शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 9 December 2017

अजामल जी

ॐ साँई राम जी



अजामल जी 

अजामल उधरिआ कहि ऐक बार ||

हे भक्त जनो! अजामल की कथा श्रवण करो| इस कथा के श्रवण करने वाले को यम भी तंग नहीं करता| वह ऊंचे चाल-चलन वाला बनता है| सुनने वाले के पाप मिटते हैं| उसका कल्याण होता है, उसे मोक्ष मिलता है|

अजामल उस समय का बहुत बड़ा पापी माना गया है| वह पापी किसलिए था? उसने क्या कसूर किया था? इसकी कथा इस प्रकार है :-

अजामल एक राज-ब्राह्मण का पुत्र था| उसका पिता राजा के पास पुरोहित भी था और वजीर भी| वह बहुत अक्लमंद था| उसके सूझवान होने की चर्चा चारों ओर थी|

अजामल की आयु जब पांच साल की हुई तो उसके माता-पिता ने उसको विद्यालय में दाखिल करवा दिया| वह जिस गुरु से पढ़ता था वह बहुत ही सूझवान था| सूझवान गुरु को जब सूझवान शिष्य मिल जाता है तो वह बहुत खुश हो जाता है ऐसी ही हालत अजामल के गुरु की भी थी| उसने देखा कि अजामल की जुबान पर सरस्वती बैठी है वह जो भी शब्द पढ़ता या सुनता वही कंठस्थ कर लेता| उसका कंठ भी रसीला था| जब वह वेद मंत्र पढ़ता तो एक अनोखा ही रंग दिखाई देता था| वह बहुत ही बुद्धिमान निकला| उसने केवल दस साल में ही बीस साल की विद्या प्राप्त कर ली| उसकी विद्वता की चहुं ओर प्रसिद्धि हो गई| ऐसी प्रसिद्धि कि बड़े-बड़े विद्वान भी उसके दर्शन करने आते थे|

एक दिन अजामल के गुरु ने कहा - 'अजामल! अभी तुम शिष्य हो!'

'हां, गुरुदेव मैं शिष्य हूं - पर कितनी देर शिष्य रहूंगा?' 'कोई चार साल और लगेंगे| चारों वेद और उपनिषद पूरे हो जाएंगे|'

'जो आज्ञा गुरुदेव|'

उसके गुरु ने उसकी ओर ध्यान से देख कर कहा - अजामल जब मेरे पास आओ या अपने घर को जाओ तो नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो| नगर में कभी नहीं जाना, क्योंकि अभी तुम्हारे वस्त्र विद्यार्थी के हैं| गुरु कि आज्ञा का पालन करना होगा| आज्ञा का पालन न किया तो दुःख उठाओगे| सुखी वही रहता है जो गुरु की आज्ञा का पालन करता है, क्योंकि गुरु को हर प्रकार के ज्ञान और कर्म का बोध होता है|'

हे गुरुदेव! क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप मुझे नगर में आने से क्यों रोकते हो? अजामल ने उत्तर दिया| उसका उत्तर सुनकर गुरु चुप कर गया| केवल इतना ही कहा-नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो, ऐसा ही कर्म है|

अजामल ने गुरु की आज्ञा का पालन किया| वह नगर के बाहर बाहर ही आया-जाया करता था| न ही वह इस बारे किसी से बात किया करता था कि उसके गुरु ने उसको नगर में जाने से मना किया है| इस तरह कई साल बीत गए| वह विद्या पढ़ता रहा| उसकी आयु अब बीस साल की हो गई| वह बहुत सुन्दर दर्शनी जवान निकला| नेत्रों में डोरे आए उसकी विद्या पूरी होने वाली थी| उसके पश्चात उसने गुरु दक्षिणा दे कर आज़ाद हो जाना था|

एक दिन उसका अपने मन से झगड़ा हो गया| उसने कहा, गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करके नगर में से जाना ही ठीक है| आखिर यह तो देखा जाए, गुरु जी रोकते क्यों हैं?

उसके एक मन का यह भी कहना था कि अजामल! गुरु की आज्ञा का पालन नहीं करेगा तो नरक का भागी होगा, बहुत दुःख भोगेगा|

देखा जाएगा, अजामल ने मन सुदृढ़ किया और वह अपने गुरु के पास से उठ कर उस मार्ग को छोड़ कर जिससे वह रोज़ आया-जाया करता था, अनदेखे रास्ते से नगर में से चल पड़ा|

अजामल के गुरु ने उसको इसलिए नगर में जाने से रोका था क्योंकि नगर में माया का विस्तार था| धन के रूप के चमत्कार ऐसे थे कि नौजवान का मन उस ओर शीघ्र आकर्षित हो जाता था| नवयुवक को पूर्ण ज्ञान नहीं होता था| गुरु के आश्रम के वेश्याओं का बाजार था, सारी ही वेश्या नगरी थी| उस मुहल्ले में वेश्याएं बैठती थीं| वह युवा-पुरुषों को अपने वश में करती थी| ऐसी हवा से बचाने के लिए ही गुरु ने अजामल को रोका था| गुरु चाहता था कि अजामल राजपुरोहित बन जाए| जब विवाह हो जाएगा तो फिर इस ओर ध्यान नहीं जाएगा| ऐसा ही विचार गुरु का था, क्योंकि गुरु के लिए शिष्य ही उसका पुत्र होता है, उसका ध्यान रखना गुरु का कर्त्तव्य और धर्म होता है| शिष्य का भी धर्म है कि वह गुरु की सेवा करे, उसकी आज्ञा का पालन करे| अजामल जब जाने लगा तो गुरु ने स्मरण करवाया कि अजामल! शहर के अन्दर मत जाना|

'बहुत अच्छा गुरुदेव' कह कर अजामल चल पड़ा| पर वह आश्रम में से निकल कर नगर के अंदर ही अंदर द्वार की ओर चल पड़ा| वह जैसे ही द्वार के भीतर गया, वैसे ही उसे नगर की महिमा बड़ी अनोखी-सी लगी| बहुत चहल-पहल थी| सबसे बड़ी बात यह थी कि सुन्दर नारियां हाव-भाव करती इधर-उधर घूमती दिखाई दीं| वह पुरुषों से मधुर बातें करती थीं| उनके रूप बहुत सुन्दर थे| नरगिस के फूल जैसे नयन थे| उनके अर्द्ध-नग्न तन तुलाब की पत्तियों की तरह चमकते थे| वह शोभा वाली थी|

उन सुन्दर नारियों को देखता हुआ अजामल अपने घर को चला गया| घर जाकर उसका मन पढ़ने और पाठ याद करने में न लगा| उसका मन बेचैन हो गया तथा जो कुछ देखा था वहीं सामने घूमने लगा| जब रात को नींद आई तो वही सपने आते रहे जो उसने नगर में देखा था| सुबह उठ कर स्नान किया| जब गुरु के पास गया तो गुरु ने उसकी आंखों में लाली देखी और पूछा-अजामल! रात सोए नहीं, क्या बात है?

'सोया था गुरुदेव!''
आंखें लाल और मन उखड़ा-सा क्यों है?''
पता नहीं गुरुदेव?''
नगर से बाहर-बाहर गया था, बाहर-बाहर आया था|'

अजामल ने पहले तो गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया और बाद में दूसरी महान भूल यह की कि गुरु से झूठ बोल दिया| उसने झूठ बोलते हुए कहा - गुरुदेव बाहर-बाहर गया था| वह झूठ बोला| इसलिए उसकी आत्मा कांपी, पर वह झूठ बोल चुका था|

उस दिन पढ़ने में मन न लगा| दो दोष हो गए| अजामल के मन पर बहुत भार रहा| दूसरा उसकी आंखों के सामने नगर के नजारे थे वह पाठ को पढ़ने नहीं देते थे| जैसे तैसे उसने समय व्यतीत किया| जब छुट्टी मिली तो फिर उस नगर के रास्ते ही चल पड़ा| उस नगर की वासना भरी महिमा को देखता रहा| देखता-देखता वह घर चला गया|

इस प्रकार दस-बारह दिन व्यतीत हो गए| वह नगर आता-जाता रहा| नारी रूप लीला ने उसके युवा मन को प्रभावित कर दिया| जादू जैसा असर और उसका मन डगमगाने लगा| जब मन डगमगा जाए तो मनुष्य शीघ्र शिकार हो जाता है| एक दिन एक रूपवती नवयौवना अभी खिलती जवानी 16-17 वर्ष की आयु वाली वेश्या ने उसका बाजू पकड़ लिया| उसे जाल में फंसा कर पाप कर्म की तरफ लगा लिया| वह अधिकतर समय उसके पास बैठा रहा| वह भोग-विलास में डूब गया और फिर घर चला गया| घर उसे पराया-सा लगा| उसकी आंखों में नींद न आई| सुबह पढ़ने के लिए गुरु आश्रम में समय पर न पहुंच सका|

पहले ही अजामल ने मंदे कर्म-दोष किए थे| एक गुरु की आज्ञा की अवज्ञा तथा दूसरा झूठ बोलना| उसने अब दो पाप और कर दिए| एक जूठन खाई और पराई नारी का गमन करना| वह वासना की ओर बढ़ गया| वेश्या का जूठा भोजन भी खा लिया| इन चारों ही महां-दोषों ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी| वह गुरु के पास जाता लेकिन मन भटकने से पाठ न कर पाता|

उसका सूझवान गुरु यह सब कुछ जान गया था लेकिन अपने मन की तसल्ली करने के लिए एक दिन अपने शिष्य अजामल के पीछे-पीछे चल पड़ा| उसने अपनी आंखों से देख लिया कि उसका बुद्धिमान शिष्य अजामल एक वेश्या के दर पर चला गया है| वह वापिस लौट आया और बहुत बैचेन रहा| अगले दिन जब अजामल आया तो गुरु ने उसे कहा-अजामल इस आश्रम से चले जाओ, तुमने जो कुछ पढ़ना था वह पढ़ लिया है| यह कह कर गुरु ने अजामल को भेज दिया| तदुपरांत गुरु ने अजामल के पिता को बुलाकर कर कहा -

'आप अजामल का विवाह कर दें| इसका अब कुंवारा रहना योग्य नहीं|'

अजामल का पिता राजपुरोहित था| राजपुरोहित होने के कारण उसके लिए अजामल का विवाह करना कोई मुश्किल कार्य न था| उसने शीघ्र ही अजामल के लिए योग्य कन्या देखकर उसे परिणय सूत्र में बांध दिया|

अजामल का विवाह हो गया| उसके घर एक सुन्दर, सुशील, गुणवंती तथा तेजवान दुल्हन आ गई| लेकिन अजामल का मन अब भी चंचल ही रहा| वह अपनी पत्नी से तृप्त न हुआ| वह वेश्या के द्वार पर फिर जाने लग गया| परन्तु उसका वेश्या के पास जाना छिपा न रह सका| इसका सब को पता चल गया| उसकी धर्मपत्नी ने काफी यत्न किए कि वह उसके पास ही रहे| सोलह श्रृंगार भी किए, नृत्य तथा संगीत से उसे प्रसन्न करने का प्रयास किया लेकिन अजामल का मन पापी ही रहा| वेश्या की जूठन और शराब ने उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था| उसकी सत्यवंती पत्नी अनेक प्रयास करके हार गई|

एक दिन अजामल का पिता परलोक गमन कर गया| उसके पश्चात राजा ने अजामल को राजपुरोहित बना दिया| राजपुरोहित बनने पर उसकी जिम्मेदारी और बढ़ गई| वह धर्म, समाज और राज्य का अध्यक्ष बन गया| धन-दौलत काफी बढ़ गई| किसी बात की कमी न रही, तब भी उसने न सोचा| वह सोचता भी कैसे? पांच दोष उसके ऊपर लग गए थे| गुरु की आज्ञा की अवज्ञा| झूठ बोलना| जूठन खानी और मदिरापान| पांचवा महान दोष-वेश्या का गमन करना था|

उसने उच्च पदवी मिलने पर भी वेश्या के पास जाना न छोड़ा| शहर में आम चर्चा होने लगी| जो बात छिपी थी, वह दुनिया में जाहिर हो गई, जाहिर भी सूर्य की तरह हुई| उसका नया प्यार एक कलावंती वेश्या से हो गया| वह पापों की पुतली माया रूप धारण कर बैठी थी|

एक दिन अजामल को राजा ने अपने पास बुलाया और पूछा-अजामल! 'आप राजपुरोहित हैं|'

हां, महाराज! अजामल ने कहा|

आपके विरुद्ध एक आरोप लगा है|

'क्या आरोप है?'

