक दिन सिद्दीकी द्वारिकामाई मस्जिद के फर्श को पानी से धो रहा था कि अचानक साईं बाबा आ गए| साफ-सुथरा फर्श देखा, तो हंसकर बोले - "फर्श की सफाई करने में तुम बहुत ही माहिर हो| तुम्हें तो काबा में होना चाहिए था|"

"मेरा ऐसा नसीब कहां|" सिद्दीकी ने साईं बाबा के चरण छूते हुए कातर स्वर में कहा|

"चिंता न करो सिद्दीकी| तुम काबा अवश्य ही जाओगे| बस समय का इंतजार करो|" -साईं बाबा ने सिद्दीकी के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा|

उस दिन से सिद्दीकी काबा जाने का सपना देखने लगा| सोते-जागते, उठते-बैठते उसे हर समय दिखाई देता कि वह काबे में है|

सिद्दीकी की छोटी-सी दुकान थी| जो सामान्य ढंग से चलती थी| पर साईं बाबा के आशीर्वाद से उसी दिन से दुकान पर ग्राहकों की भीड़ आश्चर्यजनक ढंग से आने लगी और कुछ ही महीनों में उसके पास हज यात्रा पर जाने के लायक रुपये इकट्ठा हो गये|

फिर क्या था, वह मक्का-मदीना शरीफ की ओर चल पड़ा| कुछ महीनों बाद सिद्दीकी हज कर लौट आया| अब वह हाजी सिद्दीकी कहलाने लगा| लोग उसे बड़े आदर-सम्मान के साथ हाजी जी कहकर बुलाते थे|

सिद्दीकी को हज से आने के बाद अहंकार हो गया था| कई दिन बीत गए वह साईं बाबा के पास भी नहीं गया और द्वारिकामाई मस्जिद भी नहीं गया|

एक दिन बाबा ने अपने शिष्यों से कहा - "हाजी दिखलायी दे तो उससे कह देना कि इस मस्जिद में कभी न आए|"

इस बात को सुनकर शिष्य परेशान हो गये कि साईं बाबा ने आज तक किसी को भी मस्जिद में आने से नहीं रोका| केवल हाजी सिद्दीकी के लिए ही ऐसा क्यों कहा है ?

हाजी सिद्दीकी को साईं बाबा की बात बता दी गई| साईं बाबा की सुनकर हाजी सिद्दीकी को बहुत दुःख हुआ| हज से लौटने के बाद उसने साईं बाबा के पास न जाकर बहुत बड़ी भूल की है| उन्हीं की कृपा से तो उसे हज यात्रा नसीब हुई थी| वह मन-ही-मन बहुत घबरा गया| साईं बाबा का नाराज होना, उसके मन में घबराहट पैदा करने लगा| किसी अनिष्ट की आशंका से वह रह-रहकर भयभीत होने लगा|

उसने निश्चय किया कि वह साईं बाबा से मिलने के लिये अवश्य ही जायेगा| साईं बाबा नाराज हैं| उनकी नाराजगी दूर करना मेरे लिए बहुत जरूरी है|

सिद्दीकी ने हिम्मत की और वह द्वारिकामाई मस्जिद की ओर चल पड़ा|

हाजी सिद्दीकी ने डरते-सहमते मस्जिद में कदम रखा| हाजी को देखते ही बाबा को क्रोध आ गया| साईं बाबा का क्रोध देखकर वह कांप उठा| साईं बाबा ने घूरकर उसे देखा| हाजी बुरी तरह से थर्राह गया| फिर भी वह साहस बटोरकर डरते-डरते पास गया और साईं बाबा के चरणों पर गिर पड़ा|

"सिद्दीकी तुम हज कर आए, लेकिन क्या तुम जानते हो कि हाजी का मतलब क्या होता है ?" साईं बाबा ने क्रोधभरे स्वर में पूछा|

"नहीं बाबा ! मैं तो अनपढ़ जाहिल हूं|" हाजी सिद्दीकी ने दोनों हाथ जोड़कर बड़े विनम्र स्वर में कहा|

