शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 6 May 2017

श्री साईं लीलाएं - रतनजी शापुरजी की दक्षिणा

ॐ सांई राम



 कल हमने पढ़ा था..ऊदी और आशीर्वाद का चमत्कार

श्री साईं लीलाएं
रतनजी शापुरजी की दक्षिणा


नांदेड में रहनेवाले रतनजी शापुरजी वाडिया एक फारसी सज्जन थे| उनका बहुत बड़ा व्यवसाय था| किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी| प्रकृति से वो बहुत धार्मिक थे| अपने दान-धर्म की वजह से वे बहुत प्रसिद्ध थे| ईश्वर की कृपा से उनके पास सब कुछ था| यदि उनके जीवन में किसी चीज की कमी थी तो वह एक संतान की| संतान के लिए तरसते थे| वह संतान पाने के लिए सदैव प्रभु से प्रार्थना करते थे| वे गरीबों और जरूरतमंदों की भोजन, वस्त्र आदि सब तरह से मदद भी किया करते थे| संतान-प्राप्ति की चिंता में वह दिन-रात व्यथित रहते| बिना बच्चों के सूना-सूना घर उनको मानो खाने को दौड़ता| वह अपने मन में सोचते कि क्या प्रभु मुझे संतान देने की कृपा करेंगे या मैं बिना संतान के ही रहूंगा| चिंतित रहने के कारण अब तो उन्हें भोजन करना भी अच्छा नहीं लगता था|

रतनजी की दासगणु के प्रति बहुत निष्ठा थी| इसलिए एक दिन उन्होंने दासगणु महाराज को अपने मन की बात कह डाली| दासगणु महाराज ने उन्हें शिरडी जाकर साईं बाबा की शरण में जाकर संतान-प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने को कहा| साईं बाबा तुम पर अवश्य मेहरबान हो जायेंगे और तुम्हारी इच्छा भी अवश्य पूर्ण होगी| दासगणु महाराज की बात सुनकर रतनजी के मन में आशा की एक किरण जाग उठी, उन्होंने शिरडी जाने का निर्णय कर लिया|

कुछ दिनों बाद रतनजी शिरडी पहुंचे और मस्जिद पहुंचकर साईं बाबा के दर्शन कर, उनके श्री चरणों में फूल-फल आदि की भेंट रख उन्हें गले में हार पहनाया, फिर बाबा के श्री चरणों के पास बैठकर प्रार्थना कि - "बाबा ! जो भी दु:खी आपकी चौखट पर अपने दुःख लेकर आया, वह सुखों से अपनी झोली भरकर ही गया| आपकी प्रसिद्धि सुनकर मैं आपकी शरण में आया हूं| मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझे खाली हाथ नहीं लौटयेंगे|"

रतनजी की प्रार्थना सुनकर बाबा ने मुस्कराते हुए दक्षिणा में पांच रुपये मांगे| रतनजी तुरंत देने को तैयार थे| पर बाबा तुरंत बोले - "अरे, मैं तुमसे तीन रुपये चौदह आने पहले ही ले चुका हूं इसलिए अब बाकी के पैसे दे दो|"

साईं बाबा के यह वचन सुनकर रतनजी सोचने लगे कि वह तो जीवन में पहली बार शिरडी आये हैं, फिर बाबा को तीन रुपये चौदह आने कब और कैसे मिले, यह बात उनकी जरा भी समझ में नहीं आयी| फिर उन्होंने मौन रहते हुए बाबा को बाकी की दक्षिणा दे दी और हाथ जोड़कर बाबा से प्रार्थना की - "बाबा ! मैं अज्ञानी आपकी पूजा करने का ढंग नहीं जानता हूं| बड़े भाग्य से आपके श्री चरणों के दर्शन करने का अवसर मिला है| आप सबके मन की बात जानते हैं, मेरा दुःख भी आपसे छिपा नहीं है| आपसे उसे दूर करने की प्रार्थना है|"