'आप कलावंती वेश्या के पास जाते हैं| मदिरा पान करके रंगरलियां मनाते हैं|'

'सत्य है महाराज, इसमें झूठ नहीं| मैं कलावंती के पास जाता हूं, क्योंकि मैं उससे प्रेम करता हूं|'

'क्या यह नहीं मालूम कि कोई भी पंडित कभी ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जिससे राज्य में बदनामी का कारण बने और जिसका देश की प्रजा पर बुरा असर पड़े?'

'यह भी पता है महाराज|'

'फिर कलावंती के पास क्यों जाते हो? क्या तुम ने अपनी ही बदनामी स्वयं नहीं सुनी?'

'सुनी है! लेकिन मैं विवश हूं| मैं कलावंती को छोड़ नहीं सकता| उसके रूप ने मुझे मोह लिया है|'

अजामल और आगे बढ़ गया| वह 'निर्लज्ज' भी हो गया, क्योंकि जिसके पास निर्लज्जता आ गए उसके पास कुछ भी नहीं रहता| निर्लज्जता सबसे महान दोष या पाप है|

राजा बुद्धिमान था| उसकी आयु अजामल के पिता जितनी थी| वह जान गया कि उसका राजपुरोहित पापों का भागीदार बन गया है| पाप इसको अच्छे लग रहे हैं| उसने अजामल से कहा - 'यदि आप की बात सही है कि वह आपको अपना पति स्वीकार कर चुकी है तो उसे अपने घर ले आओ, घर रहेगी तो लोगों को पता नहीं चलेगा| जितनी देर वहां रहेगी उतनी देर वेश्या है| कर्म करना भी स्थान की जांच करता है| जगह पर ही हर चीज़ की शोभा होती है| आप भी राज पुरोहित है| राज पुरोहित को शोभा नहीं देता कि वह वेश्या के बाजार में जाए|'

'मैं उसको घर नहीं ला सकता, न ही मैं उसको छोड़ सकता हूं| अजामल ने अपना फैसला दे दिया|'

'यह पक्का फैसला है?' राजा ने पूछा|

'जी हां पक्का फैसला!'

'सोच लो!'

'जी सोच लिया है!'

'देखो अजामल! आज तो नहीं, अभी से तुम राज पुरोहित नहीं! खामियां यह हैं! गुरु की आज्ञा को भंग करना, झूठ बोलना| जूठ खानी, वेश्या गमन, शराब पीनी और निर्लज्जता से मंद कर्मों से रुकने से मना करना| ऐसे दोषों के रहते हुए आप राज पुरोहित रहने के अधिकारी नही| आपको अब शहर से बाहर रहना पड़ेगा| सारी जायदाद और राज महल जो है वह अब आपकी पत्नी और उसके बच्चे को दे दिया जाएगा| आज के बाद इस शहर में मत आना| कलावंती को भी इस शहर से बाहर निकाल दिया जाता है| यह हुक्म है, कोई अपील नहीं न कोई साधन जाओ!'

राजा के हुक्म को सुन कर राज दरबारी और अहलकार सब घबरा गए, लेकिन अजामल पर कोई असर न हुआ| उस समय राजदूतों ने अजामल को धक्के मार कर बाहर निकाल दिया| उसको शहर से बाहर निकालने का हुक्म हो गया|

अजामल की पत्नी ने जब यह हुक्म सुना तो वह बहुत दुखी हुई| पर राजा ने हुक्म को टालना भी कठिन था| नगर वासी भी हैरान हुए| पर अजामल को कोई रोक नस सका|

अजामल ने कलावंती को साथ लेकर शहर से बाहर झोंपड़ी बना ली| कलावंती का सारा सामान वहां गया! गरीबों और अछूतों में रहने लगे| रात दिन भोग-विलास में लगे रहे तो चार बच्चे हो गए| उन बच्चों के लिए अन्न वस्त्र की जरूरत थी| राजा का हुक्म था कि कोई मदद न करें| सभी उसको 'अजामल-पापी' कहने लग पड़े थे और वे चिड़िया-पक्षी मार कर खाने लगे! नंगे रहने लगे| दुर्दशा इतनी बुरी हो गई कि वह पागलों की तरह खीझ कर बात करने लग गया| शरीर रोगी हो गया| ऐसा रोगी की जीवन की उम्मीद कम हो गई| जब शरीर ऐसा हुआ उससे पहले सात पुत्र हो गए| सातवें पुत्र का नाम नारायण रखा| जैसे भाई गुरदास जी फरमाते हैं : -

पतित अजामल पाप करि जाइ कलावतनी दे रहिआ |
गुर ते बेमुख होइ कै पाप कमावै दुरमति दहिआ |
बिरथा जनमु गवाइअनु भवजल अंदर फिरदा वहिआ |
छिअ पुत जाऐ वेसना पापां दे फल इछे लहिआ |
पुत उपंना सतवां नाऊं धरन नो चिति उमहिआ |
गुरु दुआरै जाइ कै गुरमुखि नाउं नराइण कहिआ |

उसने सातवें पुत्र का नाम नारायण रख लिया| दुखी होने लगा| वह पापों और दुखों का एक पुतला बन गया| वह सुबह जंगल को चला जाता और शाम को शिकार करके वापस आ जाता| कलावंती अब एक भारी गृहिणी थी| सात बच्चों की मां थी, और रूप भी अब ढल गया था| वह दुखी होने लगी|

स्त्री-पुरुष का यह स्वभाव है, जब दुःख-कष्ट तन को आए तो भगवान या नेकी याद आती है| कलावंती को अब पछतावा होने लगा कि उसने एक उच्च ब्राह्मण का जीवन नष्ट किया और अपना भी| पापिन बनी| अगर राजा से क्षमा मांग लेती तो इतना कष्ट न पाती| झौंपड़ी के पास से कोई साधू-संतों की तरफ देखती रहती|

एक दिन देवनेत के साथ समय बन गया कि दो साधू उसकी झौंपड़ी के पास ठहर गए| वह महापुरुष बहुत सूझवान थे| भगवान रूप! मगर कलावंती के पास कुछ नहीं था, जो उनको खाने को देती| वह वैष्णव साधू थे| अजामल शाम को घर आया| वह चिड़िया, बटेर और कबूतर आदि मार कर लाया तो कलावंती ने उस दिन उसको बनाने न दिए| उसने कहा-हे पति देव! पहले ही पता नहीं किस कुकर्म के बदले यह दशा हुई है| हमें आज मांस नहीं बनाना चाहिए| साधू वैष्णव हैं| हो सकता है कि कोई अच्छा वचन कर जाएं तो हमारे जीवन में कोई सुख का समय आ जाए| सुना है साधू भगवान के भक्त होते हैं|

अजामल-'हे प्रियतमा! बात तो आपकी ठीक है, पर हम क्या खाएं और इनको क्या दें| मेहमान हैं| घर आए अतिथि को भोजन न देना भी तो घोर पाप है|

कलावंती-यह बात तो ठीक है| इनको खाने के लिए क्या दें| हां, कुछ दाने हैं भूने हुए और गुड़ भी है| वह ही दें दे| आप भी मुठ्ठी-मुठ्ठी चबाकर संतोष से रात बिता लें! सुबह जो होगा देखा जाएगा|

अजामल-बात ठीक है| ऐसा ही करो|

दम्पति ने भूने हुए दाने और गुड़ साधुओं को खाने के लिए दिए| अनुरोध किया, 'महाराज! हमारे पास तो यही कुछ है| हम गरीब और पापी हैं| कृपा करो! दया करो! हे महाराज! हमारे लिए भगवान से प्रार्थना करो!

भगवान रूप साधू ने वचन किया-'हे अजामल! त्रिकाल दृष्टि द्वारा हम सब जान गए हैं| आप ब्राह्मण के पुत्र थे, वासना की अग्नि ने आप की बुद्धि सब भस्म कर दी, ठीक है पर जल्दी ही आपका कल्याण होगा| जो आपने अपने पुत्र का नाम 'नारायण' रखा है यह भगवान की प्रेरणा है| इसके साथ प्यार किया करो| नारायण! नारायण! पुकारो| एक दिन अवश्य नारायण आप की पुकार सुन लेंगे|'

ये वचन करके सुबह वह वहां से चले गए| अजामल ने अपने पुत्र को उठा लिया और उससे प्यार करता हुआ कहने लगा-'पुत्र नारायण! आओ बेटा नारायण| रोटी खाओ नारायण! दूध पीओ नारायण!' ऐसी बातें करने लगा| उसकी बातें उसके मन को शांति देने लगी|

कुछ ऐसी प्रभु की लीला हुई, वह जो शिकार मार कर लाता वही बिक जाता| जिससे उसको पैसे मिल जाते इस तरह उसे अन्न खाने को मिलने लगा| उसके दिन अब अच्छे व्यतीत होने लगे| वह झौंपड़ी में रह कर भी सुख महसूस करने लगा|

काल महाबली है| काल की मार से कोई नहीं बचता जो दिखाई देता है, सब नाशवान है सब के काम अधूरे रह जाते हैं जब काल आता है| काल का भारी हाथ सब के सिर के ऊपर रखा जाता है| अजामल का भी काल आ गया| वह बीमार पड़ गया और बिमारी भी उसको कष्ट देने वाली| वह कष्टदायक बीमारी से दुखी होने लगा| एक दिन ऐसा आया जब आंखें बन्द करते ही यमदूत भी नजर आने लगे| नरक की आग जलती हुई दिखाई देने लगी, वह बहुत भयानक रूप में थी, उसकी दशा बहुत डरावनी थी! नरक की झांकी व अंतकाल नजदीक नज़र आया देखकर उसने बहुत ऊंची-ऊंची पुकारा-'नारायण आओ! नारायण आओ!