"हाजी का मतलब होता है, त्यागी| तुममें त्याग की भावना है ही नहीं ? हज के बाद तुममें विनम्रता पैदा होने चाहिए थी, बल्कि अहंकार पैदा हो गया है| तुम अपने आपको बहुत ऊंचा और महान् समझने लगे| हज करने के बाद भी जिस व्यक्ति का मन स्वार्थ और अहंकार में डूबा रहता है, वह कभी हाजी नहीं हो सकता|"

"मुझे क्षमा कर दो साईं बाबा ! मुझसे गलती हो गयी|" हाजी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा और वह बाबा के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा| वह मन-ही-मन पश्चात्ताप कर रहा था| उसकी आँखें भर आयी थीं| साईं बाबा के पास आकर उसने अपनी गलती स्वीकार का ली थी|

"सुनो हाजी, याद रखो कि इस दुनिया को बनाने वाला एक ही खुदा या परमात्मा है| इस दुनिया में रहने वाले सब इंसान, पशु-पक्षी उसी के बनाए हुए हैं| पेड़-पौधे, पहाड़, नदियां उसी की कारीगरी का एक नायाब नमूना हैं| यदि हम किसी को अपने से छोटा या नीचा समझते हैं, तो हम उस खुदा की बेअदबी करते हैं|"

साईं बाबा ने हाजी से कहा - "यदि तुमने अपना ख्याल या नजरिया न बदला तो हज करना बेकार है| खुदा की इबादत करते हैं हम| इबादत का मतलब यही है कि हर मजहब और हरेक इंसान को अपने बराबर समझो|"

हाजी सिद्दीकी ने साईं बाबा के चरणों पर सिर रख दिया और बोला - "साईं बाबा ! मुझे माफ कर दीजिये, आगे से आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगा|"
परसों चर्चा करेंगे..राघवदास की इच्छा



ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 14 March 2017

श्री साईं लीलाएं - बाबा के श्रीचरणों में प्रयाग

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. तुम्हारी जेब में पैसा-ही-पैसा

श्री साईं लीलाएं


बाबा के श्रीचरणों में प्रयाग

साईं बाबा अपने शिष्य के साथ बैठे आध्यात्मिक विषय पर बातें कर रहे थे कि तभी एक बूढ़ा व्यक्ति रोता-पीटता आया और हाथ जोड़कर साईं बाबा के सामने आकर जोर-जोर से रोने लगा|

"क्या हो गया बाबा ?" - एक शिष्य ने उस बूढ़े से पूछा|

"मेरा जवान लड़का मर गया| मेरे पास उसे कफन-दफन करने के लिए एक पैसा भी नहीं|" वह निरंतर आँसू बहाये जा रहा था|

साईं बाबा ने उसकी ओर देखा और पूछा -


"
कब मरा लड़का ?"
"आज दोपहर| मैं कई जगह गया, पर किसी ने मेरी कोई मदद नहीं की|"

"जब तुम्हारे पास स्वयं ही इतने सारे रुपये हैं, तो कोई तुम्हारी मदद क्यों करता|" यह कहकर साईं बाबा हँसने लगे|

"साईं बाबा !" बूढ़ा गिड़गिड़ाकर बोला - "मेरे पास तो इस समय एक फूटी कौड़ी भी नहीं है|"

"झूठ बोलते हो|" साईं बाबा ने कहा - "अपनी जेब में हाथ डालो| वहां पैसा-ही-पैसा भरा पड़ा है|"

जब उस बूढ़े ने जेब में हाथ डाला, अचानक ढेरसारे नोट निकल आये| वह हैरानी से देखता रह गया| आश्चर्य के मारे आँखें फटी-सी रह गयीं|