रतनजी की प्रार्थना सुनकर बाबा को उस पर दया आ गई और बाबा बोले - "तू बिल्कुल चिंता मत कर| तेरे बुरे दिन अब बीत गये| अल्लाह तेरी मुराद अवश्य पूर्ण करेगा|" फिर बाबा ने उसके सिर पर अपना वरदहस्त रखकर ऊदी प्रसाद स्वरूप दी| फिर बाबा में रतनजी बाबा से आज्ञा लेकर नांदेड लौट आये| वहां पर आकर वे दासगणु महाराज से मिले और उन्हें शिरडी में अपने साथ घटी सारी बात विस्तार से बता दी| फिर बोले - "महाराज ! मैंने इससे पहले बाबा को कभी न देखा और न ही मिला, फिर बाबा ने तीन रुपये और चौदह आने मिलने की बात क्यों कही? मैं कुछ समझा नहीं| अब आप ही रहस्य को समझाइये|" वे भी बहुत दिनों तक विचार करते रहे कि बाबा ने कहा है तो इसमें कुछ-न-कुछ सच्चाई अवश्य है|

सोचते-सोचते उन्हें अचानक एक दिन याद आया कि कुछ दिनों पहले रतनजी ने एक औलिया मौला साहब को अपने घर आमंत्रित किया था| इसके लिए कुछ धन भी खर्च किया था| मौला साहब नांदेड के प्रसिद्ध संत थे जो अपनी रोजी-रोटी के लिए मेहनत किया करते थे| शिरडी जाने से कुछ दिन पहले रतनजी ने उन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिलाकर उनका सम्मान किया था|

दासगणु महाराज ने रतनजी से उस आतिथ्य खर्च की सूचि मांगी| जब उन्होंने खर्च की गयी राशि का जोड़ किया तो वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि उस दिन उनके आतिथ्य पर जो खर्च हुआ था उसका योग तीन रुपये चौदह आने थे| इससे यह बात सिद्ध होती है कि साईं बाबा अंतर्यामी थे| वे शिरडी में ही रहते थे| लेकिन उन्हें सब जगह क्या हो रहा है, इसका पहले से ही पता रहता था| यह जानकर रतनजी बाबा के भक्त बन गये| फिर यथासमय रतनजी की पत्नी गर्भवती हुई और समय होने पर उन्हें साईं बाबा की कृपा से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई तो उनकी खुशी का पारावार न रहा और वह साईं बाबा की जय-जयकार करने लगे|


कल चर्चा करेंगे... दासगणु की वेशभूषा

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 5 May 2017

श्री साईं लीलाएं - ऊदी और आशीर्वाद का चमत्कार

ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था..मूंगफली से अतिसार से मुक्ति

श्री साईं लीलाएं
ऊदी और आशीर्वाद का चमत्कार

हरदा गांव निवासी दत्तोपंत चौदह साल से पेटदर्द की पीड़ा से परेशान थे| उन्होंने हर तरह का इलाज करवाया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ| साईं बाबा की प्रसिद्धि की चर्चा सुनकर, वह भी साईं बाबा के दर्शन के लिए शिरडी आये और बाबा के चरणों में सिर रखकर बोले - "बाबा ! इस पेटदर्द ने मुझे इतना परेशान करके रख दिया है कि मैं अब दर्द सहने के लायक नहीं रहा| इस जन्म में तो मैंने कोई गुनाह नहीं किया| शायद ये कोई मेरे पिछले जन्म का पाप कर्म मेरे पीछे पड़ा है|" बाबा ने प्रेमपूर्ण दृष्टि सी देखकर दत्तोपंत के सिर पर वरदहस्त रख दिया और कहा - "अच्छे हो जाओगे|" फिर बाबा ने उन्हें ऊदी भी दी| बाबा के आशीर्वाद और ऊदी प्रसाद से वह पूरी तरह स्वस्थ हो गये| फिर उन्हें भविष्य में कभी कोई रोग नहीं हुआ|

कल चर्चा करेंगे..रतनजी शापुरजी की दक्षिणा

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 4 May 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38

