शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 22 July 2017

शिव जी को क्यों प्रिय है सावन ?

ॐ नमः शिवाय

    
  श्रावण महीना है, जो जुलाई-अगस्त माह में पड़ता है। इसे वर्षा ऋतु या पावस ऋतु भी कहते हैं। श्रवण मास भगवान शिव को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती पार्वती के रूप में हिमालय की कन्या के रूप में जन्मीं। उन्होंने युवावस्था में सावनके महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत करके शिवजी को प्रसन्न किया, जिसके बाद श्रवण मास शिवजी को प्रिय हो गया।

शिव पुराण के अनुसार श्रवण मास में शिव की उपासना अत्यंत फलदायी है। भोलेनाथ शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनवांछित फल प्रदान करते हैं। आशुतोष भगवान शिव का त्रिगुण तत्व (सत, रज, तम) तीनों पर समान अधिकार है। शिव मस्तिष्क पर चंद्रमा को धारण करके शशिशेखर कहलाते हैं। चंद्रमा से इन्हें विशेष स्नेह है, चंद्रमा जल तत्व ग्रह है एवं सावन में जल तत्व की अधिकता होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार श्रवण त्रिदेव और पंच देवों के प्रधान शिव की भक्ति को समर्पित है। महादेव के जलाभिषेक के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है- समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने पर महादेव ने विष का पान किया, अग्नि के समान विष पीने के बाद भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया। विषाग्नि से भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पण किया। यह भी मान्यता है कि विष के प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया। इसी धारणा को आगे बढ़ाते हुए भगवान शंकराचार्य ने ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम में गंगा जल चढ़ा कर शिव के जलाभिषेक का महत्त्व बताया। शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान श्रवण मास में किया था। इसे शिव भक्ति का पुण्य काल माना जाता है।

श्री गुरु राम दास जी – साखियाँ - एक तपस्वी का भ्रम दूर करना

ॐ सांई राम जी 
श्री गुरु राम दास जी – साखियाँ - एक तपस्वी का भ्रम दूर करना




श्री गुरु रामदास जी प्रभु प्यार में सदैव मगन रहते| अनेकों ही सिख आप जी से नामदान लेकर गुरु-२ जपते थे|गुरु सिखी कि ऐसी रीति देख कर एक इर्शालु तपस्वी आपके पास आया| गुरु जी ने उसे सत्कार देकर अपने पास बिठाया और पूछा! आओ तपस्वी जी किस तरह आए हो? तपस्वी ने कहा मैंने सारे धर्मों के भक्तों को देखा है, तीर्थों कि यात्रा करते हुए भी बहुत लोग देखे हैं परन्तु आपके सिखो जैसा मैंने कोई अभिमानी नहीं देखा| क्योंकि यह ओर किसी मत के साधु सन्त को नहीं मानते और ना ही यह वेद शास्त्रों की शुभ रीति को ग्रहण करते हैं| आपके सिख तो केवल आपको और आपकी बाणी को ही मानते हैं और पूजा भी करते हैं| इस प्रकार वेद बाणी का त्याग करके इनका उद्धार किस तरह होगा?

गुरु जी ने पूछा तपस्वी जी! तीर्थ स्नान व वेद बाणी के पाठ का क्या फल होता है? तपस्वी ने कहा इनका फल बहुत बड़ा है| तीर्थ स्नान से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्तिम समय स्वर्ग की प्राप्ति होती है| अगर बात करे वेदों की तो वेदों के पाठ से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है| गुरु जी ने कहा तपस्वी जी! हमारे सिख संगतो की सेवा करके जो सुख प्राप्त करते हैं वह आपको भी प्राप्त नहीं होता| आपने मूल तत्व की पहचान नहीं की और अपनी सारी आयु तीर्थ स्नान और वेद पाठ के झूठे अहंकार में लगा दी| यह अहंकार गुरु के मिलने से ही दूर होता है| तपस्वी ने आगे से फिर कहा जब तीर्थ स्नान की महिमा को सब ऋषि मुनियों ने उत्तम माना है और आप इसको तुच्छ और साधु संगत की महिमा को बड़ा किस तरह कहते हो?

इस प्रथाए गुरु रामदास जी ने इस शब्द का उच्चारण किया:

मलारू महला ४||

गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धुरि साधु की ताई ||
किलविख मैलु भरे परे हमरै विचि हमरी मैलु साधू की धूरि गवाई ||१||

तीरथि अठसठि मजनु नाई ||
सति संगति की धूरि परी उडि नेत्री सभ दुरमति मैलु गवाई ||१|| रहाउ ||

जा हरनवी तपै भागीरथि आणी केदारु थापिओ महसाई ||
कांसी क्रीसनु चरावत् गाऊ मिलि हरि जन सोभा पाई||२||

जितने तीरथ देवी थापे सभि तितने लोचहि धूरि साधू की ताई||
हरि का संतु मिलै गुर साधू लै तिसकी धूरि मुखि लाई ||३||

जितनी सृसटि तुमरी मेरे सुआमी सभ तितनी लोचै धूरि साधू को ताई||
नानक लिलाटि होवै जिसु लिखिआ साधू धूरि दे पारि लंघाई ||४||२||

इस शब्द के भाव समझकर तपस्वी ने कहा मेरा सौभाग्य है जो मैंने आपके वचन सुने हैं मेरा भ्रम दूर हो गया है| इसके उपरांत गुरु जी के वचनों पर श्रद्धा धारण करके तपस्वी ने सिखी धारण कर ली और सदा सत्संग करता रहा|

Friday, 21 July 2017

श्री गुरु राम दास जी – साखियाँ - भाई आदम को पुत्र का वरदान

ॐ सांई राम जी 

श्री गुरु राम दास जी साखियाँ - भाई आदम को पुत्र का वरदान



भाई आदम जिला फिरोजपुर गाँव बिन्जू का रहने वाला था| वह पीरो-फकीरों की खूब सेवा करता परन्तु उसकी मुराद कही पूरी न हुई| उसके घर में पुत्र पैदा न हुआ| एक दिन उसे गुरु का सिख मिला| आदम ने उसे श्रधा सहित पानी पिलाया और प्रार्थना की कि मेरे घर संतान नहीं है| आप गुरु जी के आगे अरदास करो कि मेरे घर पुत्र पैदा हो| सिख ने कहा इस समय गद्दी पर गुरु रामदास जी सुशोभित हैं| तुम उनके पास गुरु के चक्क में चले जाओ| उनके पास तुम्हारी मुराद पूरी हो जायेगी|