अजामल पापी ने आवाज़ तो अपने पुत्र को दी परन्तु पुत्र शब्द का इस्तेमाल न किया! सत्य ही उसका कल्याण हो गया जैसे ही उसने 'नारायण' कहा वैसे ही धर्मराज के यमदूत भी पीछे हट गए| अचानक रोशनी हुई| नाद शंख बजे| इधर आत्मा ने शरीर छोड़ा, उधर से फूलों की वर्षा हुई| अजामल की आत्मा स्वर्ग में चली गई| नारायण कहने से पापी का कल्याण हो गया| इस संबंध में चौथे पातशाह का वचन है :-

अजामल प्रीति पुत्र प्रति कीनी करि नाराइण बोलारे ||
मेरे ठाकुर कै मनि भाइ भावणी जम कंकर मारि बिदारे ||

Friday, 8 December 2017

साखी पिंगला की

ॐ साँई राम जी



साखी पिंगला की

अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गऐ हरि कै पासि ||

उपरोक्त तुक में भक्त रविदास जी ने कथन किया है कि अजामल, पिंगला और हाथी जैसे हरि परमात्मा के पास चले गए| हरि परमात्मा सब भक्तों को शरण देता है| जो उसका नाम जपता है; उसको याद करता है प्रभु उसी को अपने चरणों में लगाता है क्योंकि आत्मा और परमात्मा में माया की जुदाई है| माया भेद कर के ही वह परमात्मा से बिछुड़ा है| जब माया का अम्बार दूर हो जाता है तो ज्ञान आ जाता है और खुद ही आत्मा परमात्मा से घुल-मिल जाती है| बाहर क्यों रहते हैं? जुदाई क्यों पैदा होती है? इसका उत्तर है कि उनको ज्ञान प्राप्त नहीं होता| ज्ञान क्यों नहीं होता? क्योंकि उसने गुरु धारण नहीं किया होता| गुरु पर भरोसा न होने के कारण है|

सच्चे सतिगुरु के बिना आल जंजाल माया के चमत्कारों में फंसे रहते हैं| विमुख या समक्ष रहते हैं ऐसे पुरुषों का कभी कल्याण नहीं होता वह विमुख होते हैं| उनका नेकी की ओर ध्यान नहीं होता| जब नेकी, सत्य, धर्म, कर्म, भक्ति की ओर ध्यान नहीं और वह यदि ईश्वर का भय नहीं रखते तब कैसे उनका कल्याण हो सकता है? कभी नहीं होता चाहे कहीं घूमते रहें|


गंगा जमन गोदावरी कुलखेत सिधारे |
मथुरा माइआ अजुधिआ काशी केदारे |
गइआ पिराग सुरसवती गोतमी दुआरे |
जप तप संजम होम जगि सभ देव जुहारे |
अखीं परणै जे भवै तिहु लोइ मझारे |
मूलि न उतरै हतिआ बेमुख गुरदुआरे |

जब तक आत्मा पवित्र न हो, तब तक धर्म, कर्म, पूजा-पाठ और तीर्थ पर जाना लाभदायक नहीं होता| गुरु की शरण में जाएं| पिंगला उसी तरह का जीवन था जिस तरह भाई गुरदास जी फरमाते हैं:-


नारि भतारहुं बाहरी सुखि सेज न चड़ीऐ |
पुत न मंनै मापिआं कमजातीं वड़ीऐ |

पिंगला भरी जवानी में थी, पर एक पति के बिना वह कभी सुख की सेज नहीं सोई| उसके ग्राहक आते थे, वह भी विभिन्न स्वभाव के होते थे| कोई शराबी, कोई भंगी-नशेड़ी, पर उसने तो सब का स्वागत करना था| ऐसी दशा में धर्मप्रिय की नगरी में रहती थी| जब वह बाहर जाती तो गृहस्थ औरतें उसकी तरफ घूर-घूर कर देखतीं, वह सदा उनसे घृणा करती थी| उसके पास अत्यन्त धन होने के बावजूद भी समाज और धार्मिक स्थल पर सम्मान न होता| उसको एक अछूत तथा एक कोढ़ गिना जाता लेकिन मंद कर्मी पुरुष उसको आंखों पर बैठाते|

एक समय वह बाहर घूमने निकली| वह जब राजा की ओर से बनाए सरोवर के पास पहुंची तो वहां एक महात्मा नारी की महानता और पतिव्रता धर्म का उपदेश दे रहा था| सैकड़ों स्त्री-पुरुष एकाग्रचित ध्यान लगा कर उपदेश सुन रहे थे| उनका ध्यान कथा भाव के साथ जुड़ा हुआ था!
महात्मा उपदेश कर रहा था कि नारी का धर्म पति की सेवा करना है, वह भी एकाग्रचित होकर और घर गृहस्थी को चलाना क्योंकि घर गृहस्थी और नारी जगत उत्पति का मूल है| नारी की सूजना इसलिए की गई है| लेकिन यदि नारी एक पति की सेवा नहीं करती एक के भरोसे पर नहीं रहती और पराए पुरुष के पीछे भटकती फिरती है तो वह नारी एक डायन बन जाती है| इसलिए नारी को पतिव्रता रहना चाहिए|

ऐसा उपदेश जब हो रहा था तो पिंगला ने भी सुन लिया, वह कभी मन्दिर, कथा कीर्तन स्थान के पास कभी खड़ी नहीं होती थी पर उस समय उसके मन में आ गया, वह खड़ी हो गई और महात्मा का उपदेश वरदान की तरह हृदय को छू गया| वह खड़ी रही| आगे का उपदेश वरदान की तरह हृदय को छू गया| वह खड़ी रही| आगे उसके पांव न चले| उसको ऐसा महसूस हुआ कि सच्ची बातों का उपदेश उसको दिया जा रहा था| वह उपदेश सुन रही थी|

महात्मा जब उपदेश करके रुके तो उसने आगे बढ़ कर महात्मा के चरणों को छू कर विनम्रता से प्रार्थना की-'महाराज! मैं एक वेश्या हूं, हर रात तन बेचती और मूल्य लेती हूं, नाचती और गाती हूं, मदिरापान भी करती हूं! जो भी पुरुष आता है उससे झूठ बोल कर कहती हूं, 'मैं तुम्हारी हूं| तुम्हें ही प्यार करती हूं| और किसी को प्यार नहीं करती|' होता झूठ है, झूठ के साथ जूठन भी खानी पड़ती है, बताएं ऐसे कुकर्म करने वालों का भी कभी कल्याण हो सकता है?

महात्मा ने पिंगला की बात को ध्यान से सुना| उसकी और देखकर उसके चेहरे और उसकी आंखों और हृदय की बात जानने का विचार किया| उस समय उसको उत्तर दिया -'हां देवी! तेरा भी कल्याण हो सकता है| केवल मन बदलने की जरूरत है| बुरे कामों से निकल कर स्नान करके अच्छे वस्त्र पहनने की आवश्यकता है| ऐसा कर लो तो ईश्वर प्रसन्न होगा| धन पदार्थ तो ईश्वर के हैं| यह लीला है जो होती रहती है| हर एक जीव आत्मा अमलों के कारण ही तो पवित्र है, वह जैसे वातावरण से निकलती है वैसा ही रंग ले लेती है और कोई बात नहीं|'

पिंगला - 'कीचड़ में से कैसे निकलूं, मैं तो दलदल तक फंसी हूं|'

महात्मा - 'यत्न करने की आवश्यकता है| मन पर काबू पा सको तो|

पिंगला - जैसे आप बताएंगे वैसा ही करूंगी| आपको गुरु धारण करती हूं| 'आज्ञा करें|'

यह कह कर पिंगला ने महात्मा के चरण पकड़ लिए|

महात्मा ने उसकी पसीजी आत्मा की ओर देखा और कहा - 'देवी! एक पर्ण करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है|'

पिंगला - 'आज्ञा करें महाराज|'

महात्मा - 'वचन का पालन करोगी?'

पिंगला - 'महाराज! जीवन भर आपकी आज्ञा का पालन करूंगी, मेरा मन कह रहा है|'

महात्मा - 'देख, तेरे जीवन का वातावरण ऐसा है, गृहस्थ धर्म ग्रहण करो| एक पति की पूजा करो| पति प्यार और श्रद्धा से तेरा कल्याण हो जाएगा|'

पिंगला - 'पति मेरा कोई नहीं, विवाह मेरे साथ कौन करेगा? मैं कैसे तपस्या करूंगी?'

महात्मा - 'जो पुरुष तुम्हारे पास पहले आए, उसको पति मान ले और उसकी सेवा करती रहना अन्य किसी के पास तन भेंट मत करना, उसी से तुम्हारी मुक्ति होगी|

पिंगला - 'आप ने मुझे ज्ञान दिया है, मेरे गुरु बने हैं, क्या मैं अपनी सारी दौलत आपको अर्पण कर सकती हूं? सारी दौलत किस काम की|'

महात्मा - 'जो कुछ तेरे पास है, वह अपने पास ही रखो, धन-पूंजी रखो| जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा|'

इस तरह उपदेश लेकर पिंगला अपने घर आ गई| उसको ऐसा लगा जैसे उसका शरीर और दिल-दिमाग हल्का हो गया हो| घर आई तो हर वस्तु उसको पराई और नई-नई लगी| उस शाम को उसने स्नान किया| नए वस्त्र पहने और तैयार होकर बैठ गई| महात्मा की बात पर अमल करना था, जो पुरुष पहले आए, जिस के साथ मेल हो, उसको अपना पति मान ले| उसके बगैर किसी और के नजदीक न जाए|

एक पुरुष आया, वह जवान था और घर से भी अच्छा था| उसके आने पर उसने घर के दरवाजे बंद कर लिए और उसको कहा, 'देखो प्रिय! मैंने फैसला किया है, एक पुरुष के बगैर किसी अन्य के निकट नहीं जाऊंगी, आप मेरा साथ देंगे तो मैं आपकी ही रहूंगी और आप मेरे, ऐसा ही करना होगा|'

'....यदि ऐसा हो जाए तो और क्या चाहिए, मैं तो आपका प्रेमी हूं| जान देने को तैयार हूं|' पुरुष ने उत्तर दिया|

यह बात सुन कर पिंगला खुश हो गई और उसने अपना तन और मन उस पुरुष के हवाले कर दिया| उसके बाद किसी अन्य पुरुष के पास न गई, नाचगान सब कुछ एक पुरुष के लिए हो गया| इस प्रकार कई साल बीत गए| लोग पिंगला की बैठक को भूल गए| और वह एक गृहिणी बन गई, उसकी रूचि बदल गई| उसने मदिरा पान छोड़ दिया| वह धर्म-कर्म की और बढ़ गई| प्यारा पति आता तो उसकी सेवा करती और उसका दिया खाती और किसी के हाथ का खाना ज़हर समझती| कहते हैं इस तरह बारह साल बीत गए| वह एक पुरुष की दासी रही| उसकी भक्ति देखकर लोग हैरान हो गए| उसके प्रेमी ने विवाह न किया और वह मर गया| फिर जो पुरुष पहले आता उसी को पति मानती.... पर उसकी मूल मंशा पूरी न हुई|

एक दिन भगवान विष्णु ने उसकी परीक्षा लेकर उसका कल्याण के लिए मार्ग ढूंढा| उसका धर्म देखने और महात्मा के वचनों पर कितना चली है परीक्षा लेने आए भगवान विष्णु|