ॐ साँई राम

आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38

बाबा की हंड़ी, नानासाहेब द्अघारा देव-मूर्ति की उपेक्षा, नैवेघ वितरण, छाँछ का प्रसाद ।
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गत अध्याय में चावड़ी के समारोह का वर्णन किया गया है । अब इस अध्याया में बाबा की हंडी तथा कुछ अन्य विषयों का वर्णन होगा ।


प्रस्तावना
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हे सदगुरु साई । तुम धन्य हो । हम तुम्हें नमन करते है । तुमने विश्व को सुख पहुँचाय और भक्तों का कल्याण किया । तुम उदार हृदय हो । जो भक्तगण तुम्हारे अभय चरण-कमलों में अपने को समर्पित कर देते है, तुम उनकी सदैव रक्षा एवं उद्घार किया करते हो । भक्तों के कल्याण और परित्राण के निमित्त ही तुम अवतार लेते हो । ब्रहम के साँचे में शुद्घ आत्मारुपी द्रव्य ढाला गया और उसमें से ढलकर जो मूर्ति निकली, वही सन्तों के सन्त श्री साईबाबा है । साई स्वयं ही आत्माराम और चिरआनन्द धाम है । इस जीवन के समस्त कार्यों को नश्वर जानकर उन्होंने भक्तों को निष्काम और मुक्त किया ।


बाबा की हंड़ी
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मानव धर्म-शास्त्र में भिन्न-भिन्न युगों के लिये भिन्न-भिन्न साधनाओं का उन्नेख किया गया है । सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्घापर में यज्ञ और कलियुग में दान का विशेष माहात्म्य है । सर्व प्रकार के दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है । जब मध्याहृ के समय हमें भोजन प्राप्त नहीं होता, तब हम विचलित हो जाते है । ऐसी ही स्थिति अन्य प्राणियों की अनुभव कर जो किसी भिक्षुक या भूखे को भोजन देता है, वही श्रेष्ठ दानी है । तैत्तिरीयोपनिषद् में लिखा है कि अन्न ही ब्रहमा है और उसीसे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है तथा उससे ही वे जीवित रहते है और मृत्यु के उपरांत उसी में लय भी हो जाते है । जब कोई अतिथि दोपहर के समय अपने घर आता है तो हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम उसका अभिन्नदन कर उसे भोजन करावे । अन्य दान जैसे-धन, भूमि और वस्त्र इत्यादि देने में तो पात्रता का विचार करना पड़ता है, परन्तु अन्न के लिये विशेष सोचविचार की आवश्यकता नहीं है । दोपहर के समय कोई भी अपने द्घार पर आवे, उसे शीघ्रभोजन कराना हमारा परम कर्त्व्य है । प्रथमतः लूले, लंगड़े, अन्धे या रुग्ण भिखारियों को, फिर उन्हें, जो हाथ पैर से स्वस्थ है और उनसभी के बाद अपने संबन्धियों को भोजन कराना चाहिये । अन्य सभी की अपेक्षा पंगुओं को भोजन कराने का मह्त्व अधिक है । अन्नदान के बिना अन्य सब प्रकार के दान वैसे ही अपूर्ण है, जैसे कि चन्द्रमा बिना तारे, पदक बिना हार, कलश बिना मन्दिर, कमलरहित तलाब, भक्तिरहित, भजन, सिन्दूररहित सुहागिन, मधुर स्वरविहीन गायन, नमक बिना पकवान । जिस प्रकार अन्य भोज्य पदार्थों में दाल उत्तम समझी जाती है, उसी प्रकार समस्त दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है । अब देखें कि बाबा किस प्रकार भोजन तैयार कराकर उसका वितरण किया करते थे ।