भाई आदम सिख की बात मानकर पत्नी को साथ लेकर गुरु के चक्क आ गया| भाई आदम जंगल से रोज दो गठरी लकड़ी लाता और लंगर में दे देता और एक अपने घर में जमा करता| एक दिन सर्दी के मौसम में वर्षा के कारण सूखी लकड़ी कही न मिली| तब भाई आदम ने गुरु जी को खुशी प्रदान करने के लिए अपने घर की सारी सूखी लकड़ी जरूरतमंदों में बाँट दी| सर्दी से ठिठुर रहें लोग सूखी लकड़ी जलाकर खुश हो गए| गुरु जी भाई आदम की मिल-बाँट कर प्रयोग करने वाली प्रवृति को देखकर प्रशंसा करने लगे| संगते भी बहुत खुश थी| गुरु जी ने भाई आदम को बुलाया और कहा सिखा! गुरु नानक जी की संगत तेरे ऊपर खुश हुई है| तुम अपने मन का मनोरथ बताओ, जो पूरा किया जा सके| परन्तु भाई आदम संकोच कर गए और कहने लगे महाराज! मुझे दर्शन दो यही मेरा मनोरथ है| गुरु जी ने तीन बार पूछा और तीनों बार ही आदम ने "दर्शन दो" का वरदान माँगा| तब अन्तर्यामी गुरु ने कहा - भाई तुम कल अपनी पत्नी को साथ लेकर आना और फिर जिस मकसद से तुमने गुरु घर की सेवा की वह आकर बताना| आपका मनोरथ गुरु नानक जी पूरा करेगें| इसके पश्चात आदम ने डेरे में जाकर सारी बात पत्नी को बताई और दूसरे दिन पत्नी को साथ लेकर गुरु दरबार पर आ गया| गुरु जी ने वचन किया कि आज अपना मनोरथ निसंकोच बताओ| पत्नी ने हाथ जोड़कर कहा महाराज! हमें पुत्र की दात प्रदान करो| यही मनोरथ के साथ हम गुरु दरबार में आए थे|

गुरु जी ने ध्यान में बैठकर वचन किया कि हम आपकी श्रद्धा, भक्ति और निष्काम सेवा पर बहुत खुश हैं| गुरु नानक जी कि कृपा से आपके घर प्रतापी पुत्र होगा| उसका नाम भगतु रखना| अब आप अपने घर जाओ और गुरु यश का आनंद प्राप्त करो| गुरु की आज्ञा के अनुसार भाई आदम अपने गाँव चला गया और उनके घर लड़के ने जन्म लिया और जिसका नाम भगतु ही रखा गया| भाई भगतु जी बड़े नाम रसिक और करनी वाले प्रतापी पुरुष हुए हैं| इस प्रकार आदम और उसकी पत्नी का गुरु दर पर विश्वास और बढ़ गया|

Thursday, 20 July 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 50

ॐ सांई राम





आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साँँईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 50

काकासाहेब दीक्षित, श्री. टेंबे स्वामी और बालाराम धुरन्धर की कथाएँ ।
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मूल सच्चिरत्र के अध्याय 39 और 40 को हमने एक साथ सम्मिलित कर लिखा है, क्योंकि इन दोनों अध्यायों का विषय प्रायः एक-सा ही है ।

प्रस्तावना
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उन श्री साई महाराज की जय हो, जो बक्तों के जीवनाधार एवं सदगुरु है । वे गीताधर्म का उपदेश देकर हमें शक्ति प्रदान कर रहे है । हे साई, कृपादृष्टि से देखकर हमें आशीष दो । जैसे मलयगिरि में होनेवाला चन्दनवृक्ष समस्त तापों का हरण कर लेता है अथवा जिस प्रकार बादल जलवृष्टि कर लोगों को शीतलता और आनन्द पहुँचाते है या जैसे वसन्त में खिले फूल ईश्वरपूजन के काम आते है, इसी प्रकार श्री साईबाबा की कथाएँ पाठकों तथा श्रोताओं को धैर्य एवं सान्त्वना देती है । जो कथा कहते या श्रवण करते है, वे दोनों ही धन्य है, क्योंकि उनके कहने से मुख तथा श्रवण से कान पवित्र हो जाते है ।
यह तो सर्वमान्य है कि चाहे हम सैकड़ों प्रकार की साधनाएँ क्यों न करे, जब तक सदगुरु की कृपा नहीं होती, तब तक हमेंअपने आध्यात्मिक ध्येय की प्राप्ति नहीं हो सकती । इसी विषय में यह निम्नलिखित कथा सुनिये :-


काकासाहेब दीक्षित (1864-1926)
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श्री हरि सीताराम उपनाम काकासाहेब दीक्षित सन् 1864 में वड़नगर के नागर ब्राहमण कुल में खणडवा में पैदा हुए थे । उनकी प्राथमिक शिक्षा खण्डवा और हिंगणघाट में हुई । माध्यमिक सिक्षा नागुर में उच्च श्रेणी में प्राप्त कने के बाद उन्होंने पहले विल्सन तथा बाद में एलफिन्स्टन काँलेज में अध्ययन किया । सन् 1883 में उन्होंने ग्रेज्युएट की डिग्री लेकर कानूनी (L. L. B.) और कानूनी सलाहकार (Solicitor) की परीक्षाएँ पास की और फिर वे सरकारी सालिसिटर फर्म-मेसर्स लिटिल एण्ड कम्पनी में कार्य करने लगे । इसके पश्चात उन्होंने स्वतः की एक साँलिसिटर फर्म चालू कर दी ।