शाम हुई तो भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पिंगला की बैठक पर आ गए| पिंगला ने उनका स्वागत किया| चरणों को धोया| हालचाल पूछा और आदर से बिठाया| पहले उनके चरण दबाए| जब उसके मन की इच्छा पूर्ण करने का विचार आया तो वह बीमार हो गया| उसको हैजा हो गया| टट्टियां आने लगी और दसतों का रूप धारण करके और भी हालत बिगड़ गई| पिंगला सेवा करती रही| रात भर जरा भी आराम न किया परन्तु माथे पर बल न आया| एक पतिव्रता स्त्री की तरह खिले माथे सेवा करती रही| सुबह होते ही वह ब्राह्मण मर गया| उसके मरने पर रोने लगी| बाजार वाले हैरान हुए| किसी ने कुछ कहा| पर उसने कोई बात न सुनी| उसने अपने पास से ब्राह्मण की चिता का प्रबन्ध किया| हाथ में सधौरा लेकर साथ ही सती होने के लिए तैयार हो गई| जब लोगों ने रोका तब भी न रुकी| तब भगवान विष्णु ने अपना हाथ छोड़ दिया और वह उस चिता से उठ खड़े हुए| वह विष्णु रूप ब्राह्मण जीवित हो गया| लोग काफी हैरान हुए| पिंगला खुश हो गई| उस समय वह ब्राहमण विष्णु का रूप हो गया| शंखों की धुन अपने आप प्रगट हुई| सभी लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए| विष्णु ने पिंगला को कहा - 'धन्य है देवी! मांग लो जो मांगना है| तेरी भक्ति प्रवान हुई|'

पिंगला भगवान विष्णु के चरणों में झुक गई| उसने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि, 'महाराज! कोई इच्छा नहीं| बस पापिन का कल्याण हो|'

यह सुन कर विष्णु जी बहुत खुश हुए और उन्होंने कहा, 'तथास्तु' तेरी इच्छा पूर्ण होगी| बाकी जीवन उसने भक्ति में गुजारा और अंतकाल वह स्वर्ग में गई|

इस कथा का संक्षेप भाव है कि जो भी मंद कर्मी जब किसी नेक पुरुष, गुरु पीर का उपदेश ग्रहण कर अपना जीवन बदल लेता है, उसका कल्याण होता है| जगत में यश होता है|

Thursday, 7 December 2017

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 21

ॐ सांई राम



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आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है 

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है



श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 21

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श्री. व्ही. एच. ठाकुर, अनंतराव पाटणकर और पंढ़रपुर के वकील की कथाएँ

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इस अध्याय में हेमाडपंत ने श्री विनायक हिश्चन्द्र ठाकुर, बी. ए., श्री. अनंतराव पाटणकर, पुणे निवासी तथा पंढरपुर के एक वकील की कथाओं का वर्णन किया है । ये सब कथाएँ अति मनोरंजक है । यदि इनका साराँश मननपूर्वक ग्रहण कर उन्हें आचरण में लाया जाय तो आध्यात्मिक पंथ पर पाठकगण अवश्य अग्रसर होंगें ।


प्रारम्भ
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यह एक साधारण-सा नियम है कि गत जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरुप ही हमें संतों का स्न्ध्य और उनकी कृपा प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ हेमाडपंत स्वयं अपनी घटना प्रस्तुत करते है । वे अनेक वर्षों तक बम्बई के उपनगर बांद्रा के स्थानीय न्यायाधीश रहे । पीर मौलाना नामक एक मुस्लिम संत भी वहीं निवास करते थे । उनके दर्शनार्थ अनेक हिन्दू, पारसी और अन्य धर्मावलंबी वहाँ जाया करते थे । उनके मुजावर (पुजारी) ने हेमाडपंत से भी उलका दर्शन करने के लिये बहुत आग्रह किया, परन्तु किसी न किसी कारण वश उनकी भेंट उनसे न हो सकी । अनेक वर्षों के उपरान्त जब उनका शुभ काल आया, तब वे शिरडी पहुँचे और बाबा के दरबार में जाकर स्थायी रुप से सम्मिलित हो गए । भाग्यहीनों को संतसमागम की प्राप्ति कैसे हो सकती है । केवल वे ही सौभाग्यशाली हे, जिन्हें ऐसा अवसर प्राप्त हो ।


संतों द्घारा लोकशिक्षा
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संतों द्घारा लोकशिक्षा का कार्य चिरकाल से ही इस विश्व में संपादित होता आया है । अनेकों संत भिन्न-भिन्न स्थानों पर किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिये स्वयं प्रगट होते है । यघपि उनका कार्यस्थल भिन्न होता है, परन्तु वे सब पूर्णतः एक ही है । वे सब उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की संचालनशक्ति के अंतर्गत एक ही लहर में कार्य करते है । उन्हें प्रत्येक के कार्य का परस्पर ज्ञान रहता है और आवश्यकतानुसार परस्पर कमी की पूर्ति करते है, जो निम्नलिखित घटना द्घारा स्पष्ट है ।

श्री. ठाकुर
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श्री. व्ही. एच. ठाकुर, बी. ए. रेव्हेन्यू विभाग में एक कर्मचारी थे । वे एक समय भूमिमापक दल के साथ कार्य करते हुए बेलगाँव के समीप वडगाँव नामक ग्राम में पहुँचे । वहाँ उन्होंने एक कानड़ी संत पुरुष (आप्पा) के दर्शन कर उनकी चरण वन्दना की । वे अपने भक्तों को निश्चलदासकृत विचार-सागर नामक ग्रंथ (जो वेदान्त के विषय में है) का भावार्थ समझा रहे थे । जब श्री. ठाकुर उनसे विदाई लेने लगे तो उन्होंने कहा, तुम्हें इस ग्रंथ का अध्ययन अवश्य करना चाहिये और ऐसा करने से तुम्हारी इच्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी तथा जब कार्य करते-करते कालान्तर में तुम उत्तर दिशा में जाओगे तो सौभाग्यवश तुम्हारी एक महान् संत से भेंट होगी, जो मार्ग-पर्दर्शन कर तुम्हारे हृदय को शांति और सुख प्रदान करेंगे । बाद में उनका स्थानांतरण जुन्नर को हो गया, जहाँ कि नाणेघाट पार करके जाना पड़ता था । यह घाट अधिक गहरा और पार करने में कठिन था । इसलिये उन्हें भैंसे की सवारी कर घाट पार करना पड़ा, जो उन्हें अधिक असुविधाजनक तथा कष्टकर प्रतीत हुआ । इसके पश्चात् ही उनका स्थानांतरण कल्याण में एक उच्च पद पर हो गया और वहाँ उनका नानासाहेब चाँदोरकर से परिचय हो गया । उनके द्घारा उन्हें श्री साईबाबा के संबंध में बहुत कुछ ज्ञात हुआ और उन्हें उनके दर्शन की तीव्र उत्कण्ठा हुई । दूसरे दिन ही नानासाहेब शिरडी को प्रस्थान कर रहे थे । उन्होंने श्री. ठाकुर से भी अपने साथ चलने का आग्रह किया । ठाणे के दीवानी-न्यायालय में एक मुकदमे के संबंध में उनकी उपस्थिति आवश्यक होने के कारण वे उनके साथ न जा सके । इस कारण नानासाहेब अकेले ही रवाना हो गये । ठाणे पहुँचने पर मुकदमे की तारीख आगे के लिए बढ़ गई । इसलिए उन्हें ज्ञात हुआ कि नानासाहेब पिछले दिन ही यहाँ से चले गये है । वे अपने कुछ मित्रों के साथ, जो उन्हें वहीं मिल गये थे, श्री साईबाबा के दर्शन को गए । उन्होंने बाबा के दर्शन किये और उनके चरणकमलों की आराधना कर अत्यन्त हर्षित हुए । उन्हें रोमांच हो आया और उनकी आँखों से अश्रुधाराएँ प्रवाहित होने लगी । त्रिकालदर्शी बाबा ने उनसे कहा – इस स्थान का मार्ग इतना सुमा नही, जितना कि कानड़ी संत अप्पा के उपदेश या नाणेघाट पर भैंसे की सवारी थी । आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिये तुम्हें घोर परिश्रम करना पडेगा, क्योंकि वह अत्यन्त कठिन पथ है । जब श्री. ठाकुर ने हेतुगर्भ शब्द सुने, जिनका अर्थ उनके अतिरिक्त और कोई न जानता था तो उनके हर्ष का पारावार न रहा और उन्हें कानड़ी संत के वचनों की स्मृति हो आई । तब उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बाबा के चरणों पर अपना मस्तक रखा और उनसे प्रार्थना की कि प्रभु, मुझ पर कृपा करो और इस अनाथ को अपने चरण कमलों की शीतलछाया में स्थान दो । तब बाबा बोले, जो कुछ अप्पा ने कहा, वह सत्य था । उसका अभ्यास कर उसके अनुसार ही तुम्हें आचरण करना चाहिये । व्यर्थ बैठने से कुछ लाभ न होगा । जो कुछ तुम पठन करते हो, उसको आचरण में भी लाओ, अन्यथा उसका उपयोग ही क्या । गुरु कृपा के बिना ग्रंथावलोकन तथा आत्मानुभूति निरर्थक ही है । श्री. ठाकुर ने अभी तक केवल विचार सागर ग्रन्थ में सैद्घांतिक प्रकरण ही पढ़ा था, परन्तु उसकी प्रत्यक्ष व्यवहार प्रणाली तो उन्हें शिरडी में ही ज्ञात हुई । एक दूसरी कथा भी इस सत्य का और अधिक सशक्त प्रमाण है ।

श्री. अनंतराव पाटणकर
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पूना के एक महाशय, श्री. अनंतराव पाटणकर श्री साईबाबा के दर्शनों के इच्छुक थे । उन्होंने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किये । दर्शनों से उनके नेत्र शीतल हो गये और वे अति प्रसन्न हुए । उन्होंने बाबा के श्री चरण छुए और यथायोग्य पूजन करने के उपरान्त बोले, मैंने बहुत कुछ पठन किया । वेद, वेदान्त और उपनिषदों का भी अध्ययन किया तथा अन्य पुराण भी श्रवण किये, फिर भी मुझे शान्ति न मिल सकी । इसलिये मेरा पठन व्यर्थ ही सिदृ हुआ । एक निरा अज्ञानी भक्त मुझसे कहीं श्रेष्ठ है । जब तक मन को शांति नहीं मिलती, तब तक ग्रन्थावलोकन व्यर्थ ही है । मैंने ऐसा सुना है कि आप केवल अपनी दृष्टि मात्र से और विनोदपूर्ण वचनों द्घारा दूसरों के मन को सरलतापूर्वक शान्ति प्रदान कर देते है । यही सुनकर मैं भी यहाँ आया हूँ । कृपा कर मुझ दास को भी आर्शीवाद दीजिये ।

ततब बाबा ने निम्नलिखित कथा कही - घोड़ी की लीद के नो गोले (नवधा भक्ति) ...