"जाओ, अपना काम करो|" साईं बाबा ने कहा|

वह बूढ़ा साईं बाबा की जय-जयकार करता वहां से चला गया| सारे शिष्य हैरानी के साथ सारा दृश्य देखते रह गये| उस बूढ़े की फटी हुई जेब से रुपया-ही-रुपया निकलना बहुत ही आश्चर्य की बात थी| सबने इसे साईं बाबा का एक चमत्कार माना और बाबा कि जय-जयकार करने लगे| साईं बाबा का यह चमत्कार अद्भुत था|



कल चर्चा करेंगे..जब सिद्दीकी को अक्ल आयी


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 13 March 2017

श्री साईं लीलाएं - तुम्हारी जेब में पैसा-ही-पैसा

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. तात्या को बाबा का आशिर्वाद

श्री साईं लीलाएं

आप सभी कों रंगों के इस पावन पर्व होली की हार्दिक शुभ कामनायें 

तुम्हारी जेब में पैसा-ही-पैसा

साईं बाबा अपने शिष्य के साथ बैठे आध्यात्मिक विषय पर बातें कर रहे थे कि तभी एक बूढ़ा व्यक्ति रोता-पीटता आया और हाथ जोड़कर साईं बाबा के सामने आकर जोर-जोर से रोने लगा|

"क्या हो गया बाबा ?" - एक शिष्य ने उस बूढ़े से पूछा|

"मेरा जवान लड़का मर गया| मेरे पास उसे कफन-दफन करने के लिए एक पैसा भी नहीं|" वह निरंतर आँसू बहाये जा रहा था|

साईं बाबा ने उसकी ओर देखा और पूछा -


"
कब मरा लड़का ?"
"आज दोपहर| मैं कई जगह गया, पर किसी ने मेरी कोई मदद नहीं की|"

"जब तुम्हारे पास स्वयं ही इतने सारे रुपये हैं, तो कोई तुम्हारी मदद क्यों करता|" यह कहकर साईं बाबा हँसने लगे|

"साईं बाबा !" बूढ़ा गिड़गिड़ाकर बोला - "मेरे पास तो इस समय एक फूटी कौड़ी भी नहीं है|"

"झूठ बोलते हो|" साईं बाबा ने कहा - "अपनी जेब में हाथ डालो| वहां पैसा-ही-पैसा भरा पड़ा है|"

जब उस बूढ़े ने जेब में हाथ डाला, अचानक ढेरसारे नोट निकल आये| वह हैरानी से देखता रह गया| आश्चर्य के मारे आँखें फटी-सी रह गयीं|

"जाओ, अपना काम करो|" साईं बाबा ने कहा|

वह बूढ़ा साईं बाबा की जय-जयकार करता वहां से चला गया| सारे शिष्य हैरानी के साथ सारा दृश्य देखते रह गये| उस बूढ़े की फटी हुई जेब से रुपया-ही-रुपया निकलना बहुत ही आश्चर्य की बात थी| सबने इसे साईं बाबा का एक चमत्कार माना और बाबा कि जय-जयकार करने लगे| साईं बाबा का यह चमत्कार अद्भुत था|





कल चर्चा करेंगे..बाबा के श्रीचरणों में प्रयाग

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 12 March 2017

होली की हार्दिक शुभकामनायें


ॐ साँईं राम जी

आओ बाबा जी आज होली खेलें





आप सभी को स्नेह और प्रेम के पावन पर्व होली की
हार्दिक शुभकामनायें

श्री साईं लीलाएं - तात्या को बाबा का आशीर्वाद

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. ब्रह्म ज्ञान को पाने का सच्चा अधिकारी

श्री साईं लीलाएं

तात्या को बाबा का आशीर्वाद

शिरडी में सबसे पहले साईं बाबा ने वाइजाबाई के घर से ही भिक्षा ली थीवाइजाबाई एक धर्मपरायण स्त्री थीउनकी एक ही संतान तात्या थाजो पहले ही दिन से साईं बाबा का परमभक्त बन गया था|