सन् 1909 के पहले तो बाबा की कीर्ति उनके कानों तक नहीं पहुँची थी, परन्तु इसके पश्चात् वे शीघ्र ही बाबा के परम भक्त बन गये । जब वे लोनावला में निवास कर रहे थे तो उनकी अचानक भेंट अपने पुराने मित्र नानासाहेब चाँदोरकर से हुई । दोनों ही इधर-उधर की चर्चाओं में समय बिताते थे । काकासाहेब ने उन्हें बताया कि जब वे लन्दन में थे तो रेलगाड़ी पर चढ़ते समय कैसे उनका पैर फिसला तथा कैसे उसमें चोट आई, इसका पूर्ण विवरण सुनाया । काकासाहेब ने आगे कहा कि मैंने सैकड़ो उपचार किये, परन्तु कोई लाभ न हुआ । नानासाहेब ने उनसे कहा कि यदि तुम इस लँगड़ेपन तथा कष्ट से मुक्त होना चाहते हो तो मेरे सदगुरु श्री साईबाबा की शरण में जाओ । उन्होंने बाबा का पूरा पता बताकर उनके कथन को दोहराया कि मैं अपने भक्त को सात समुद्रों के पास से भी उसी प्रकार खींच लूँगा, जिस प्रकार कि एक चिड़िया को जिसका पैर रस्सी से बँधा हो, खींच कर अपने पास लाया जाता है । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि तुम बाबा के निजी जन न होगे तो तुम्हें उनके प्रति आकर्षण भी न होगा और न ही उनके दर्शन प्राप्त होंगे । काकासाहेब को ये बातें सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा, वे शिरडी जाकर बाबा से प्रार्थना करेंगे कि शारीरिक लँगड़ेपन के बदले उनके चंचल मन को अपंग बनाकर परमानन्द की प्राप्त करा दे ।

कुछ दिनों के पश्चात् ही बम्बई विधान सभा (Legislative Assembly) के चुनाव में मत प्राप्त करने के सम्बन्ध में काकासाहेब दीक्षित अहमदनगर गये और सरदार काकासाहेब मिरीकर के यहां ठहरे । श्री. बालासाहेब मिरीकर जो कि कोपरगाँव के मामलतदार तथा काकासाहेब मिरीकर के सुपत्र थे, वे भी इसी समय अश्वप्रदर्शनी देखने के हेतु अहमदनगर पधारे थे । चुनाव का कार्य समाप्त होने के पश्चात काकासाहेब दीक्षित शिरडी जाना चाहते थे । यहाँ पिता और पुत्र दोनों ही घर में विचार कर रहे थे कि काकासाहेब के साथ भेजने के लिये कौन सा व्यक्ति उपयुक्त होगा और दूसरी ओर बाबा अलग ही ढंग से उन्हें अपने पास बुलाने का प्रबन्ध कर रहे थे । शामा के पास एक तार आया कि उनकी सास की हालत अधिक शोचनीय है और उन्हें देखने को वे शीघ्र ही अहमदनगर को आये । बाबा से अनुमति प्राप्त कर शामा ने वहां जाकर अपनी सास को देखा, जिनकी स्थिति में अब पर्याप्त सुधार हो चुका था । प्रदर्शनी को जाते समय नानासाहेब पानसे तथा अप्पासाहेब दीक्षित से भेंट करने तथा उन्हें अपने साथ शिरडी ले जाने को कहा । उन्होंने शामा के आगमन की सूचना काकासाहेब दीक्षित और मिरीकर को भी दे दी । सन्ध्या समय शामा मिरीकर के घर आये । मिरीकर ने शामा का काकासाहेब दीक्षित से परिचय कर दिया और फिर ऐसा निश्चित हुआ कि काकासाहेब दीक्षित उनके साथ रात 10 बजे वाली गाड़ी से कोपरगाँव को रवाना हो जाये । इस निश्चय के बाद ही एक विचित्र घटना घटी । बालासाहेब मिरीकर ने बाबा के एक बड़े चित्र पर से परदा हटाकर काकासाहेब दीक्षित को उनके दर्शन कराये तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिनके दर्शनार्थ मैं शिरडी जाने वाला हूँ, वे ही इस चित्र के रुप में मेरे स्वागत हेतु यहाँ विराजमान है । तब अत्यन्त द्रवित होकर वे बाबा की वन्दना करने लगे । यह चित्र मेघा का था और काँच लगाने के लिये मिरीकर के पास आया था । दूसरा काँच लगवा कर उसे काकासाहेब दीक्षित तथा शामा के हाथ वापस शिरडी भेजने का प्रबन्ध किया गया । 10 बजे से पहले ही स्टेशन पर पहुँचकर उन्होंने द्घितीय श्रेणी का टिकट ले लिया । जब गाड़ी स्टेशन पर आई तो द्घितीय श्रेणी का डिब्बा खचाखच भरा हुआ था । उसमें बैठने को तिलमात्र भी स्थान न था । भाग्यवश गार्डसाहेब काकासाहेब दीक्षित की पहिचान के निकल आये और उन्होंने इन दोनों को प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठा दिया । इस प्रकार सुविधापू4वक यात्रा करते हुए वे कोपरगाँव स्टेशन पर उतरे । स्टेशन पर ही शिरडी को जाने वाले नानासाहेब चाँदोरकर को देखकर उनके हर्ष का पारावार न रहा । शिरडी पहुँचकर उन्होंने मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन किये । तब बाबा कहने लगे कि मैं बड़ी देर से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर राह था । शामा को मैंने ही तुम्हें लाने के लिये भेज दिया था । इसके पश्चात् काकासाहेब ने अनेक वर्ष बाबा की संगति में व्यतीत किये । उन्होंने शिरडी में एक वाड़ा (दीक्षित वाडा) बनवाया, जो उनका प्रायः स्थायी घर हो गया । उन्हें बाबा से जो अनुभव प्राप्त हुए, वे सब स्थानाभाव के कारण यहाँ नहीं दिये जा रहे है । पाठकों से प्रार्थना है कि वे श्री साईलीला पत्रिका के विशेषांक (काकासाहेब दीक्षित) भाग 12 के अंक 6-9 तक देखे । उनके केवल एक दो अनुभव लिखकर हम यह कथा समाप्त करेंगे । बाबा ने उन्हें आश्वासन दिया था कि अनत समय आने पर बाबा उन्हें विमान में ले जायेंगे, जो सत्य निकला । तारीख 5 जुलाई, 1926 को वे हेमाडपंत के साथ रेल से यात्रा कर रहे थे । दोनों में साईबाबा के विषय में बाते हो रही थी । वे श्री साईबाबा के ध्यान में अधिक तल्लीन हो गये, तभी अचानक उनकी गर्दन हेमाडपंत के कन्धे से जा लगी । और उन्होंने बिना किसी कष्ट तथा घबराहट के अपनी अंतिम श्वास छो़ड़ दी ।