एक समय एक सौदागर यहाँ आया । उसके सम्मुख ही एक घोड़ी ने लीद की । जिज्ञासु सौदागर ने अपनी धोती का एक छोर बिछाकर उसमें लीद के नौ गोले रख लिये और इस प्रकार उसके चित्त को शांति पत्राप्त हुई । श्री. पाटणकर इस कथा का कुछ भी अर्थ न समझ सके । इसलिये उन्होंने श्री. गणेश दामोदर उपनाम दादा केलकर से अर्थ समझाने की प्रार्थना की और पूछा कि बाबा के कहने का अभिप्राय क्या है । वे बोले कि जो कुछ बाबा कहते है, उसे मैं स्वयं भी अच्छी तरह नहीं समझ सकता, परंतु उनकी प्रेरणा से ही मैं जो कुछ समझ सका हूँ, वह तुम से कहता हूँ । घोड़ी है ईश-कृपा, और नौ एकत्रित गोले है नवविधा भक्ति-यथा –

1. श्रवण
2. कीर्तन
3. नामस्मरण
4. पादसेवन
5. अर्चन
6. वन्दन
7. दास्य या दासता
8. सख्यता और
9. आत्मनिवेदन ।

ये भक्ति के नौ प्रकार है । इनमें से यदि एक को भी सत्यता से कार्यरुप में लाया जाय तो भगववान श्रीहरि अति प्रसन्न होकर भक्त के घर प्रगट हो जायेंगे । समस्त साधनाये अर्थात् जप, तप, योगाभ्यास तथा वेदों के पठन-पाठन में जब तक भक्ति का समपुट न हो, बिल्कुल शुष्क ही है । वेदज्ञानी या व्रहमज्ञानी की कीर्ति भक्तिभाव के अभाव में निरर्थक है । आवश्यकता है तो केवल पूर्ण भक्ति की । अपने को भी उसी सौदागर के समान ही जानकर और व्यग्रता तथा उत्सुकतापूर्वक सत्य की खोज कर नौ प्रकार की भक्ति को प्राप्त करो । तब कहीं तुम्हें दृढ़ता तथा मानसिक शांति प्राप्त होगी । दूसरे दिन जब श्री. पाटणकर बाबा को प्रणाम करने गये तो बाबा ने पूछा कि क्या तुमने लीद के नौ गोले एकत्रित किये । उन्होंने कहा कि मैं अनाश्रित हूँ । आपकी कृपा के बिना उन्हें सरलतापूर्वक एकत्रित करना संभव नहीं है । बाबा ने उन्हें आर्शीवाद देकर सांत्वना दी कि तुम्हें सुख और शांति प्राप्त हो जायेगी, जिसे सुनकर श्री. पाटणकर के हर्षे का पारावार न रहा ।

पंढ़रपुर के वकील
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भक्तों के दोष दूर कर, उन्हें उचित पथ पर ला देने की बाबा की त्रिकालज्ञता की एक छोटी-सी कथ का वर्णन कर इस अध्याय को समाप्त करेंगे । एक समय पंढरपुर से एक वकील शिरडी आये । उन्होंने बाबा के दर्शन कर उन्हं प्रणाम किया तथा कुछ दक्षिणा भेंट देकर एक कोने में बैठ वार्तालाप सुनने लगे । बाबा उनकी ओर देख कर कहने लगे कि लोग कितने धूर्त है, जो यहाँ आकर चरणों पर गिरते और दक्षिणा देते है, परंतु भीतर से पीठ पीछे गालियाँ देते रहते है । कितने आश्चर्य की बात है न । यह पगड़ी वकील के सिर पर ठीक बैठी और उन्हें उसे पहननी पड़ी । कोई भी इन शब्दों का अर्थ न समझ सका । परन्तु वकील साहब इसका गूढ़ार्थ समझ गये, फिर भी वे नतशिर बैठे ही रहे । वाड़े को लौटकर वकील साहब ने काकासाहेब दीक्षित को बतलाया कि बाबा ने जो कुछ उदाहरण दिया और जो मेरी ही ओर लक्ष्य कर कहा गया था, वह सत्य है । वह केवल चेतावनी ही थी कि मुझे किसी की निन्दा न करनी चाहिए । एक समय जब उपन्यायाधीश श्री. नूलकर स्वास्थ्य लाभ करने के लिये पंढरपुर से शिरडी आकर ठहरे तो बताररुम में उनके संबंध में चर्चा हो रही थी । विवाद का विषय था कि जीस व्याधि से उपन्यायाधीश अस्वस्थ है, क्या बिना औषधि सेवन किये केवल साईबाबा की शरण में जाने से ही उससे छुटकारा पाना सम्भव है । और क्या श्री. नूलकर सदृश एक शिक्षित व्यक्ति को इस मार्ग का अवलम्बन करना उचित है । उस समय नूलकर का और साथ ही श्री साईबाबा का भी बहुत उपहास किया गया । मैंने भी इस आलोचना में हाथ बँटाया था । श्री साईबाबा ने मेरे उसी दूषित आचरण पर प्रकाश डाला है । यह मेरे लिये उपहास नही, वरन् एक उपकार है, जो केवल परामर्श है कि मुझे किसी की निनदा न करनी चाहिए और न ही दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना चाहिए । शिरडी और पंढरपुर में लगभग 300 मील का अन्तर है । फिर भी बाबा ने अपनी सर्वज्ञता द्घारा जान लिया कि बाररुम में क्या चल रहा था । मार्ग में आने वाली नदियाँ, जंगल और पहाड़ उनकी सर्वज्ञता के लिये रोड़ा न थे । वे सबके हृदय की गुहृ बात जान लेते थे और उनसे कुछ छिपा न था । समीपस्थ या दूरस्थ प्रत्येक वस्तु उन्हें दिन के प्रकाश के समान जाज्वल्यमान थी तथा उनकी सर्वव्यापक दृष्टि से ओझल न थी । इस घटना से वकीलसाहब को शिक्षा मिलीकि कभी किसी का छिद्रान्वेषण एवं निंदा नहीं करनी चाहिए । यह कथा केवल वकीलसाहव को ही नहीं, वरन सबको शिक्षाप्रद है । श्री साईबाबा की महानता कोई न आँक सका और न ही उनकी अदभुत लीलाओं का अंत ही पा सका । उनकी जीवनी भी तदनुरुप ही है, क्योंकि वे परब्रहास्वरुप है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 6 December 2017

साखी कुबिजा मालिन की

ॐ साँई राम जी



साखी कुबिजा मालिन की

प्रेम भक्ति के संसार में कुबिजा का नाम बड़ा आदर-सत्कार से लिया जाता है| कुबिजा मालिन के प्यार के गीत बनाकर कविजन गुनगुनाते हैं| गुरुबाणी में भी यह आता है, 'कुबजा ओधरी अंगसुट धार' (बसंतु राग) आओ, श्रद्धालु और भक्तो जनो! आज आपको कुबिजा की कथा सुनाते हैं| श्रद्धा और प्यार से जो स्त्री-पुरुष यह कथा श्रवण करेगा, उसके हृदय और आत्मा में प्यार उमड़ आएगा|

कुबिजा एक दासी थी| वह राजा कंस के राजमहल के बगीचे में मालिन का कार्य करती थी| सारे लोग उसको कुबिजा मालिन कह कर बुलाते थे| उसकी आयु आयु अभी अल्प थी और वह अल्पायु से ही अत्यन्त सुन्दर थी| लेकिन ईश्वर की ऐसी लीला कि वह कमर से कुबड़ी थी| वह कुबड़ी होकर चलती थी, तभी उसका नाम कुबिजा पड़ गया| उसकी बुद्धिमानी और सुन्दरता की हर कोई प्रशंसा करता था लेकिन जब उसके कुबड़ेपन को देखता तो ईश्वर को कोसता कि ऐसी सुन्दरता देकर कुब क्यों प्रदान किया| लेकिन ईश्वर की लीला को कोई भी नहीं जानता| वह खेल था जो समय के साथ होना था|

युवा होकर जब भगवान कृष्ण जी मथुरा पधारे तो एक दिन कृष्ण जी और कुबिजा का मेल हो गया| वह फूल और घिसा हुआ चंदन लेकर राजा कंस की ओर जा रही थी, उसने जैसे ही कृष्ण जी के दर्शन किए तो मानो उसके पैरों में जंजीर पड़ गई हो| उसके हृदय में मीठी-सी कंपकंपी हुई| उसके मोटे नर्गिस नयन मोहित होकर चुंधिया गए| वह उनको देखती रही| उसने एक फूल माला श्री कृष्ण जी के गले में डाल दी और साथ ही चन्दन का तिलक लगा दिया| तिलक लगाते समय यह याद न रहा कि तिलक राजा कंस को लगाना था| यदि राजा कंस को इस बारे में पता चला तो वह मौत के घाट उतरवा देगा| कंस बड़ा दुष्ट था अत्याचारी राजा था| परन्तु कुबिजा ने प्रभु को चन्दन और तिलक लगा ही दिया|

भगवान श्री कृष्ण ने जब उसका यह अनुराग देखा तो आप दयालु-कृपालु हो गए| उन्होंने कुबिजा मालिन की ओर निगाह भर कर देखा| प्रभु ने दया में आकर उसके कुबड़ापन को दूर करने के लिए विचार किया| आप विष्णु अवतार महांकाल शक्तियों के स्वामी थे| मालिन के एक पैर पर अंगूठा अपने चरण का रखकर कंधे से पकड़कर ऐसा खींचा कि वह एकदम सीधी हो गई| उसका कुबड़ापन उसी पल दूर हो गया| वह तो मानो मूर्छित-सी हो गई| भगवान कृष्ण की इस कृपा का यश करती हुई गीत गाने लगी और श्री कृष्ण जी के चरणों पर गिरकर उनको चूमने लगी| उसने श्रद्धा से हाथ जोड़कर श्री कृष्ण जी से विनती की-हे प्रभु! दासी को अपने चरणों में रखें| आप तो परमात्मा हैं, आप सृष्टि के पालक हैं|

श्री कृष्ण जी ने प्रसन्न होकर कहा - 'हे मालिन! धैर्य रखो| समय आएगा तो तुम्हारा प्रेम प्रवान होगा| अभी शीघ्र जाओ और कंस को तिलक लगाने तुम जा रही थी, सामग्री लेकर उसे तिलक लगाओ|

यह कहकर भगवान आगे चले गए| मालिन कंस के दरबार में पहुंची लेकिन उसका मन प्रभु के चरणों में ही लिवलीन था| उसको सीधी सुन्दर खड़ी देखकर हर एक ने इस बारे पूछना चाहा लेकिन उसने कुबड़ेपन को ईश्वर द्वारा दूर करने के बारे में किसी को कुछ न बताया|
जब कंस के अत्याचारों तथा पापों का अंत करके भगवान श्री कृष्ण मथुरा, गोकुल और वृंदावन के राजा बन गए तो उन्होंने कुबिजा को तारा दर्शन देकर कृतार्थ किया| यह है मालिन और भगवान श्री कृष्ण जी की कथा, जो श्रद्धा प्रेम से सुनेगा वह भवसागर से पार हो जाएगा|
ईश्वर कल्याण तथा प्रेम प्रदान करें|


Tuesday, 5 December 2017

भक्त विदुर

ॐ साँई राम जी



भक्त विदुर


आइआ सुणिआ बिदर दे बोले दुरजोधन होइ रुखा |
घरि असाडे छडि के गोले दे घरि जाहि कि सुखा |
भीखम द्रोणाकरण तजि सभा सींगार भले मानुखा |
झुग्गी जाई वलाइओनु सभनां दे जीअ अंदर धुखा |
हस बोले भगवान जी सुणिहो राजा होई सनमुखा |
तेरे भाउ न दिसई मेरे नाहीं अपदा दुखा |
भाउ जिवेहा बिदर दे होरी दे चिति चाऊ न चुखा |
गोबिंद भाउ भगति दा भुखा |

युगों-युगों से यह रीत चली आ रही है कि अहंकार और लालच की सदा दया, धर्म और प्यार से टक्कर रही है| अहंकारी और लालची पुरुष की सेवा, उसकी अयोग्य आज्ञा का पालन वह करता है, जिसे आवश्यकता हो 'गौं भुनावे जौं|' लेकिन जिसे कोई दुःख, लालच, अहंकार, लोभ नहीं, वह कदापि भी अहंकारी मनुष्य की परवाह नहीं करता| ऐसी ही कथा भक्त विदुर और श्री कृष्ण जी की है| श्री कृष्ण जी सदा प्रेम और श्रद्धा के प्यासे रहे हैं| उनको राज पाठ, शान-शौकत आदि की कभी आवश्यकता नहीं थी| प्रभु के पास सब कुछ अपरंपार है|