हम पहले ही उल्लेख कर चुके है कि बाबा अल्पाहारी थे और वे थोड़ा बहुत जो कुछ भी खाते थे, वह उन्हें केवल दो गृहों से ही भिक्षा में उपलब्ध हो जाया करता था । परन्तु जब उनके मन में सभी भक्तों को भोजन कराने की इच्छा होती तो प्रारम्भ से लेकर अन्त तक संपूर्ण व्यवस्था वे स्वयं किया करते थे । वे किसी पर निर्भर नहीं रहते थे और न ही किसी को इस संबंध में कष्ट ही दिया करते थे । प्रथमतः वे स्वयं बाजार जाकर सब वस्तुएं – अनाज, आटा, नमक, मिर्ची, जीरा खोपरा और अन्य मसाले आदि वस्तुएँ नगद दाम देकर खरीद लाया करते थे । यहाँ तक कि पीसने का कार्य भी वे स्वयं ही किया करते थे । मसजिद के आँगन में ही एक भट्टी बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित करके हंडी के ठीक नाप से पानी भर देते थे । हंडी दो प्रकार की थी – एक छोटी और दूसरी बड़ी । एक में सौ और दूसरी में पाँच सौ व्यक्तियों का भोजन तैयार हो सकता था । कभी वे मीठे चावल बनाते और कभी मांसमिश्रित चावल (पुलाव) बनाते थे । कभी-कभी दाल और मुटकुले भी बना लेते थे । पत्थर की सिल पर महीन मसाला पीस कर हंडी में डाल देते थे । भोजन रुचिकर बने, इसका वे भरसक प्रयत्न किया करते थे । ज्वार के आटे को पानी में उबाल कर उसमें छाँछ मिलाकर अंबिल (आमर्टी) बनाते और भोजन के साथ सब भक्तों को समान मात्रा में बाँट देते थे । भोजन ठीक बन रहा है या नहीं, यह जानने के लिये वे अपनी कफनी की बाँहें ऊपर चढ़ाकर निर्भय हो उतबलती हंडी में हाथ डाल देते और उसे चारों ओर घुमाया करते थे । ऐसा करने पर भी उनके हाथ पर न कोई जलन का चिन्ह और न चेहरे पर ही कोई व्यथा की रेखा प्रतीत हुआ करती थी । जब पूर्ण भोजन तैयार हो जाता, तब वे मसजिद सम बर्तन मँगाकर मौलवी से फातिहा पढ़ने को कहते थे, फिर वे म्हालसापति तथा तात्या पाटील के प्रसाद का भाग पृथक् रखकर शेष भोजन गरीब और अनाथ लोगों को खिलाकर उन्हें तृप्त करते थे । सचमुच वे लोग धन्य थे । कितने भाग्यशाली थे वे, जिन्हें बाबा के हाथ का बना और परोसा हुआ भोजन खाने को प्राप्त हुआ ।



यहाँ कोई यह शंका कर सकता है कि क्या वे शाकाहारी और मांसाहारी भोज्य पदार्थों का प्रसाद सभी को बाँटा करते थे । इसका उत्तर बिलकुल सीधा और सरल है । जो लोग मांसाहारी थे, उन्हें हण्डी में से दिया जाता था तथा शाकाहारियों को उसका स्पर्श तक न होने देते थे । न कभी उन्होंने किसी को मांसाहार का प्रोत्साहन ही दिया और न ही उनकी आंतरिक इच्छा थी कि किसी को इसके सेवन की आदत लग जाये । यह एक अति पुरातन अनुभूत नियम है कि जब गुरुदेव प्रसाद वितरण कर रहे हो, तभी यदि शिष्य उसके ग्रहण करने में शंकित हो जाय तो उसका अधःपतन हो जाता है । यह अनुभव करने के लिये कि शिष्य गण इस नियम का किस अंश तक पालन करते है, वे कभी-कभी परीक्षा भी ले लिया करते थे । उदाहरँणार्थ एक एकादशी के दिन उन्होंने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ मांस खरीद लाने को कहा । दादा केलकर पूरे कर्मकांडी थे और प्रायः सभी नियमों का जीवन में पालन किया करते थे । उनकी यह दृढ़ भावना थी कि द्रव्य, अन्न और वस्त्र इत्यादि गुरु को भेंट करना पर्याप्त नहीं है । केवल उनकी आज्ञा ही शीघ्र कार्यान्वित करने से वे प्रसन्न हो जाते है । यही उनकी दक्षिणा है । दादा शीघ्र कपडे पहिन कर एक थैला लेकर बाजार जाने के लिये उघत हो गये । तब बाबा ने उन्हें लौटा लिया और कहा कि तुम न जाओ, अन्य किसी को भेज दो । दादा ने अपने नौकर पाण्डू को इस कार्य के निमित्त भेजा । उसको जाते देखकर बाबा ने उसे भी वापस बुलाने को कहकर यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया ।

ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उन्होंने दादा से कहा कि देखो तो नमकीन पुलाव कैसा पका है । दादा ने यों ही मुंह देखी कह दिया कि अच्छा है । तब वे कहने लगे कि तुमने न अपनी आँखों से ही देखा है और न जिहा से स्वाद लिया, फिर तुमने यह कैसे कह दिया कि उत्तम बना है । थोड़ा ढक्कन हटाकर तो देखो । बाबा ने दादा की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन में डालकर बोले – थोड़ासा इसमें से निकालो और अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो । जब माँ का सच्चा प्रेम बच्चे पर उमड़ आता है, तब माँ उसे चिमटी भरती है, परन्तु उसका चिल्लाना या रोना देखकर वह उसे अपने हृदय से लगाती है । इसी प्रकार बाबा ने सात्विक मातृप्रेम के वश हो दादा का इस प्रकार हाथ पकड़ा । यथार्थ में कोई भी सन्त या गुरु कभी भी अपने कर्मकांडी शिष्य को वर्जित भोज्य के लिये आग्रह करके अपनी अपकीर्ति कराना पसन्द न करेगा ।

इस प्रकार यह हंडी का कार्यक्रम सन् 1910 तक चला और फिर स्थगित हो गया । जैसा पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है, दासगणू ने अपने कीर्तन द्घारा समस्त बम्बई प्रांत में बाबा की अधिक कीर्ति फैलई । फलतः इस प्रान्त से लोगों के झुंड के झुंड शिरडी को आने लगे और थोड़े ही दिनों में शिरडी पवित्र तीर्थ-क्षेत्र बन गया । भक्तगण बाबा को नैवेघ अर्पित करने के लिये नाना प्रकारके स्वादिष्ट पदार्थ लाते थे, जो इतनी अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता था कि फकीरों और भिखारियों को सन्तोषपूर्वक भोजन कराने पर भी बच जाता था । नैवेघ वितरण करने की विधि का वर्णन करने से पूर्व हम नानासाहेब चाँदोरकर की उस कथा का वर्णन करेंगे, जो स्थानीय देवी-देवताओं और मूर्तियों के प्रति बाबा की सम्मान-भावना की घोतक है ।

नानासाहेब द्घारा देव-मूर्ति की उपेक्षा
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कुछ व्यक्ति अपनी कल्पना के अनुसार बाबा को ब्राहमण तथा कुछ उन्हें यवन समझा करते थे, परन्तु वास्तव में उनकी कोई जाति न थी । उनकी और ईश्वर की केवल एक जाति थी । कोई भी निश्चयपूर्वक यह नहीं जानता कि वे किस कुल में जनमें और उनके मातापिता कौन थे । फिर उन्हें हिन्दू या यवन कैसे घोषित किया जा सकता है । यदि वे यवन होते तो मसजिद में सदैव धूनी और तुलसी वृन्दावन ही क्यों लागते और शंख, घण्टे तथा अन्य संगीत वाघ क्यों बजने देते । हिन्दुओं की विविध प्रकार की पूजाओं को क्यों स्वीकार करते । यदि सचमुच यवन होते तो उनके कान क्यों छिदे होते तथा वे हिन्दू मन्दिरों का स्वयं जीर्णोद्घार क्यों करवाते । उन्होंने हिन्दुओं की मूर्तियों तथा देवी-देवताओ की जरा सी उपेक्षा भी कभी सहन नहीं की ।