श्री. टेंबे स्वामी
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अब हम द्घितीय कथा पर आते है, जिससे स्पष्ट होता है कि सन्त परस्पर एक दूसरे को किस प्रकार भ्रतृवत् प्रेम किया करते है । एक बार श्री वासुदेवानन्द सरस्वती, जो श्री. टेंबे स्वामी के नाम से प्रसिदृ है, ने गोदावरी के तीर पर रामहेन्द्री में आकर डेरा डाला । वे भगवान दत्तात्रेय के कर्मकांडी, ज्ञानी तात योगी भक्त थे । नाँदेड़ (निजाम स्टेट) के एक वकील अपने मित्रों के सहित उनसे भेंट करने आये और वार्तालाप करते-करते श्री साईबाबा की चर्चा भी निकल पड़ी । बाबा का नाम सुनकर स्वामी जी ने उन्हें करबदृ प्रणाम किया और पुंडलीकराव (वकील) को एक श्रीफल देकर उन्होंने कहा कि तुम जाकर मेरे भ्राता श्री साई को प्रणाम कर कहना कि मुझे न बिसरे तथा सदैव मुझ पर कृपा दृष्टि रखें । उन्होंने यह भी बतलाया कि सामान्यतः एक स्वामी दूसरे को प्रणाम नहीं करता, परन्तु यहाँ विशेष रुप से ऐसा किया गया है । श्री. पुंडलीकराव ने श्रीफल लेकर कहा कि मैं इसे बाबा को दे दूँगा तथा आपका सन्देश भी उचित था । स्वामी ने बाबा को जो भाई शब्द से सम्बोधित किया था, वह बिकुल ही उचित था । उधर स्वामी जी अपनी कर्मकांडी पदृति के अनुसार दिनरात अग्नहोत्र प्रज्वलित रखते थे और इधर बाबा की धूनी दिन रात मसजिद में जलती रहती थी

एक मास के पश्चात ही पुंडलीकराव अन्य मित्रों सहित श्रीफल लेकर शिरडी को रवाना हुये । जब वे मनमाड पहुँचे तो प्यास लगने के कारम एक नाले पर पानी पीने गये । खाली पेट पानी न पीना चाहिये, यह सोचकर उन्होंने कुछ चिवड़ा खाने को निकाल, जो खाने में कुछ अधिक तीखा-सा प्रतीत हुआ । उसका तीखापन कम करने के लिये किसी ने नारियल फोड़ कर उसमें खोपरा मिला दिया और इस तरह उन लोगों ने चिवड़ा स्वादिष्ट बनाकर खाया । अभाग्यवश जो नारियल उनके हाथ से फूटा, वह वही था, जो स्वामीजी ने पुंजलीकराव को भेंट में देने को दिया था । शिरडी के समीप पहुँचने पर उन्हें नारियल की स्मृति हो आई । उन्हें यह जानकर बड़ा ही दुख हुआ कि भेंट स्वरुप दिये जाने वाला नारियल ही फोड़ दया गया है । डरते-डरते और काँपते हुए वे शिरडी पहुँचे और वहाँ जाकर उन्होंने बाबा के दर्शन किये । बाबा को तो यहाँ नारियल के सम्बन्ध में स्वामी से बेतार का तार प्राप्त हो चुका था । इसीलिये उन्होंने पहले से ही पुंडलीकराव से प्रश्न किया कि मेरे भाई की भेजी हुई वस्तु लाओ । उन्होंने बाबा के चरण पकड़ कर अपना अपराध स्वीकार करते हुये अपनी चूक के लिये उनसे क्षमा याचना की । वे उसके बदले में दूसरा नारियल देने को तैयार थे, परन्तु बाबा ने यह कहते हुए उसे अस्वीकार कर दिया कि उस नारियल का मूल्य इस नारियल से कई गुना अधिक था और उसकी पूर्ति इस साधारण नारियल से नहीं हो सकती । फिर वे बोले कि अब तुम कुछ चिन्ता न करो । मेरी ही इच्छा से वह नारियल तुम्हें दिया गया तथा मार्ग में फोड़ा गया है । तुम स्वयं में कर्तापन की भावना क्यों लाते हो । कोई भी श्रेष्ठ या कनिष्ठ कर्म करते समय अपने को कर्ता न जानकर अभिमान तता अहंकार से परे होकर ही कार्य करो, तभी तुम्हारी द्रुत गति से प्रगति होगी । कितना सुन्दर उनका यह आध्यात्मिक उपदेश था ।