जहां वह धरती मथुरा-वृंदावन के राजा थे, वहां प्रेम, श्रद्धा, भक्ति तथा दिलों के भी राजा थे|

भाई गुरदास जी ने इस बारे सुन्दर कथा बयान की है|

एक दिन मुरली मनोहर श्री कृष्ण जी दुर्योधन के राज्य में पधारे वह दुर्योधन के शीश महलों तथा दरबारियों-सेनापतियों के शाही ठाठ-बाठ वाले महलों को छोड़कर एक दासी पुत्र विदुर की झौंपड़ी में रात को जाकर ठहरे| उस निर्धन के पास एक चटाई ही बैठने के लिए थी और खाने के लिए केवल अलूना सरसों का साग उसने रखा हुआ था| वह भी हांडी में पक रहा था| भगवान श्री कृष्ण विदुर की कुटिया में पहुंच गए| श्री कृष्ण के चरण स्पर्श से उसकी कुटिया में उजाला हो गया| उसके भाग्य जाग गए| उसने प्रभु के चरण धोकर चरणामृत लिया और सारी रात प्रभु की खुले मन से सेवा करता रहा| प्रभु के प्रवचन सुनकर वह मुग्ध हो गया, जिसकी भक्ति करता आ रहा था, दर्शन के लिए तड़पता था, वह प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे आनंदित करते रहे| विदुर का साग उन्होंने बड़े चाव से खाया| ऐसे चखा जैसे छत्तीस प्रकार के भोजन खाते हैं| विदुर को भी नया ही स्वाद आया| उसका मन तृप्त हो गया| वह एक तरह से मुक्त हो गया| उसका जीवन इस भवसागर से पार हो गया| वह एक दासी पुत्र था| अहंकारी दुर्योधन तथा उसके भाई और दरबारी विदुर को अच्छा नहीं समझते थे| उनको अपने राज का अहंकार था|

भक्त विदुर के जन्म की कथा इस प्रकार है| विदुर दुर्योधन का चाचा लगता था| धृतराष्ट्र, पांडव और विदुर तीनों भाई ऋषि व्यास के पुत्र थे| उनके जन्म की कथा इस प्रकार महाभारत में वर्णन है|

रानी सत्यवती के तीन पुत्र थे| व्यास, चित्रांगाद और विचित्रवीर्य| व्यास के अलावा दोनों पुत्र शादीशुदा थे और उनकी रानियां काफी सुन्दर रूपवती थीं| लेकिन संयोग से दोनों ही शीघ्र मर गए| उनकी दोनों रानियां अम्बा और अम्बिका विधवा हो गईं| वह सुन्दर तथा रूपवती सन्तानहीन थीं| राजसिंघासन तथा वंश चलाने के लिए संतान की आवश्यकता थी|

एक दिन रानी सत्यवती ने अपनी दोनों वधुओं को बैठा कर समझाया कि हस्तिनापुर के राजसिंघासन हेतु वह उसके बड़े पुत्र व्यास से सन्तान प्राप्त कर ले| लेकिन व्यास शक्ल सूरत से कुरुप था इसलिए दोनों रानियां उससे सन्तान प्राप्त नहीं करना चाहती थीं| लेकिन रानी सत्यवती के अधिक विवश करने पर दोनों रानियों अम्बा और अम्बिका ने एक-एक पुत्र प्राप्त किया| अम्बा का पुत्र धृतराष्ट्र था जो जन्म से ही अन्धा था और अम्बिका के गर्भ से पांडव का जन्म हुआ|

रानी अम्बिका व्यास की सूरत से घृणा करती थी| जब रानी सत्यवती ने उसे और पुत्र प्राप्त करने के लिए कहा तो अम्बिका ने बड़ी चालाकी से स्वयं जाने की जगह व्यास के पास अपनी दासी को भेज दिया|

उस दासी के पेट से जिस बच्चे ने जन्म लिया, उसका नाम विदुर रखा गया| दासी पुत्र होने के कारण विदुर का राजमहल में सत्कार कम था|

पांडव बड़ा राजपुत्र होने के कारण राजसिंघासन पर विराजमान हुआ| लेकिन तीर्थ यात्रा करने गया पांडव एक ऋषि के श्राप से शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गया| उसकी मृत्यु के बाद जो राज विदुर को मिलना चाहिए था, दासी पुत्र होने के कारण उसे न मिल सका| राजसिंघासन पर धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा घोषित करके विराजमान किया|

इस प्रकार विदुर नगर से बाहर अपनी पत्नी के साथ एक छोटी-सी कुटिया में रहने लग गया| राज की ओर से इतनी घृणा हो गई कि वह राज राजकोष से कोई धन नहीं लेता था| अपने परिश्रम द्वारा ही निर्वाह करता और धरती पर ही सोता| उसका मन प्रभु भक्ति में सदा लिवलीन रहता, जिससे उसकी भक्ति पर प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण उसके घर रात रहे|

भाई गुरदास जी फरमाते हैं कि दुर्योधन को जब इस बारे पता लगा कि यादव वंश मथुरा के राजा श्री कृष्ण उसके महल में रात रहने की बजाय उनके चाचा दासी पुत्र विदुर के घर में रहे हैं और स्वादिष्ट पकवानों की जगह अलूना साग खाया है तो वह भगवान कृष्ण के पास गया और उसने कहा - 'हे कृष्ण! आप हमारे राजभवन में रहने की जगह दासी पुत्र की झौंपड़ी में क्यों ठहरे हैं| यदि मेरे पास नहीं रहना था तो मेरी सभा के श्रृंगार भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा कर्ण आदि के पास रुक जाते| उनके राजभवनो में जाकर निवास कर लेते| हमें यह बहुत बुरा लगा है कि आपने एक दासी पुत्र के घर कुटिया में जाकर रात बिताई| हमारे साथ क्या वैर-विरोध हुआ है?

दुर्योधन की यह बात सुनकर भगवान कृष्ण जी हंस पड़े और उसकी तरफ देखते हुए कहने लगे-हे दुर्योधन! विदुर की झौंपड़ी तो अति पवित्र है| विदुर राजाओं का राजा है, क्योंकि उसकी आत्मा प्रेम भक्ति के रस में डूबी हुई है| ईश्वर प्रेम देखता है लेकिन दूसरी ओर आपके महलों में प्रेम भक्ति का वास नहीं, आपके यहां अहंकार, लोभ, राज की भूख है, इसलिए मुझे विदुर का प्रेम खींच कर ले गया| यह भी बात है कि मुझे न कोई विपदा पड़ी है तथा न कोई दुःख है जो मैं आप का सहारा लूंगा| एक बे-गरज आदमी को क्या जरूरत है कि राजाओं के महलों में जाकर उनकी खुशामद करे? जी विदुर के घर चाव, श्रद्धा तथा प्यार की भावना है वह आपके पास नहीं और मेरा हृदय प्यार का चाहवान है, क्योंकि पारब्रह्म परमेश्वर और जीव के बीच केवल एक प्यार का संबंध है|

कबीर जी के मुखारबिंद श्री कृष्ण जी ने कहा-हे राजन! बताओ कौन आपके घर में आएगा, क्योंकि आपके घर प्रेम एवं श्रद्धा का निवास नहीं| जैसा विदुर के घर प्रेम है वह मुझे अच्छा लगता है|आप तो अपनी उच्च पदवी राजसिंघासन को देखकर भ्रम का शिकार हुए हैं और परमात्मा की महाकाल शक्ति को भुला बैठे हैं क्योंकि आपको परमेश्वर का ज्ञान नहीं| सिर्फ राज अभिमान है| इसलिए विदुर आप से बहुत बड़ा है| आपके राजमहल का दूध एवं विदुर के घर का जल मैं एक समान समझता हूं, जो मैंने उसके घर सरसों का साग खाया है वह आपकी खीर से अच्छा है और परमेश्वर के गुण गाते हुए सारी रात अच्छी बीती| मुझे बड़ा आनंद आया| यदि आपके पास निवास करता तो राजा की निंदा और ईर्ष्या आदि सुनने थे| अब तो ठाकुर का गुण गाते हुए रात अच्छी व्यतीत हुई तथा ठाकुर के लिए छोटे-बड़े सब जीव एक समान हैं| ऐसा उपदेश वाला उत्तर भगवान कृष्ण जी ने दिया| इस संबंध में मारू राग में कबीर जी फरमाते हैं:

राजन कऊनु तुमारै आवै || 
ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहुगरीबु मोहि भावै ||१|| रहाउ ||
हसती देखि भरम ते भूला स्रीभगवान न जानिआ || 
तुमरो दूध बिदर को पान्हो अंम्रितु करि मैमानिआ ||१|| 
खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनिबिहानी || 
कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ||



इस कथा का भावार्थ यह है कि प्रभु से प्रेम करने वाले भक्तों से प्रभु भी उतना ही अटूट प्रेम करता है और राज अभिमान की जगह प्रेम-भक्ति का दर्जा श्रेष्ठ है|

Monday, 4 December 2017

मेरे साँई धारावाहिक

आज आप सभी से एक अनूठी अपील कर रहा हूँ।

सभी साँई भक्तों से अनुरोध हैं कि कृपया सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक मेरे साँई की समय अवधि बढ़ाने और धारावाहिक के समय में बदलाव कर उसे प्राइम टाइम पर प्रसारित करने के लिए दबाव बनाने की आवश्यकता पड़ रही हैं।

आप चिठ्ठी के द्वारा 👇इस पते पर:
Sony Pictures Networks India Pvt. Ltd
3rd Floor, Interface Blg No. 7,
Off Malad Link Road, Malad (W),
Mumbai - 400 064
Tel: 91-22-67081111
Fax: 91-22-66434748

या फिर ई-मेल से 👇 इस पते पर
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या फेसबुक के पेज पर मैसेज के लिए इस👇लिंक पर संदेश भेज कर

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या फिर इस👇लिंक पर संदेश भेज कर

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आप सभी से अनुरोध है कि किसी ना किसी माध्यम से इस कार्य को सम्पूर्ण करने में एकजुट होकर साथ चलें।

आभार
मेरे साँई

राजा हरिचन्द

ॐ साँई राम जी



राजा हरिचन्द

सुख राजे हरी चंद घर नार सु तारा लोचन रानी |
साध संगति मिलि गांवदे रातीं जाइ सुणै गुरबाणी |
पिछों राजा जागिआ अधी रात निखंड विहाणी |
राणी दिस न आवई मन विच वरत गई हैरानी |
होरतु राती उठ कै चलिआ पिछै तरल जुआणी |
रानी पाहुती संगतीं राजे खड़ी खड़ाऊं निसाणी |
साध संगति आराधिआ जोड़ी जुड़ी खड़ाऊं पुराणी |
राजे डिठा चलित इहु एह खड़ाव है चोज विडाणी |
साध संगति विटहु कुरबाणी |९|