एक बार नानासाहेब चाँदोरक अपने साढू (साली के पति) श्री बिनीवले के साथ शिरडी आये । जब वे मसजिद में पहुँचे, बाबा वार्तालाप करते हुए अनायास ही क्रोधित होकर कहने लगे कि तुम दीर्घकाल से मेरे सान्ध्य में हो, फिर भी ऐसा आचरण क्यों करते हो । नानासाहेब प्रथमतः इन शब्दों का कुछ भी अर्थ न समझ सके । अतः उन्होंने अपना अपराध समझाने की प्रार्थना की । प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि तुम कब कोपरगाँव आये और फिर वहाँ से कैसे शिरडी आ पहुँचे । तब नानासाहेब को अपनी भूल तुरन्त ही ज्ञात हो गयी । उनका यह नियम था कि शिरडी आने से पूर्व वे कोपरगाँव में गोदावरी के तट पर स्थित श्री दत्त का पूजन किया करते थे । परन्तु रिश्तेदार के दत-उपासक होने पर भी इस बार विलम्ब होने के भय से उन्होंने उनको भी दत्त मंदिर में जाने से हतोत्साहित किया और वे दोनों सीधे शिरडी चले आये थे । अपना दोष स्वीकार कर उन्होंने कहा कि गोदावरी स्नान करते समय पैर में एक बड़ा काँटा चुभ जाने के कारण अधिक कष्ट हो गया था । बाबा ने काह कि यह तो बहुत छोटासा दंड था और उन्हें भविष्य में ऐसे आचरण के लिये सदैव सावधान रहने की चेतावनी दी ।
नैवेघ-वितरण
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अब हम नैवेघ-वितरण का वर्णन करेंगे । आरती समाप्त होने पर बाबा से आर्शीवाद तथा उदी प्राप्त कर जब भक्तगण अपने-अपने घर चले जाते, तब बाबा परदे के पीछे प्रवेश कर निम्बर के सहारे पीठ टेककर भोजन के लिये आसन ग्रहण करते थे । भक्तों की दो पंक्तियाँ उनके समीप बैठा करती थी । भक्तगण नाना प्रकार के नैवेघ, पीरी, माण्डे, पेड़ा बर्फी, बांसुदीउपमा (सांजा) अम्बे मोहर (भात) इत्यादि थाली में सजा-सजाकर लाते और जब तक वे नैवेघ स्वीकार न कर लेते, तब तक भक्तगण बाहर ही प्रतीक्षा किया करते थे । समस्त नैवेघ एकत्रित कर दिया जाता, तब वे स्वयं ही भगवान को नैवेघ अर्पण कर स्वयं ग्रहण करते थे । उसमें से कुछ भाग बाहर प्रतीक्षा करने वालों को देकर शेष भीतर बैठे हुए भक्त पा लिया करते थे । जब बाबासबके मध्य में आ विराजते, तब दोनों पंक्तियों में बैठे हुए भक्त तृप्त होकर भोजन किया करते थे । बाबा प्रायः शामा और निमोणकर से भक्तों को अच्छी तरह भोजन कराने और प्रत्येक की आवश्यकता का सावधानीपूर्वक ध्यान रखने को कहते थे । वे दोनों भी इस कार्य को बड़ी लगन और हर्ष से करते थे । इस प्रकार प्राप्त प्रत्येक ग्रास भक्तों को पोषक और सन्तोषदायक होता था । कितना मधुर, पवित्र, प्रेमरसपूर्ण भोजन था वह । सदा मांगलिक और पवित्र ।

छाँछ (मठ्ठा) का प्रसाद
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इस सत्संग में बैठकर एक दिन जब हेमाडपंत पूर्णतः भोजन कर चुके, तब बाबा ने उन्हें एक प्याला छाँछ पीने को दिया । उसके श्वेत रंग से वे प्रसन्न तो हुए, परन्तु उदर में जरा भी गुंजाइश न होने के कारण उन्होंने केवल एक घूँट ही पिया । उनका यह उपेक्षात्मक व्यवहार देखकर बाबा ने कहा कि सब पी जाओ । ऐसा सुअवसर अब कभी न पाओगे । तब उन्होंने पूरी छाँछ पी ली, किन्तु उन्हे बाबा के सांकेतिक वचनों का मर्म शीघ्र ही विदित हो गया, क्योंकि इस घटना के थोड़े दिनों के पश्चात् ही बाबा समाधिस्थ हो गये ।