बालाराम धुरन्धर
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सान्ताक्रूज, बम्बई के श्री. बालाराम धुरन्धर प्रभु जाति के एक सज्जन थे । वे बम्बई के उच्च न्यायालय में एडवोकेट थे तथा किसी समय शासकीय विधि विघालय (Govt. Law School) और बम्बई के प्राचार्य (Principal) भी थे । उनका सम्पूर्ण कुटुम्ब सात्विक तथा धार्मिक था । श्री बालाराम ने अपनी जाति की योग्य सेवा की और इस सम्बन्ध में एक पुस्तक भी प्रकाशित कराई । इसके पश्चात् उनका ध्यान आध्यात्मिक और धार्मिक विषयों पर गया । उन्होंने ध्यानपूर्वक गीता, उसकी टीका ज्ञानेश्वरी तथा अन्य दार्शनिक ग्रन्थों पर अध्ययन किया । वे पंढरपुर के भगवान विठोबा के परम भक्त ते । सन् 1912 में उन्हें श्री साईबाबा के दर्शनों का लाभ हुआ । छः मास पूर्व उनके भाई बाबुलजी और वामनराव ने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किये थे और उन्होंने घर लौटकर अपने मधुर अनुभव भी श्री. बालाराम व परिवार के अन्य लोगों को सुनाये । तब सब लोगों ने शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करने का निश्चय किया । यहाँ शिरडी में उनके पहुँचने के पूर्व ही बाबा ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि आज मेरे बहुत से दरबारीगण आ रहे है । अन्य लोगों द्घारा बाबा के उपरोक्त वचन सुनकर धुरन्धर परिवार को महान् आश्चर्य हुआ । उन्होंने अपनी यात्रा के सम्बन्ध में किसी को भी इसकी पहले से सूचना न दी थी । सभी ने आकर उन्हें प्रणाम किया और बैठकर वार्तालाप करने लगे । बाबा ने अन्य लोगों को बतलाया कि ये मेरे दरबारीगण है, जिनके सम्बन्ध में मैंने तुमसे पहले कहा था । फिर धुरन्धर भ्राताओं से बोले कि मेरा और तुम्हारा परिचय 60 जन्म पुराना है । सभी नम्र और सभ्य थे, इसलिये वे सब हाथ जोड़े हुए बैठे-बैठे बाबा की ओर निहारते रहे । उनमें सब प्रकार के सात्विक भाव जैसे अश्रुपात, रोमांच तथा कण्ठावरोध आदि जागृत होने लगे और सबको बड़ी प्रसननता हुई । इसके पश्चात वे सब अपने निवासस्थान पर भोजन को गये और भोजन तथा थोड़ा विश्राम लेकर पुनः मसजिद में आकर बाबा के पांव दबाने लगे । इस समय बाबा चिलम पी रहे थे । उन्होंने बालाराम को भी चिलम देकर एक फूँक लगाने का आग्रह किया । यघपि अभी तक उन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था, फिर भी चिलम हाथ में लेकर बड़ी कठिनाई से उन्होंने एक फूँक लगाई और आदरपूर्वक बाबा को लौटा दी । बालाराम के लिये तो यह अनमोल घडी थी । वे 6 वर्षों से श्वास-रोग से पीड़ित थे, पर चिलम पीते ही वे रोगमुक्त हो गये । उन्हें फिर कभी यह कष्ट न हुआ । 6 वर्षों के पश्चात उन्हें एक दिन पुनः श्वास रोग का दौरा पड़ा । यह वही महापुण्यशाली दिन था, जब कि बाबा ने महासमाधि ली । वे गुरुवार के दिन शिरडी आये थे । भाग्यवश उसी रात्रि को उन्हें चावड़ी उत्सव देखने का अवसर मिल गया । आरती के समय बालाराम को चावड़ी में बाबा का मुखमंडल भगवान पंडुरंग सरीखा दिखाई पड़ा । दूसरे दिन कांकड़ आरती के समय उन्हें बाबा के मुखमंडल की प्रभा अपने परम इष्ट भगवान पांडुरंग के सदृश ही पुनः दिखाई दी ।
श्री बालाराम धुरन्धर ने मराठी में महाराष्ट्र के महान सन्त तुकाराम का जीवन चरित्र लिखा है, परन्तु खेद है कि पुस्तक प्रकाशित होने तक वे जीवित न रह सके । उनके बन्धुओं ने इस पुस्तक को सन् 1928 में प्रकाशित कराया । इस पुस्तक के प्रारम्भ में पृष्ठ 6 पर उनकी जीवनी से सम्बन्धित एक परिक्षेपक में उनकी शिरडी यात्रा का पूरा वर्णन है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 19 July 2017

श्री गुरु रामदास जी जीवन- गुरु गद्दी मिलना

ॐ सांई राम जी 

श्री गुरु रामदास जी जीवन- गुरु गद्दी मिलना




गुरु अमरदास जी की दो बेटियां बीबी दानी व बीबी भानी जी थी| बीबी दानी जी का विवाह श्री रामा जी से और बीबी भानी जी का विवाह श्री जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) के साथ हुआ| दोनों ही संगत के साथ मिलकर खूब सेवा करते| गुरु जी दोनों पर ही खुश थे| इस कारण दोनों में से एक को गुरुगद्दी के योग्य निर्णित करने के लिए आपने उनकी परीक्षा ली|

एक दिन सांय काल गुरु जी ने बाउली के पास खड़े होकर रामा को कहा कि एक तरफ चबूतरा बनाओ जिसपर बैठकर हम बाउली की कारसेवा देखते रहें| फिर बाउली के दूसरी तरफ जाकर जेठा जी को एक चबूतरा तैयार करने की आज्ञा दी| दूसरे दिन दोनों ने ईंट गारे के साथ चबूतरे बनाए| गुरु जी ने पहले रामा जी का चबूतरा देखकर कहा यह ठीक नहीं बना| रामा ने कहा महाराज! मैंने आपके बताये अनुसार ठीक बनाया है| पर गुरु जी ने उसे दोबारा चबूतरा बनाने की आज्ञा दे दी| दूसरी ओर गुरु अमरदास जी ने जेठा जी का चबूतरा देखकर कहा, तुम हमारी बात नहीं समझे| इन्हें भी दोबारा बनाने की आज्ञा दे दी| जेठा जी ने चुप-चाप बिना कुछ कहे उसी समय ही चबूतरा तोड़ दिया और हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं अल्पबुद्धि जीव हूँ मुझे फिर से समझा दो| गुरु जी ने छड़ी के साथ लकीर खीचकर कहा कि इस तरह का चबूतरा बनाओ|

दूसरे दिन जब गुरूजी फिर दोनों के द्वारा बनाए गए चबूतरो को देखने के लिए गए तो फिर पहले रामा जी तरफ गए| गुरु जी ने फिर से वही कहा इन्हें गिरा दो और कल फिर बनाओ| रामा जी ने चबूतरा गिराने से इंकार कर दिया| परन्तु गुरु जी ने एक सेवक से चबूतरा गिरवा दिया| फिर गुरूजी जेठा जी के पास गए| गुरु जी का उत्तर सुनते ही उन्होंने चुप-चाप चबूतरा गिरा दिया और कहा मुझे क्षमा कीजिये मैं भूल गया हूँ| आपकी आज्ञा के अनुसार ठीक चबूतरा नहीं बाना पाया| गुरु जी फिर दोनों को समझाकर चले गए|