एक हरिचन्द नाम का राजा था| उसकी रानी का नाम तारा रानी था| रानी को बचपन से ही सद् पुरुषों के वचन सुनने की लगन थी| छोटे-से राज्य की धार्मिक विचारों वाली रानी विवाह के पश्चात भी पूजा पाठ में लगी रहती थी| एक दिन राज भवन के निकट एक भजन मण्डली आ गई, वह हरि कीर्तन करने लगी| सारी रात ही कीर्तन होता रहता| रानी को जब पता चला तो वह भी उस कीर्तन में जाने लगी| अब यह उसका नित्य नियम था| परमात्मा का नाम ही उसके जीवन का आसरा था| वह बिना किसी भय के इस नेक रास्ते पर जाया करती थी|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार एक दिन तारा रानी जब कीर्तन सुनने गई तो बाद में राजा जाग गया| राजा धर्मी नहीं था इसलिए रानी का भी उसे कीर्तन में जाना अच्छा नहीं लगता था| वह सदा अपने राज कार्य में जुटा रहता तथा धर्म-कर्म की ओर ध्यान देने के स्थान पर रंगरलियां मनाने में लगा रहता| ऐसे पुरुष प्राय: शकी स्वभाव के होते हैं| राजा हमेशा अपनी रानी पर शक करता रहता था| रानी जितनी नेक थी उतनी ही रूपवंती भी थी| परमात्मा ने उसे सभी सुख दिए थे, वह शांति से दिन काट रही थी|

जब राजा जागा तो उसने देखा कि रानी की सेज खाली है| वह कहां गई? राजा के मन में हैरानी हुई| उसने उठ कर देखा पर रानी उसे कहीं भी न मिली| राज भवन के पहरेदारों से पूछा तो उन्होंने भी कुछ न बताया, क्योंकि जब रानी जाती थी तो उस समय पहरेदारों को नींद आ जाया करती थी| वह रानी को जाते हुए नहीं देख पाते थे| यह सब भगवान की ही लीला थी|

जब रानी वापिस आ गई तो राजा चुप ही रहा| उसने रानी को कुछ न पूछा| पर अगली रात को उसे नींद न आई| वह जागता रहा और उसने नजर रखी कि कब रानी उठ कर जाती है लेकिन रानी अपने नित्य नियम अनुसार सो गई| जब अमृत के समय कीर्तन का समय आया, आधी रात बीत गई तो रानी उठी| स्नान किया, साधारण भक्ति भाव वाले वस्त्र पहने और कीर्तन में चल पड़ी|

राजा वास्तव में सोया नहीं था| वह तो ऐसे ही आंखें बंद करके लेटा था| जब तारा रानी चली तो राजा ने उसका पीछा किया| रानी कीर्तन में जा बैठी, वहां पर हरि कीर्तन हो रहा था| वहां पर सब भक्त कीर्तन में अन्तर्ध्यान हुए विराजमान थे| परम शांति और प्यार का वातावरण था|
राजा रानी का पीछा करते-करते कीर्तन में पहुंच गया| वह वहां पर खड़ा पहले तो कुछ देर सोचता रहा, फिर रानी की एक खड़ाऊं उठा कर अपने राज भवन में आ गया| राज भवन आकर आराम से अपनी सेज पर सो गया| उसको दीन दुनिया का कोई ख्याल नहीं था, वह तो राज-काज, रंग-राग और माया का पुतला था| उस दिन वह सोते हुए कई स्वपन देखता रहा|

कीर्तन समाप्त हुआ तथा भोग पड़ गया| जब रानी बाहर आ कर अपनी खड़ाऊं पहनने लगी तो एक खड़ाऊं गायब थी| एक खड़ाऊं को देखकर रानी कुछ हैरान हुई कि यह कैसे हो गया? एक खड़ाऊं किसने चुरा ली है| उस समय सत्संगियों को भी पता चल गया| संगत ने अरदास की कि है पारब्रह्म! तुम्हारा यश गान करते हुए रानी की खड़ाऊं का चले जाना भय का कारण है| तुम्हारा यश किस तरह प्रगट होगा? कोई चमत्कार दिखाओ, रानी ने राज भवन जाना है|

संगत ने ऐसी अरदास की कि उसी समय खड़ाऊं के साथ वही जो पुरानी खड़ाऊं थी, आ कर जुड़ गई| रानी तारा ने खड़ाऊं के साथ वही जोड़ी पहनी और राज भवन में आ गई| जब वह अपने कक्ष में गई तो राजा ने पूछा, 'रानी! आप की खड़ाऊं कहां है?'

हे नाथ! मेरी खड़ाऊं मेरे पैरों में है| क्या बात है जो आज आप ने यह पूछने को कष्ट किया|' तारा रानी ने उत्तर दिया|

'कहां है? राजा ने फिर पूछा|'

'दासी के पैरों में|'

राजा हरिचन्द ने देखा दोनों खड़ाऊं रानी के पैरों में थी एक जैसी थी, एक जैसी ही घिसी हुई| राजा को हैरानी हुई और उसने जल्दी से उठा कर लाई हुई खड़ाऊं देखनी चाही, पर वह खड़ाऊं वहां नहीं थी| इस तरह के चमत्कार से राजा बड़ा हैरान हुआ| रानी सारी बात समझ गई कि राजा बाद में जाग गया होगा और शक पड़ने पर मेरे पीछे लग गया होगा| पर सत्संग के कारण मेरी लाज रह गई| पारब्रह्म परमेश्वर बड़ा दयालु और लीला करने वाला है| कोई भी उसका पारावार नहीं ले सकता| तब रानी ने स्पष्ट तौर पर राजा से पूछा, हे नाथ! अब तो आपको विश्वास हो गया कि मैं आधी रात को उठ कर कहां जाती हूं| मैं परमात्मा की भक्ति करती हूं| भक्ति ही मेरे जीवन का उद्देश्य है| इस मायावादी जगत में और है भी क्या? कितना अच्छा हो अगर आप भी वहां सत्संग में जाया करें| सत्संग में बैठ कर थोड़ा-सा तन मन को शांत कर लिया करो, राज-काज तो होते ही रहते हैं|




राजा हरिचन्द ने तारा रानी से क्षमा मांगी तथा उसे कीर्तन में जाने की आज्ञा दे दी| वह स्वयं भी भक्ति मार्ग पर चल पड़ा|

Sunday, 3 December 2017

सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र जी

ॐ साँई राम जी




सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र जी

तिनी हरी चंदि प्रिथमी पति राजै कागदि कीम न पाई ||
अउगणु जानै त पुंन करे किउ किउ नेखासि बिकाई ||२||


राजा हरिचन्द्र को सत्यवती राजा कहा जाता है| वह बहुत ही दानी पुरुष था| पौराणिक ग्रन्थों में भी उसकी कथा आती है| उन में लिखा है कि वह त्रिशुंक का पुत्र था| जो भी वचन करता था उस का पालन किया करता था| सत्य, दान, कर्म तथा स्नान का पाबंद था| उसकी भूल को देवता भी ढूंढ नहीं सकते थे| एक दिन उनके पास नारद मुनि आ गए| राजा ने उनकी बहुत सेवा की| देवर्षि नारद राजा की सारी नगरी में घूमे| नारद ने देखा कि राजधानी में सभी स्त्री-पुरुष राजा का यश तथा गुणगान करते हैं| कहीं भी राजा की निंदा सुनने में न आई|

राजा हरिचन्द्र के राज भवन से निकलकर प्रभु के गुण गाते हुए नारद इन्द्र लोक में जा पहुंचे| तीनों लोकों में नारद मुनि का आदर होता था| वह त्रिकालदर्शी थे| पर यदि मन में आए तो कोई न कोई खेल रचने में भी गुरु थे| किसी से कोई ऐसी बात कहनी कि जिससे उसको भ्रम हो जाए तथा जब वह दूसरे से निपट न ले, उतनी देर आराम से न बैठे| ऐसा ही उनका आचरण था|

इन्द्र-हे मुनि वर! जरा यह तो बताओ कि मृत्यु-लोक में कैसा हाल है जीवों का, स्त्री-पुरुष कैसे रहते हैं?

नारद मुनि-मृत्यु-लोक पर धर्म-कर्म का प्रभाव पड़ रहा है| पुण्य, दान, होम यज्ञ होते हैं| स्त्री-पुरुष खुशी से रहते हैं| कोई किसी को तंग नहीं करता| अन्न, जल, दूध, घी बेअंत है| वासना का भी बहुत प्रभाव है| गायों की पालना होती है| घास बहुत होता है, वनस्पति झूमती है| ब्राह्मण सुख का जीवन व्यतीत कर रहे हैं|

इन्द्र-हे मुनि देव! ऐसे भला कैसे हो सकता है? ऐसा तो हो ही नहीं सकता| ऐसा तभी हो सकता है यदि कोई राजा भला हो, राजा के कर्मचारी भले हो| पर मृत्यु-लोक के राजा भले नहीं हो सकते, कोई न कोई कमी जरूर होती है|

नारद मुनि-ठीक है! मृत्यु-लोक पर राजा हरीशचंद्र है| वह चक्रवती राजा बन गया है| वह दान-पुण्य करता है, ब्राह्मणों को गाय देता है तथा अगर कोई जरूरत मंद आए तो उसकी जरूरत पूरी करता है, सत्यवादी राजा है| वह कभी झूठ नहीं बोलता| होम यज्ञ होते रहते हैं| राजा नेक और धर्मी होने के कारण प्रजा भी ऐसी ही है| हे इन्द्र! एक बार उसकी नगरी में जाने पर स्वर्ग का भ्रम होता है| वापिस आने को जी नहीं चाहता, सर्वकला सम्पूर्ण है| रिद्धियां-सिद्धियां उसके चरणों में हैं|

इस तरह नारद मुनि ने राजा हरीशचन्द्र की स्तुति की तो इन्द्र पहले तो हैरान हुआ तथा फिर उसके अन्दर ईर्ष्या उत्पन्न हुई| उसे सदा यही चिंता रहती थी कि कोई दूसरा उससे ज्यादा बली न हो| इन्द्र से बली वहीं हो सकता था जो बहुत ज्यादा तपस्या तथा धर्म-कर्म करता था| ऐसा करने वाला कोई एक ही होता था| इन्द्र के पास दैवी शक्तियां थीं| वह मृत्यु-लोक के भक्तों तथा धर्मी पुरुषों की भक्ति में विघ्न डालने का प्रयत्न करता| उसने अपने मन में यह फैसला कर लिया कि वह राजा की जरूर परीक्षा लेगा, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई इतना सत्यवादी बन जाए|

नारद मुनि इन्द्र लोक से चले गए| इन्द्र चिंता में डूब गया| अभी वह सोच ही रहा था कि उसके महल में विशवामित्र आ गया| विश्वामित्र ने कई हजार साल तपस्या की थी तब वह मृत्यु-लोक से स्वर्ग-लोक में पहुंचा था| वह बहुत प्रभावशाली था| उसने जब इन्द्र की तरफ देखा तो चेहरे से ही उसके मन की दशा को समझ गया|

उसने पूछा-देवताओं के महांदेव! महाराज इन्द्र के चेहरे पर काला प्रकाश क्यों? चिंता के चिन्ह प्रगट हो रहे हैं, ऐसी क्या बात है जो आपके दुःख का कारण है? कौन है जो महाराज के तख्त को हिला रहा है?