पाठकों । अब हमें अवश्य ही हेमाडपंत के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, क्योंकि उन्होंने तो छाँछ का प्याला पिया, परन्तु वे हमारे लिये यथेष्ठ मात्रा में श्री साई-लीला रुपी अमृत दे गये । आओ, हम उस अमृत के प्याले पर प्याले पीकर संतुष्ट और सुखी हो जाये ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 3 May 2017

श्री साईं लीलाएं - मूंगफली से अतिसार से मुक्ति

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. बूटी का रोग छूमंतर

श्री साईं लीलाएं
मूंगफली से अतिसार से मुक्ति
   
काका महाजनी साईं बाबा के परम भक्त थे| एक बार उन्हें अतिसार का रोग हो गया| अतिसार रोग में बार-बार दस्त होते हैं| बाबा की सेवा में कोई व्यवधान न पड़े इसलिए वे एक लोटे में पानी भरकर मस्जिद के एक कोने में रख देते थे, ताकि परेशानी होने पर शीघ्र बाहर जा सकें| साईं बाबा को सब पता था कि काका को अतिसार का रोग है| परन्तु काका ने बाबा को यह बात न बतायी|

मस्जिद में आंगन बनाने की स्वीकृति मिल जाने पर काम शुरू हो गया| कुछ देर बाद बाबा लेंडी बाग से सैर करके लौटे तो कुदाल की आवाज सुनते ही आगबबूला हो क्रोध में भरकर चिल्लाने लगे| बाबा के क्रोध को देख के वहां उपस्थित भक्तों में भगदड़ मच गई, लेकिन जब काका भागने के लिए उठे तो बाबा ने उनकी कलाई पकड़कर वहीं बैठा लिया| इसी अफरा-तफरी में वहां किसी भागनेवाले की मूंगफली की थैली वहीं पर रह गई| उसमें मूंगफली के भुने हुए दाने भरे हुए थे| बाबा ने उसमें से मुट्ठीभर दाने निकाले और छीलकर काका को खाने को दिए और खुद भी खाने लगे| जब मूंगफली के दाने खत्म हो गये, तब बाबा ने काका से कहा कि मुझे प्यास लगी है| जाओ, जाकर पानी ले आओ|

काका गए और एक घड़ा पानी भर लाए| तब बाबा ने उसमें से पानी पिया और काका को भी पिलाया| फिर इसके बाद बाबा बोले - "आज से तुम्हारे अतिसार की छुट्टी| अब तुम फर्श का काम-काज देख सकते हो|

कुछ देर में ही जो लोग भाग गये थे, वे वापस मस्जिद में लौट आये और आंगन का कार्य फिर से शुरू हो गया| इसके बाद काका को अतिसार की परेशानी नहीं हुई| यह बाबा की लीला ही तो थी जो मूंगफली से अतिसार बढ़ने की बजाय ठीक हो गया|


परसों चर्चा करेंगे..ऊदी और आशीर्वाद का चमत्कार

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 2 May 2017

श्री साईं लीलाएं - बिना दवाई के कर्णपीड़ा ठीक हो गयी

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. बूटी का रोग छूमंतर 

श्री साईं लीलाएं
बिना दवाई के कर्णपीड़ा ठीक हो गयी
   
आलंदी गांव (पूजा) के रहनेवाले एक स्वामी जी कर्णपीड़ा से बहुत दु:खी थेउनके कान में इतना दर्द होता था कि वह रात को सो भी नहीं पाते थेकान में सूजन बनी रहती थीअनेकों इलाज करवाये पर कोई लाभ नहीं हुआडॉक्टरों ने ऑपरेशन करवाने को कहा|
एक बार स्वामी जी बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी आयेतब भी कानों में पीड़ा थीउन्होंने अपनी परेशानी शामा को बता दी और उनसे बाबा से प्रार्थना करने की विनती कीशाम को जब स्वामी जी बाबा से मस्जिद लौटने की अनुमति लेने गए तो तब शामा ने बाबा से प्रार्थना कि - "हे देवा ! स्वामी जी के काम में बहुत पीड़ा हैआप इन पर कृपा करें|"
बाबा ने केवल इतना कहा - "अल्लाह अच्छा करेगा|" बाद में स्वामी जी पूना चले गएआठ दिन बाद उनका पत्र आयाजिसमें लिखा था कि उनके कान का दर्द अब समाप्त हो गया हैसूजन अभी बाकी है इसलिए वे ऑपरेशन कराने मुम्बई भी गये थेपर जांच करने के बाद डॉक्टर ने कहा अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं हैसब बाबा की कृपा हैवह बाबा के चरणों में प्रणाम करते हैं|"