तीसरे दिन जब फिर दोनों ने चबूतरे तैयार कर लिए तो गुरु जी ने रामा के चबूतरे को देखकर कहा तुमने फिर उस तरह का चबूतरा नहीं बनाया जिस तरह का हमने कहा था| इसको गिरा दो, परन्तु उसने कहा मुझसे और अच्छा नहीं बन सकता आपको अपनी बात याद नहीं रहती, फिर मेरा क्या कसूर है? आप किसी और से बनवा लो| गुरु जी उसका उत्तर सुनकर चुप-चाप जेठा जी की तरफ चल पड़े| गुरु जी ने जेठा जी को भी वही उत्तर दिया कि तुमने ठीक नहीं बनाया, आप हमारे समझाने पर नहीं समझे| जेठा जी हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं कम बुद्धि करके आपकी बात नहीं समझ सका| आपजी की कृपा के बिना मुझे समझ नहीं आ सकती| आपका यह उत्तर सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि हमें आपकी यह सेवा बहुत पसंद आई| आप अहंकार नहीं करते और सेवा मैं ही आनन्द लेतें हैं|

एक दिन गुरु जी अपने ध्यान स्मरण से उठे और बीबी भानी से कहने लगे, पुत्री! हम आप दोनों कि सेवा से बहुत खुश है, इसलिए हम अपनी बाकि रहती आयु श्री रामदास जी को देकर बैकुन्ठ धाम को चले जाते है| इसके पश्चात् रामदास जी को कहने लगे कि आपकी निष्काम भगति ने हमें प्रभावित किया है| अब हम दोनों में कोई भेद नहीं है| हमारी बाकि आयु ६ साल ११ महीने और १८ दिन है,आप हमारे आसान पर बैठ कर गुरु घर कि मर्यादा को चलाना| यह वचन करते आप ने पांच पैसे और नारियल श्री रामदास जी के आगे रखकर गुरु नानक जी कि गुरु गद्दी कि तीन परिक्रमा करके माथा टेक दिया| अपने पुत्रों व सारी संगत के सामने कहने लगे कि आज से गुरुगद्दी के यह मालिक है| इन्ही को माथा टेको| मोहरी जी गुरु कि बात मान गये, मगर मोहन जी ने ऐसा करने से मना कर दिया कि गुरु गद्दी पर हमारा हक है, यह कहकर माथा नहीं टेका| तत्पश्चात सारी संगत ने श्री रामदास जी को गुरु मानकर माथा टेक दिया|


श्री गुरु रामदास जी का वैराग्य

सतगुरु का परलोक गमन सुनकर सभी भगत जन गुरु जी के पास दूर-२ से आकार माथा टेकते तो मोहन जी व मोहरी जी इसे अच्छा नहीं समझते थे| गुरु रामदास जी एकांत कमरे में जा कर बैठ गये और सतगुरु के वियोग में सात शब्द उच्चारण किए, जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पन्ना ९४ पर दर्ज है| शब्द की पहली पंक्ति यहाँ दर्ज है|
मझ महला ४ चउ पदे घरु १||

१.हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइिआ||
वडभागी हरि नामु धिआइिआ||

२.मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ||
हउ हरि बिनु दूजा अवरु ना जाना||

३.हरि गुण पड़ीए हरि गुण गुणीए ||
हरि हरि नामु कथा नित सुणीए||

४.हरि जन संत मिलहु मेरे भाई||
मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई||

५.हरि गुरु गिआनु हरि रसु हरि पाइिआ||
मनु हरि रंगि राता हरि रसु पीआइिआ||

६.हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई||
मिलि संगति मनि नामु वसाई ||

७.आवहु भैणे तुसी मिलहु पिआ री आं||
जो मेरा प्रीतमु दस तिसकै हउ वारीआं||

आप जी कि जीवन कथा में लिखा है कि इन वैरागमयी शब्दों को पड़कर आप के नेत्रों ससे जल धारा बह निकलती थी,
जिस लिए प्रेमी सिख चांदी कि कटोरियां आप कि आँखों के नीचे रख देते थे,ताकि आप के वस्त्र गीले ना होँ|यथा-

हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा, मै नीरू वहैं वहि चलै जीउ ||
(पहला शब्द पन्ना ८४)



जब ऐसे ही कुछ समय बीत गया तो संगतो में निराशा फ़ैल गयी| संगत कि ऐसी दशा देखकर बाबा बुड्डा जी व मोहरी जी गुरु जी के पास आकार बेनती करने लगे कि संगतो को दर्शन दें| तब आप जी ने बाहर आकार संगतो को शांत किया|

Tuesday, 18 July 2017

श्री गुरु रामदास जी जीवन-परिचय

ॐ सांई राम जी 
श्री गुरु रामदास जी जीवन-परिचय



 

प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): 24 सितम्बर 1534
Parkash Ustav (Birth date):  September 24, 1534 
पिता: बाबा हरि दास
Father: Baba Hari Das 
माँ: माता दया कौर
Mother: Mata Daya Kaur 
महल (पति या पत्नी): बीबी भानी
Mahal (spouse): Bibi Bhani 
साहिबज़ादे (वंश): प्रिथी चंद, महादेव और अर्जुन देव
Sahibzaday (offspring): Prithi Chand, Mahadev and Arjun Dev 
ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): गोइंदवाल में 1 सितम्बर 1581
Joti Jyot (ascension to heaven): September 1, 1581 at Goindwal 


श्री गुरु रामदास जी  का जन्म श्री हरिदास मल जी सोढी व माता दया कौर जी की पवित्र कोख से कार्तिक वदी 2 संवत 1561 को बाज़ार चूना मंडी लाहौर में हुआ| इनके बचपन का नाम जेठा जी था| बालपन में ही इनकी माता दया कौर जी का देहांत हो गया| जब आप सात वर्ष के हुए तो आप के पिता श्री हरिदास जी भी परलोक सिधार गए| इस अवस्था में आपको आपकी नानी अपने साथ बासरके गाँव में ले गई| बासरके आपके ननिहाल थे| यहाँ आकर आप भी अन्य क्षत्री बालकों की तरह घुंगणियाँ (उबले हुए चने) बेचते थे| जब श्री गुरु अमरदास जी चेत्र सुदी 4 संवत 1608 में गुरुगद्दी पर आसीन हुए तो आप जेठा जी का और भी ख्याल रखते थे| आपकी सहनशीलता, नम्रता व आज्ञाकारिता के भाव देखकर गुरु अमरदास जी ने अपनी छोटी बेटी की शादी 22 फागुन संवत 1610 को जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) से कर दी| श्री रामदास जी के घर तीन पुत्र पैदा हुए: 