वाइजाबाई ने यह निर्णय कर लिया था कि वह रोजाना साईं बाबा के लिए खाना लेकर स्वयं ही द्वारिकामाई मस्जिद जाया करेगी और अपने हाथों से बाबा को खाना खिलाया करेगीअब वह रोजाना दोपहर को एक टोकरी में खाना लेकर द्वारिकामाई मस्जिद पहुंच जाती थीकभी साईं बाबा धूनी के पास अपने आसन पर बैठे हुए मिल जाया करते और कभी उनके इंतजार में वह घंटों तक बैठी रहती थीवह न जाने कहां चले जाते थे इस सबके बावजूद वाईजाबाई उनका बराबर इंतजार करती रहती थीकभी-कभार बहुत ज्यादा देर होने पर वह उन्हें ढूंढने के लिए निकल जाया करती थी
|
कभी-कभी जंगलों में भी ढूंढने के लिए चली जाती थीकड़कड़ाती धूप हो या मूसलाधार बारिश अथवा हडि्डयों को कंपा देने वाली ठंड होवाइजाबाई साईं बाबा को ढूंढती फिरती और जब उसे कहीं ने मिलते तो वह निराश होकर फिर द्वारिकामाई मस्जिद लौट आती थी
|
एक दिन वाइजाबाई जब बाबा को खोजतीथकी-मांदी मस्जिद पहुंची तो उसने बाबा को धूनी के पास अपने आसन पर बैठे पाया|वाईजाबाई को देखकर बाबा बोले - "मांमैं तुम्हें बहुत ही कष्ट देता हूंजो बेटा अपनी माँ को दुःख देउससे अधिक अभागा और कोई नहीं हो सकता है|मैं अब तुम्हें बिल्कुल भी कष्ट नहीं दूंगाजब भी तुम खाना लेकर आया करोगीमैं तुम्हें मस्जिद में ही मिला करूंगा|" साईं बाबा ने वाइजाबाई से कहा
|
उस दिन के बाद बाबा खाने के समय कभी भी मस्जिद से बाहर न जाते थेवाइजाबाई खाना लेकर मस्जिद पहुंचती तो बाबा उसे वहां पर अवश्य मिलते
|

"
साईं बाबा... !" वाइजाबाई ने कहा
|

"
ठहरो मां... !" साईं बाबा खाना खाते-खाते रुक गए और बोले - "मैं तुम्हें माँ कहता ही नहींअपनी आत्मा से भी मानता हूं
|"

"
तू मेरा बेटा हैतू ही मेरा बेटा हैतूने माँ कहा है न|" वाइजाबाई प्रसन्नता से गद्गद् होकर बोली
|

"
तुम बिल्कुल ठीक कहती हो मां ! मुझ जैसे अनाथअनाश्रित और अभागे को अपना बेटा बनाकर तुमने बड़े पुण्य का काम किया है मां|" साईं बाबा ने कहा - "इन रोटियों में जो तुम्हारी ममता हैक्या पता मैं तुम्हारे इस ऋण से कभी मुक्त हो भी पाऊंगा या नहीं 
?"

"
यह कैसी बात कर रहा है तू बेटा ! मां-बेटे का कैसा ऋण यह तो मेरा कर्त्तव्य हैकर्त्तव्य में ऋण की बात कहा ?" वाइजाबाई ने कहा - "इस तरह की बातें आगे से बिल्कुल मत करना
|"

"
अच्छा-अच्छा नहीं कहूंगाफिर कभी नहीं कहूंगा|" साईं बाबा ने जल्दी से अपने दोनों कानों को हाथ लगाकर कहा - "तुम घर जाकर तात्या को भेज देना
|"

"
वो तो लकड़ी बेचने गया हैआते ही भेज दूंगी|" कहने के पश्चात् वाइजाबाई के चेहरे पर सहसा गहरी उदासी छा गयी
|
वाइजाबाई की आपबीती सुनकर साईं बाबा की आँखें भीग गयींवह कुछ देर तक मौन बैठे रहे और फिर बोले - "वाइजा मांभगवान् भला करेंगेफिक्र मत करोसुख और दुःख तो इस जिंदगी के जरूरी अंग हैंजब तक इंसान इस दुनिया में जिंदा रहता हैउसे यह सब तो भोगना ही पड़ता है
|"
वाइजाबाई की आँखें भर आयी थींउसने अपनी टोकरी उठाई और थके-हारे कदमों से वह अपने घर की ओर वापस चल पड़ी
|