कल चर्चा करेंगे..मूंगफली से अतिसार से मुक्ति     

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 1 May 2017

श्री साईं लीलाएं - बूटी का रोग छूमंतर

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. बाबा जी का विचित्र आदेश 

श्री साईं लीलाएं
बूटी का रोग छूमंतर
   

एक बार बापू साहब बूटी को अम्लपित्त का रोग हो गयाउन्होंने बहुत इलाज करवाया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआरोग की वजह से वह इतने कमजोर हो गये कि अब वे मस्जिद जाकर बाबा के दर्शन कर पाने में खुद को असमर्थ पाने लगेयह बात बाबा को भी पता चल गयी|
एक दिन बाबा ने बूटी को अपने पास बुलवाया और पास में बैठाकर बोले - "सावधान ! अब तुम्हें कभी उल्टियां या दस्त हुई तो समझ लेना तुम्हारा सामना मुझसे हैयह ध्यान रखना|" बाबा का संकेत बूटी की बीमारी की तरह थाबाबा के मुख से निकले उन शब्दों का ऐसा चमत्कारिक प्रभाव हुआ कि बूटी साहब का रोग उसी समय खत्म हो गया और वे पूर्णतया स्वस्थ हो गये|
यही बूटी एक बार हैजे की बीमारी का शिकार हो गएबीमारी के कारण उन्हें बहुत तेज प्यास लगने लगीडॉक्टरों से इलाज कराने पर जब कोई लाभ होता दिखाई न दिया तो अंतत: वे पुन: बाबा की शरण में जा पहुंचे और रोग-मुक्ति की विनती की|
उनकी विनती सुन बाबा ने कहा - "मीठे दूध में अखरोटबादामपिस्ते उबालकर उस काढ़े का सेवन करोवैसे यह काढ़ा प्राणघातक हैपरन्तु बाबा की आज्ञा थीइसलिए उन्होंने काढ़ा बनाकर सेवन किया तो रोग का समूल नाश हो गया|"

कल चर्चा करेंगे..बूटी का रोग छूमंतर     

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 30 April 2017

श्री साईं लीलाएं - बाबा जी का विचित्र आदेश

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. जो मस्जिद में आया, सुखी हो गया 

श्री साईं लीलाएं
बाबा जी का विचित्र आदेश
  
बालागनपत दर्जी शिरडी में रहते थेवह बाबा के परम भक्त थेएक बार उन्हें जीर्ण ज्वर हो गयाबुखार की वजह से वह सूखकर कांटा हो गयेबहुत इलाज करायेपर ज्वर पूरी तरह से ठीक नहीं हुआआखिर में थक-हारकर साईं बाबा की शरण में पहुंचेवहां पहुंचकर बाबा से पूछा - "बाबा ! मेरा ऐसा कौन-सा पाप कर्म है जो सब तरह की कोशिश करने के बाद भी बुखार मेरा पीछा नहीं छोड़ता?"
उसकी करुण पुकार सुनकर बाबा के मन में दया जाग उठी और बाबा उससे बोले - "तू लक्ष्मी मंदिर के पास जाकर एक काले कुत्ते को दही-चावल खिलातेरा भला होगा|" बाबा के वचन सुनकर उसके मन में उम्मीद जाग उठीवह दही-चावल लेकर लक्ष्मी मंदिर पहुंचावहां पहले से एक काला कुत्ता खड़ा थाउसने उसे दही-चावल खिलाया तो वह तुरंत दोनों चीज खा गया और कुछ ही दिनों में उसका बुखार पूरी तरह से ठीक हो गया|

कल चर्चा करेंगे..बूटी का रोग छूमंतर     

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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