· श्री बाबा प्रिथी चँद जी संवत 1614 में 

· श्री बाबा महादेव जी संवत 1617 में 

· श्री (गुरु) अर्जन देव जी वैशाख 1620 में 

विवाह के बाद भी श्री (गुरु) रामदास जी पहले की तरह ही गुरु घर के लंगर और संगत की सेवा में लगे रहते|

बीबी भानी अपने गुरु जी की बहुत सेवा करती| प्रातःकाल उठकर अपने गुरु पिता को गरम पानी के साथ स्नान कराती और फिर गुरुबाणी का पाठ करके लंगर में सेवा करती| एक दीन बीबी ने देखा कि चौकी का पावा टूट गया है जिसपर बैठकर गुरु जी स्नान करते हैं| उस पावे के नीचे बीबी ने अपना हाथ रख दिया ताकि गुरु जी के वृद्ध शरीर को चोट ना लगे| बीबी के हाथ में पावे का कील लग गया और खून बहने लगा| जब गुरु जी स्नान करके उठे तो बीबी से बहते खून का कारण पूछा| बीबी ने सारी बात गुरु जी को बताई| बीबी की बात सुनकर गुरु जी प्रसन्न हो गए और आशीर्वाद देने लगे कि संसार में आपका वंश बहुत बढ़ेगा जिसकी सारा संसार पूजा करेगा|

Monday, 17 July 2017

श्री गुरु अमर दास जी ज्योति - ज्योत समाना

ॐ सांई राम जी 
श्री गुरु अमर दास जी ज्योति - ज्योत समाना


अपने अंतिम समय को नजदीक अनुभव करके श्री गुरु अमरदास जी ने गुरुगद्दी का तिलक श्री रामदास जी को देकर सब संगत को आप जी ने उनके चरणी लगाया|इसके पश्चात् परिवार व सिखों को हुक्म मानने का उपदेश दिया जो बाबा सुन्दर जी, बाबा नन्द के पोत्र ने इसका वर्णन करके श्री गुरु अर्जुन देव जी को सुनाया-
रामकली सदु
१ ओंकार सतिगुरु परसादि||

जगि दाता सोइि भगति वछ्लु तिहु लोइि जीउ||
गुर सबदि समावए अवरु न जाणै कोइि जीउ||
अवरो न जाणहि सबदि गुर के एकु नामु धिआवहे||
परसादि नानक गुरु अंगद परम पदवी पावहे||
आइिआ ह्कारा चलणवारा हरि राम नामि समाइिआ||
जगि अमरू अटलु अतोलु ठाकरू भगति ते हरि पाइिआ||||
इस प्रकार सबको धैर्य और हुक्म मानने का वचन करके गुरु जी ने भादरव सुदी पूर्णिमा संवत १६६१ को अपने परलोक गमन कि तयारी कर ली| संगत को वाहिगुरू का सुमिरन व शब्द कितन करने कि आज्ञा करके आप कुश के आसन पर सफ़ेद चादर तान कर लेट गये| शरीर त्याग कर अकाल पुरख के चरणों में जा पहुँचे|


कुल आयु व गुरुगद्दी का समय (Shri Amar Das Ji Total Age and Ascension to Heaven)


श्री गुरु अमरदास जी २२ साल ५ महीने और ११ दिन गुरुगद्दी पर आसीन रहे|

आप ६५ साल ३ महीने और २३ दिन इस जगत में शरीर करके सुशोभित रहे|


Sunday, 16 July 2017

वाॅटस एप ग्रुप में शामिल होने के लिए निमंत्रण

आइये साँई परिवार में शामिल होने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

ॐ श्री साँईं राम जी

आप सभी से अनुरोध है कि कृपया ग्रुप के नियमों का पालन करते हुए इस ग्रुप की मर्यादा को बनाए रखने में हमारी मदद करे।

नियम:-

1 - कृपया किसी भी व्यक्ति विशेष को उसके नाम से संबोधित न करें

2 - किसी भी धर्म के बारे में आपत्ति जनक टिप्पणी न ही करें और न ही पोस्ट फारवर्ड करे

3 - ग्रुप में केवल धार्मिक और आध्यात्मिक पोस्ट ही डाले

4 - एक ही पोस्ट को बार बार पोस्ट न करें जो पोस्ट पहले आ चुकी हैं उसे दोबारा पोस्ट नहीं करे ।

5 - कोई भी ग्रुप का सदस्य किसी अन्य ग्रुप मेम्बर को संपर्क नहीं करेगा,  महिला सदस्यों को तो किसी भी हाल में नहीं, आपमें से कोई भी सदस्य महिला सदस्यों को किसी भी स्थिति में पर्सनल इनबॉक्स में सिंगल मेसेज (ॐ साँई राम) भी नही करेगा।

6 - *रात्री 11:15 बजे से प्रातः 3:45 बजे तक कोई भी ग्रुप का सदस्य पोस्ट नहीं कर सकता*

7- कोई भी ऐसा पोस्ट ना डालें जिसमें तुरंत उसे लाईक करने के लिए बाध्य किया गया हो और ऐसा न करने पर बुरी खबर की चेतावनी अंकित हो that i​s​ called chain messages

8- पर्सनल चैट भी नहीं करे

9- आप ग्रुप के प्रोफाइल पिक्चर और स्टेट्स को भी नहीं बदल सकते हैं। कृपया भगवान का मजाक ना उड़ाये।

10- ग्रुप में नियमित रूप से बाबा जी के दर्शन के पोस्ट को बिल्कुल भी नहीं गिना जाएगा । बल्कि यदि आप किसी को बाबा जी के दर्शन पोस्ट करते हुए देखे तो आप यह अधिकार उन्हीं के पास सुरक्षित रखने में सहयोग करने की कृपा करें। सभी सदस्य उसी पोस्ट को रिपीट ना करें।