तात्या अभी थोड़ी-सी ही लकड़ियां काट पाया था कि अचानक आकाश में काली-काली घटाएं उमड़ने लगींबिजली कड़कने और गरजने से जंगल का कोना-कोना गूंज उठातात्या के पसीने से भरे चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गयींवह सोचने लगाअब क्या होगाइन लकड़ियों के तो कोई चार पैसे भी नहीं देगा - और यदि यह भीग गई तो कोई मुफ्त में भी नहीं लेगाघर में एक मुट्ठी अनाज नहीं हैतो रोटी कैसे बनेगी तब रात को माँ साईं बाबा को क्या खिलायेगी इसी चिंता में डूबे तात्या ने जल्दी से लड़कियां समेटीं और गांव की ओर चल पड़ातभी बड़े जोर से मूसलाधार बारिश शुरू हो गईवह जल्दी-जल्दी पांव बढ़ाने लगा
|
अभी वह गांव से कुछ ही दूरी पर था कि अचानक एक तेज अवाज सुनाई दी - "ओ लकड़ी वाले !"


उसके बढ़ते हुए कदम थम गए|
उसने जोर से पुकारा - "कौन है भाई 
?"
और तभी एक आदमी उसके सामने आकर खड़ा हो गया
|

"
क्या बात है ?" तात्या ने पूछा
|

"
लकड़ियां बेचोगे ?" उस आदमी ने पूछा
|

"
हां-हांक्यों नहीं बेचूंगा भाई ! मैं बेचने के लिए ही तो रोजाना जंगल से लकड़ियां काटकर लाता हूं|" तात्या ने जल्दी से जवाब दिया
|

"
कितने पैसे लोगे इन लकड़ियों के 
?"

"
जो मर्जी होदे दोआज तो लकड़ियां बहुत कम हैं और वैसे भी भीग भी गई हैंजो भी दोगे ले लूंगा
|"

"
लोयह रुपया रख लो
|"
तात्या हैरानी से उस व्यक्ति को देखने लगा
|

"
कम है तो और ले लो|" उस आदमी ने जल्दी से जेब से एक रुपया और निकालकर तात्या की ओर बढ़ाया
|

नहीं-नहींकम नहीं हैज्यादा हैंलकड़ियां थोड़ी हैं|" तात्या ने जल्दी से कहा
|

"
तो क्या हुआआज से तुम रोजाना मुझे यहां पर लकड़ियां दे जाया करोमैं तुम्हें यहीं मिला करूंगायदि आज ये लकड़ियां कुछ कम हैंतो कल लकड़ियां ज्यादा ले आनातब हमारा-तुम्हारा हिसाब बराबर हो जाएगा|" उसने हँसते हुए कहा और रुपया जबरदस्ती उसके हाथ पर रख दिया
|
तात्या ने रुपये जल्दी से अपने अंगरखे की जेब में रखे और फिर तेजी से गांव की ओर चल दियाघर पहुंचकर उसने माँ के हाथ पर रुपये रखे तो माँ आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगी
|

"
इतने रुपये कहां से ले आया तात्या ?" माँ ने आशंकित होकर पूछातात्या ने अपनी माँ को पूरी घटना बता दी
|

"
ये तूने ठीक नहीं किया बेटाकल उसे ज्यादा लकड़ियां दे आनाइंसान को अपनी ईमानदारी की कमाई पर ही संतोष करना चाहिएबेईमानी का जरा-सा भी विचार कभी अपने मन में नहीं लाना चाहिए|" वाइजाबाई ने तात्या को समझाते हुए कहा
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अगले दिन जब तात्या जंगल में गया तो उस समय वर्षा रुक गयी थीआकाश एकदम साफ थातात्या ने जल्दी-जल्दी और दिन से ज्यादा लकड़ियां काटीं और गट्ठर बनाने लगागट्ठर भारी थारोजाना तो वह अकेले ही लकड़ियों का गट्ठर उठाकर सिर पर रख लिया करता थालेकिन आज लकड़ियां ज्यादा थींवह अकेला उस गट्ठर को उठा नहीं सकता थावह किसी मुसाफिर की राह देखने लगा ताकि उसकी सहायता से उस भारी गट्ठर को उठाकर सिर पर रख सके|अचानक उसे सामने से एक मुसाफिर आता हुई दिखाई दियाजब वह पास आ गया तो तात्या ने उससे कहा -"भाई ! जरा मेरा बोझा उठवा दो|" उस मुसाफिर ने तात्या के सिर पर गट्ठर उठवाकर रखवा दियाअब तात्या तेजी से चल पड़ा
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अरे भाई तात्याक्या बात हैआज तुमने इतनी देर कैसे कर दी मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं|" पिछले दिन वाले आदमी ने मुस्कराते हुए कहा
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आज लकड़ियां और दिन के मुकाबले ज्यादा हैंरोजाना लकड़ियां कम होती थींइसलिए मैं अकेला ही गट्ठर होने के कारण मैं उसे अकेला नहीं उठा पा रहा थाबहुत देर बाद जब एक आदमी आया मैं उसकी सहायता से गट्ठर उठवाकर सिर पर रख पायातो सीधा भागता हुआ चला आया हूं
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उस आदमी ने लकड़ी के गट्ठर पर एक नजर डाली और बोला - "आज तो तुम ढेरसारी लकड़ियां काट लाए
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तुम ठीक कर रहे होलेकिन कल तुम्हें बहुत कम लकड़ियां मिली थींपरतुमने पैसे पूरे दे दिए थेइसलिए तुम्हारा हिसाब भी तो बराबर करना थाकल तुमने रुपये दे दिये थेउसी के बदले सारी लकड़ियां ले जाओअब तक का हिसाब बराबर|" तात्या ने हँसते हुए कहा
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कहां ठीक है तात्या भाई ! जिस तरह तुम ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ता चाहतेउसी तरह मैंने भी बेईमानी करना नहीं सीखा|" उस आदमी ने कहा और अपनी जेब से रुपया निकालकर तात्या की हथेली पर रख दिया - "लोइसे रखोहमारा आज तक का हिसाब-किताब बराबरआज लकड़ियां और दिनों से दोगुनी हैंइसलिए हिसाब भी दोगुना होना चाहिए
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तात्या ने रुपया लेने से बहुत इंकार कियापर उस आदमी ने समझा-बुझाकर वह रुपया तात्या को लेने पर विवश करतात्या ने वह रुपया जेब में रखाफिर वह गांव की ओर चल दिया
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अभी वह थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक उसे कुल्हाड़ी की याद आयीजल्दबाजी में वह कुल्हाड़ी जंगल में ही भूल आया थाअपनी भूल का अहसास होते ही वह तेजी से जंगल की ओर लौट पड़ाअब उसे वह आदमी और लड़कियों का गट्ठर कहीं भी दिखाई न दियाउसने बहुत दूर-दूर तक नजर दौड़ाईलेकिन उस आदमी का कहीं भी अता-पता न थातात्या की हैरानी की सीमा न रहीदोपहर का समय थाआखिर वह आदमी इतनी जल्दी इतना बोझ उठाकर कहां चला गया दूर-दूर तक उस आदमी का पता न थाआश्चर्य में डूबा तात्या वापस आ गयावह इस बात को किसी से कहे या न कहेइस बात का फैसला नहीं कर पा रहा था