11- कृपया ग्रुप में किसी से भी अपनी निजी जानकारी सांझा ना करें ।

आप सभी से अनुरोध है कि यह बाबा जी का ग्रुप हैं और इस ग्रुप में बाबा जी के पोस्ट के अलावा किसी भी भगवान के पोस्ट भी कर सकते हैं। या फिर किसी को किसी मुसीबत के समय ब्लड की जरूरत होती हैं तो आप वह पोस्ट भी इस ग्रुप में शामिल कर सकते हैं। पर किसी भी प्रकार के अन्य पोस्ट इस ग्रुप में स्वीकार नहीं किए जायेंगे।

नियमों का पालन ना करने वाले सदस्य को बिना किसी सूचना के ग्रुप से निकाला जा सकता है। किसी भी प्रकार की माफी मांगने पर भी दुबारा ग्रुप में शामिल नहीं किया जाएगा।

​आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से आभार प्रकट करते हुए आप सभी को इस बात से भी अवगत करवाना चाहता हूँ कि आज आपने किसी ग्रुप की सदस्यता ग्रहण नहीं की हैं अपितु एक परिवार के अटूट बंधन में बंधे हैं।

श्री साँई राम जी की कृपा से हम सभी आज संकल्प करते हैं कि इस ग्रुप की मर्यादा और परिवार की अखंडता को हम सर्वप्रथम श्री साँई राम जी के समान ही सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध है ।

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श्री गुरु अमर दास जी–साखियाँ - मृत राजकुमार को जीवित करना

ॐ सांई राम जी 
श्री गुरु अमर दास जीसाखियाँ - मृत राजकुमार को जीवित करना



एक दिन बल्लू आदि सिखो ने गुरु जी से बिनती की महाराज! अनेक जातियों के लोग यहाँ दर्शन करने आतें हैं पर उनके रहने के लिए कोई खुला स्थान नहीं है, इसलिए कोई खुला माकन बनाना चाहिए| यह विनती सुनकर गुरु जी ने बाबा बुड्डा जी व अपने भतीजे सावण मल के साथ पांच सिखों को रियासत हरीपुर के राजा के पास भेजा और कहा वहाँ से मकानों के लिए लकड़ी के गठे बांधकर ब्यास नदी के रास्ते से भेजने का प्रबंध करो| सावण मल ने कहा महाराज! पहाड़ी लोग गुरु की पूजा करने वाले नहीं हैं वे मूर्ति पूजक हैं| लकड़ी खरीदने के लिए बहुत सा धन चाहिए| गुरु जी ने कहा कि सब शक्तियाँ ही आपके अधीन होंगी तुम जिस तरह भी चाहोगे उनका प्रयोग करके राजा को गुरु घर का प्रेमी बना लेना फिर वह अपने आप ही आपकी जरूरत को पूरा कर देगा| यह बात कहकर गुरु जी ने अपने हाथ का रुमाल सावण मल को देते हुए कहा कि इसको हाथ में पकड़कर तुम जी कुछ भी चाहोगे वो हो जायेगा| आपकी इच्छा यह रूमाल पूरी करेगा| रूमाल लेकर सावण मल अपने साथ पांच सिखो को हरीपुर ले गया| उस दिन एकादशी का व्रत था जिसमे राजे की तरफ से आज्ञा थी कि कोई अन्न को हाथ ना लगाये| परन्तु सावण मल और उसके साथियों ने प्रसाद तैयार करके खाया और आने वाले को भी दिया| राजे को खबर हुई तो उसने अन्न खाने व व्रत ना रखने का कारण पूछा| सावण मल ने कहा गुरु जी का लंगर सदैव ही चलता रहता है| वह किसी भी तरह के भ्रमों में विश्वाश नहीं रखते| यह उत्तर सुनकर राजा के गुरु एक बैरागी साधु ने कहा इनको कैद कर लो| अपने गुरु के कहने पर राजे ने सावण मल को कैद कर लिया|

दूसरे ही दिन राजे के पुत्र को हैजा हो गया और वह मृत्यु को प्राप्त हो गया| मंत्री ने कहा आपने गुरु के निर्दोष सिख को कैद किया है, यह उन्ही के निरादर का फल है जिससे राजकुमार को मौत हासिल हुई है| शीघ्र ही कैद से निकालकर क्षमा मांगो| राजे ने ऐसा ही किया तब सावण मल ने कहा अगर राजा गुरु का सिख बन जाये तो मैं उसके पुत्र को जीवित कर दूँगा| जब राजे को इस बात का पता लगा तो उसने कहा अगर मेरा पुत्र जीवित हो गया तो मैं और मेरा परिवार गुरु जी के सिख बन जायेगें| जब सावण मल को महल में बुलाया गया तब सावण मल ने राजे को कहा आप चुपचाप बैठकर सत्य नाम का स्मरण करो और रोना - धोना बंद कर दो| इसके पश्चात सावण मल ने जपुजी साहिब का पाठ मृत लड़के के पास जाकर करना शुरू कर दिया और गुरु जी के रूमाल का कोना धोकर लड़के के मुँह में डाला और फिर रूमाल पकड़कर उसके सिर पर सत्य नाम कहते हुए घुमाया तो राजकुमार उठ कर बैठ गया| गुरु जी के ऐसे कौतक को देखकर राजा व रानी सावण मल के चरणों में गिर पड़े| उसने सावण मल को बहुत सा धन और वस्त्र भी भेंट किये| इसके पश्चात सारे रियासत के लोग ही गुरु के सिख बन गये|

दो चार दिन तो खुशी में ही बीत गये| तो एक दिन राजे ने सावण मल को यहाँ आने का करण पूछा| सावण मल ने कहा, महाराज! ब्यास नदी के किनारे गोइंदवाल नगर में गुरु अमरदास जी रहतें हैं उनके दर्शन करने के लिए दूर दूर से सिख सेवक आते हैं, उनके लिए मकान बनवाने के लिए बहुत सी लकड़ी की जरूरत है| राजे ने उसी समय अपने आदमियों को हुकुम दिया कि मकानों में काम आने वाली दियार आदि लकड़ी काटकर उनके बेड़े पर बांधकर ब्यास में तैरा दो| इस प्रकार बहुत सी लकड़ी गोइंदवाल पहुँच गई| उसी समय सावण मल को गुरु जी की बात याद आ गई और ऐसे कौतक को देखकर वह मन ही मन गुरु की उपमा करने लगे|



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For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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