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घर आकर वह अपनी माँ के साथ द्वारिकामाई मस्जिद आयावाइजाबाई ने दोनों को खाना लगा दियाखाना खाते समय तात्या ने लकड़ी खरीदने वाले के बारे में साईं बाबा को बतायासाईं बाबा बोले -"तात्याइंसान को वही मिलता हैजो परमात्मा ने उसके भाग्य में लिखा हैइसमें कोई संदेह नहीं है कि बिना गेहनत किये धन नहीं मिलता हैफिर भी धन-प्राप्ति में मनुष्य के कर्मों का भी बहुत योगदान होता हैवैसे चोर-डाकू भी चोरी-डाका डालकर लाखों रुपये ले आते हैंलेकिन वे सदैव गरीब-के-गरीब ही बने रहते हैंन तो उन्हें समय पर भरपेट भोजन ही मिलता है और न चैन की नींद आती हैजबकि एक गरीब आदमी थोड़ी-सी मेहनत करके इतना पैसा पैदा कर लेता है कि जिससे बड़े आराम से उसका और उसके परिवार की गुजर-बसर हो सकेवह स्वयं भी इत्मीनान से रूखी-सूखी खाता है और चैन की नींद सोता है तथा मुझ जैसे फकीर की झोली में भी रोटी का एक-आध टुकड़ा डाल देता हैतुम्हें जो कुछ मिलता हैवह तुम्हारे भाग्य में लिखा है
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"
लेकिन वह आदमी और लकड़ियों का गट्ठर कहां गायब हो गए ?" तात्या ने हैरानी से पूछा
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भगवान के खेल भी बड़े अजब-गजब हैंतात्या ! इंसान अपनी साधरण आँखों से उसे देख नहीं पाता|" साईं बाबा ने गंभीर होकर कहा - "तुम्हें बेवजह परेशान होने की कोई जरूरत नहीं हैयह तो देने वाला जानता है कि वह किस ढंग से और किस जरिये रोजी-रोटी देता हैभगवान जब किसी भी प्राणी को इस दुनिया में भेजता हैतो उसे भेजने से पहले उन सभी चीजों को भेज देता हैजिसकी उस जन्म लेने वाले को जरूरत पड़ती है|" साईं बाबा ने तात्या को बड़े ही प्यार से समझाया
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तात्या साईं बाबा के चरणों में गिर गयाउसे साईं बाबा की बात पर सहसा विश्वास न हो पा रहा थावह कहना चाहता था कि बाबायह सब आपका ही करिश्मा हैइस प्रकार का खेल खेलकर आप ही उसकी रोटी का इंतजाम कर रहे हैंउसने बहुत चाहा कि वह इस बात को साईं बाबा से कहेपर कह नहीं पाया और केवल आँसू टपकाता रह गया
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वास्तव में तात्या के मन में साईं बाबा के प्रति अपार श्रद्धा और अटूट विश्वास थाइसी कारण बाबा का भी उस पर विशेष स्नेह था
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अचानक साईं बाबा उठकर खड़े हो गए और बोले - "चलो तात्याघर चलो|" कहकर मस्जिद की सीढ़ियों की ओर चल दिये
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साईं बाबा सीधे वाइजाबाई की उस कोठरी में गएजहां पर वह सोया करती थीउस कोठरी में एक पलंग पड़ा था
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तात्याएक फावड़ा ले आओ|" साईं बाबा ने कोठरी में चारों ओर निगाह घुमाते हुए कहा
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तात्या फावड़ा ले आयाउसकी और वाइजाबाई की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि साईं बाबा ने फावड़ा क्यों मंगाया है
?

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तात्याइस पलंग के सिरहाने वाले दायें ओर के पाएं के नीचे खोदो|" इतना कहकर साईं बाबा ने पलंग एक ओर को सरका दिया
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यहां क्या है बाबा ?" तात्या ने पूछा
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खोदो तो सही|" साईं बाबा ने कहा
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तात्या ने अभी तीन-चार फावड़े ही मारे थे कि अचानक फावड़ा किसी धातु से टकराया
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धीरे-धीरे मिट्टी हटाओतात्या|" साईं बाबा ने गड्ढे में झांकते हुए कहा
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तात्या फावड़े से धीरे-धीरे मिट्टी हटाने लगाकुछ देर बाद उसने तांबे का एक कलश निकालकर साईं बाबा के सामने रख दिया
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इसे खोलोतात्या !"


तात्या ने कलश पर रखा ढक्कन हटाकर उसे फर्श पर उलट दियादेखते-ही-देखते उस कलश में से सोने की अशर्फियांमूल्यवान जेवर और हीरे निकलकर बिखर गए|

"
यह तुम्हारे पूर्वजों की सम्पत्ति हैतुम्हारे भाग्य में ही मिलना लिखा थातुम्हारे पिता के भाग्य में यह सम्पत्ति नहीं थी|" साईं बाबा ने कहा - "इसे संभालकर रखो और समझदारी से खर्च करो
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वाइजा और तात्या के आश्चर्य का कोई ठिकाना न थावह उस अपार सम्पत्ति को देख रहे थे और सोच रहे थे कि यदि उन पर साईं बाबा की कृपा न होती तो सम्पत्ति उन्हें कभी भी प्राप्त न होतीतात्या ने अपना सिर साईं बाबा के चरणों पर रख दिया और फूट-फूटकर बच्चों की तरह रोने लगा
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वाइजाबाई बोली - "साईं बाबा ! हम यह सब रखकर क्या करेंगेहमारे लिए तो रूखी-सूखी रोटी ही बहुत हैआप ही रखिये और मस्जिद के काम में लगा दीजिए
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साईं बाबा ने वाइजाबाई का हाथ पकड़कर कहा -"नहीं मां ! यह सब तुम्हारे भाग्य में थायह सारी सम्पत्ति केवल तुम्हारी हैमेरी बात मानोइसे अपने पास ही रखो
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साईं बाबा की बात को वाइजाबाई को मानना ही पड़ाउसने कलश रख लियातब साईं बाबा चुपचाप उठकर अपनी मस्जिद में वापस आ गये और धूनी के पास इस प्रकार लेट गयेजैसे कुछ हुआ ही नहीं है
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तात्या ने इस सम्पत्ति से नया मकान बनवा लिया और बहुत ही ठाठ-बाट से रहने लगागांव वाले हैरान थे कि अचानक तात्या के पास इतना पैसा कहां से आया वे इस बात को तो जानते थे कि साईं बाबा तात्या की माँ वाइजाबाई को माँ कहकर पुकारते हैं और तात्या से अपने भक्त या शिष्य की तरह नहींबल्कि छोटे भाई के समान स्नेह करते हैंअत: सबको विश्वास हो गया कि तात्या पर साईं बाबा की ही कृपा हुई हैइसी कृपा से वह देखते-ही-देखते सम्पन्न हो गया है
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तात्या को सम्पन्न देख धन के लोभीलालची लोग भी साईं बाबा के पास जाने लगेरात-दिन सेवा किया करते कि शायद साईं बाबा प्रसन्न हो जाएं और उन्हें भी धनवान बना देंसाईं बाबा उन लोगों की भावनाओं को अच्छी तरह से जानते थेवह न तो उन्हें मस्जिद में आने से रोकना चाहते थे और न ही उन्हें डांटना चाहते थेउनका विश्वास था कि यहां आते-आते या तो इनके विचार ही बदल जायेंगे या फिर निराश होकर स्वयं ही आना बंद कर देंगेवह किसी को कुछ न कहते थेचुपचाप अपनी धूनी के पास बैठे तमाशा देखा करते थेकुछ तो इतने बेशर्म लोग थे कि साईं बाबा ने एकदम स्वयं को धनवान बनाने के लिए कहते - "बाबाहमें भी तात्या का तरह धनवान बना दो
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उन लोगों की बातें सुनकर साईं बाबा हँस पड़ते और बोलते - "मैं कहां से कुछ कर सकता हूंमैं तो स्वयं कंगाल हूंभला मेरे पास कहां से कुछ आया
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साईं बाबा का ऐसा जवाब सुनकर सब चुप रह जातेफिर आगे कोई भी कुछ न कह पाता था


कल चर्चा करेंगे..तुम्हारी जेब में पैसा-ही-पैसा
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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