विश्वामित्र की यह बात सुन कर इन्द्र ने कहा-'हे मुनि जन! अभी-अभी नारद मुनि जी यहां आए थे| वह मृत्यु-लोक से भ्रमण करके आए थे| उन्होंने बताया है कि पृथ्वी पर राजा हरीशचन्द्र ऐसा है जिसे लोग सत्यवादी कहते हैं| वह पुण्य दान और धर्म-कर्म करके बहुत आगे चला गया है|'

यह सुन कर विश्वामित्र मुस्कराया और उसने कहा कि इस छोटी-सी बात से क्यों घबरा रहे हो| जैसा चाहोगे हो जाएगा| आप के पास तो लाखों उपाय हैं| महाराज! आप की शक्ति तक किस की मजाल है कि पहुंच जाए| आप आज्ञा कीजिए, जैसे कहो हो सकता है, आप चिंता छोड़ें|

इन्द्र की चिंता दूर करने के लिए विश्वामित्र ने राजा हरीशचन्द्र की परीक्षा लेने का फैसला कर लिया तथा इन्द्र से आज्ञा ले कर पृथ्वी-लोक में पहुंच गया| साधारण ब्राह्मण के वेष में विश्वामित्र राजा हरीश चन्द्र की नगरी में गया| राज भवन के 'सिंघ पौड़' पर पहुंच कर उस ने द्वारपाल को कहा-राजा हरीश चन्द्र से कहो कि एक ब्राह्मण आपको मिलने आया है|

द्वारपाल अंदर गया| उसने राजा हरीश चन्द्र को खबर दी तो वह सिंघासन से उठा और ब्राह्मण का आदर करने के लिए बाहर आ गया| बड़े आदर से स्वागत करके उसको ऊंचे स्थान पर बिठा कर उसके चरण धो कर चरणामृत लिया और दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की-

हे मुनि जन! आप इस निर्धन के घर आए हो, आज्ञा करें कि सेवक आपकी क्या सेवा करे? किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो दास हाजिर है बस आज्ञा करने की देर है|

'हे राजन! मैं एक ब्राह्मण हूं| मेरे मन में एक इच्छा है कि मैं चार महीने राज करूं| आप सत्यवादी हैं, आप का यश त्रिलोक में हो रहा है| क्या इस ब्राह्मण की यह इच्छा पूरी हो सकती है|' ब्राह्मण ने कहा|

सत्यवादी राजा हरीश चन्द्र ने जब यह सुना तो उसको चाव चढ़ गया| उसका रोम-रोम झूमने लगा और उसने दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की-'जैसे आप की इच्छा है, वैसे ही होगा| अपना राज मैं चार महीने के लिए दान करता हूं|'

यह सुन कर विश्वामित्र का हृदय कांप गया| उसको यह आशा नहीं थी कि कोई राज भी दान कर सकता है| राज दान करने का भाव है कि जीवन के सारे सुखों का त्याग करना था| उसने राजा की तरफ देखा, पर इन्द्र की इच्छा पूरी करने के लिए वह साहसी होका बोला -

चलो ठीक है| आपने राज तो सारा दान कर दिया, पर बड़ी जल्दबाजी की है| मैं ब्राह्मण हूं, ब्राह्मण को दक्षिणा देना तो आवश्यक होता है, मर्यादा है|

राजा हरीश चन्द्र-सत्य है महाराज! दक्षिणा देनी चाहिए| मैं अभी खजाने में से मोहरें ला कर आपको दक्षिणा देता हूं|'

विश्वामित्र-'खजाना तो आप दान कर बैठे हो, उस पर आपका अब कोई अधिकार नहीं है| राज की सब वस्तुएं अब आपकी नही रही| यहां तक कि आपके वस्त्र, आभूषण, हीरे लाल आदि सब राज के हैं| इन पर अब आपका कोई अधिकार नहीं|

राजा हरीश चन्द्र-'ठीक है| दास भूल गया था| आप के दर्शनों की खुशी में कुछ याद नहीं रहा, मुझे कुछ समय दीजिए|'

विश्वामित्र-'कितना समय?'

राजा हरीश चन्द्र - 'सिर्फ एक महीना| एक महीने में मैं आपकी दक्षिणा दे दूंगा|'

विश्वामित्र-'चलो ठीक है| एक महीने तक मेरी दक्षिणा दे दी जाए| नहीं तो बदनामी होगी कि राजा हरीश चन्द्र सत्यवादी नहीं है| यह भी आज्ञा है कि सुबह होने से पहले मेरे राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ| आप महल में नहीं रह सकते| ऐसा करना होगा यह जरूरी है|

राजा हरीशचन्द्र ने शाही वस्त्र उतार दिए| बिल्कुल साधारण वस्त्र पहन कर पुत्र एवं रानी को साथ लेकर राज्य की सीमा से बाहर चला गया| प्रजा रोती कुरलाती रह गई लेकिन राजा हरीशचन्द्र के माथे पर बिल्कुल भी शिकन तक न पड़ी, न ही चिंता के चिन्ह प्रगट हुए| वह अपने वचन पर अडिग रहा| साधुओं की तरह तीनों राज्य की सीमा से बाहर बनारस कांशी नगरी की ओर चल दिए| मार्ग में भूख ने सताया तो कंदमूल खाकर निर्वाह किया| राजा तो न डोला लेकिन रानी और पुत्र घबरा गए| उनको मूल बात का पता नहीं था|

चलते-चलते राजा-रानी कांशी नगरी में पहुंच गए| मार्ग में उनको बहुत कष्ट झेलने पड़े| पांवों में फफोले पड़ गए| वह दुखी होकर पहुंचे पर दुःख अनुभव न किया|

राजा हरीश चन्द्र चूने की भट्ठी पर मजदूरी करने लग गया| उसने अपने शरीर की चिंता न की| उसने कठिन परिश्रम करके भोजन खाना पसंद किया| क्योंकि अपने हाथ से परिश्रम करना धर्म है और मांग कर खाना पाप है| ऐसा वही मनुष्य करता है जो मेहनत पर भरोसा रखता है| राजा परिश्रम करके जो भी लाता उससे खाने का सहारा हो जाता| लेकिन ब्राह्मण की दक्षिणा के लिए पैसे इकट्ठे न कर पाता| इस प्रकार 25 दिन बीत गए| राजा के लिए अति कष्ट के दिन आ गए, क्योंकि विश्वामित्र और देवराज इन्द्र राजा हरीशचन्द्र को नीचा दिखाना चाहते थे| उन्होंने राजा के सत्यवादी अटल भरोसे को गिराना था|

ब्राह्मण के रूप में विश्वामित्र आ गए और क्रोधित होकर राजा हरीशचन्द्र से बोले-'हे हरीशचन्द्र! आप तो सत्यवादी हैं| आप का यह धर्म नहीं कि आप धर्म की मर्यादा पूरी न करो, मेरी दक्षिणा दीजिए!'

राजा हरीशचन्द्र ने विश्वामित्र से क्षमा मांगी| क्षमा मांगने के बाद राजा ने फैसला किया कि वह स्वयं को तथा अपनी रानी को बेच देगा तथा जो मिलेगा वह ब्राह्मण को दे दूंगा, पर यह बात कतई नहीं सुनूंगा कि राजा हरीशचन्द्र झूठे हैं| वह सत्यवादी था| यह सोच कर उसने कांशी की गलियों में आवाज़ दी - 'कोई खरीद ले', 'कोई खरीद ले', 'हम बिकाऊ हैं|' इस तरह ही आवाज़ देते रहे| सुनने वाले लोग हैरान थे और मंदबुद्धि वाले उनकी हंसी उड़ा रहे थे|

बाजार में कई लोगों ने उनकी सहायता करनी चाही, पर राजा ने दान या सहायता लेना स्वीकार न किया| अन्त में एक ब्राहमण ने अपनी ब्राह्मणी के लिए दासी के तौर में रानी को खरीद लिया और राजा को पैसे दे दिए| रानी ने ब्राह्मणी के आगे दो शर्तें रखीं| एक तो पराए मर्द से न बोलना, दूसरा किसी मर्द की जूठन न खाना| ब्राह्मणी ने स्वीकार कर लिया तथा रानी अपने पुत्र को लेकर ब्राह्मण के घर चली गई|

रानी के बिक जाने के बाद राजा को शहर की श्मशान घाट के रक्षक चण्डाल ने खरीद लिया| राजा को यह कार्य सौंपा गया कि वह श्मशान घाट में रुपए लिए बिना कोई मुर्दा न जलने दे और रखवाली करे| राजा रात-दिन वहां रहने को तैयार हो गया और फिर ब्राह्मण को पूरी दक्षिणा दे दी| विश्वामित्र और इन्द्र का यह साहस न हुआ कि वह राजा हरीशचन्द्र को यह कह सके कि वह झूठा है या अपने वचन से फिर जाता है|

विश्वामित्र और इन्द्र जब हार गए तो उन्होंने अपनी हार मानने से पहले राजा और रानी की एक और कड़ी परीक्षा लेनी चाहिए| इसके लिए उन्होंने अपनी दैवी शक्ति का प्रयोग करके राजा की परीक्षा ली|

राजा और रानी के पुत्र का नाम रोहतास था| वह खेलता रहता और कभी-कभी अपनी माता के काम में हाथ भी बंटाता| विश्वामित्र और इन्द्र ने अपनी दैवी शक्ति से राजा और रानी के पुत्र को सांप से डंसवाया| बच्चा उसी क्षण प्राण त्याग गया| अपने पुत्र की मृत्यु को देख कर रानी व्याकुल हो उठी| उसका रोना धरती और आकाश में गूंजने लगा| रानी ने मिन्नतें करके अपने पुत्र के कफन और उसके संस्कार के लिए ब्राह्मण से सहायता मांगी, पर इन्द्र और विश्वामित्र ने उसके मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्होंने न दो गज कपड़ा दिया और न ही कोई पैसा दिया| रानी ने अपनी धोती का आधा चीर फाड़ कर पुत्र को लपेट लिया और श्मशान घाट की ओर ले गई|

लेकिन राजा हरीशचन्द्र ने रुपए लिए बिना रानी को श्मशान घाट में दाखिल न होने दिया और न ही अपने पुत्र का संस्कार किया| उसने अपने मालिक के साथ धोखा न किया| रानी रोती रही| वह बैठी-बैठी ऐसी बेहोश हुई कि उसको होश न रही|

संयोग से एक और घटना घटी| वह यह कि चोरों ने कांशी के राजा के महल में से चोरी की| उन्होंने यह कामना की थी अगर माल मिलेगा तो श्मशान घाट के किसी मुर्दे को चढ़ावा देंगे| वे चोर जब श्मशान घात पहुंचे तो आगे रानी बैठी थी| उसके पास मुर्दा देखकर वे रानी के गले में सोने का हार डाल कर चले गए|

चोरी की जांच-पड़ताल करते हुए सिपाही जब आगे आए तो श्मशान घाट में उन्होंने रानी के गले में सोने का शाही हार पड़ा देखा| उन्होंने रानी को उसी समय पकड़ लिया| रानी ने रो-रो कर बहुत कहा कि वह निर्दोष है, पर किसी ने एक न सुनी| उसके पुत्र रोहतास को वहीं पर छोड़ कर सिपाही रानी को कांशी के राजा के पास ले गए| राजा ने उसे चोरी के अपराध में मृत्यु दण्ड का हुक्म दे दिया| मरने के लिए रानी फिर श्मशान घाट पहुंच गई| उसका कत्ल भी राजा हरीशचन्द्र ने करना था, जो चण्डाल का सेवक था|

विश्वामित्र ने भयानक ही खेल रचा था| पुत्र रोहतास को मार दिया, रानी पर चोरी का दोष लगा कर उसका कत्ल करवाने के लिए कत्लगाह में ले आया| कत्ल करने वाला भी राजा हरीशचन्द्र था, जिसने अपने राज्य में एक चींटी को भी नहीं मारा था| ऐसी लीला और भयानकता देख कर विष्णु और पारब्रह्म जैसे महाकाल देवता भी घबरा गए, पर राजा हरीशचन्द्र अडिग रहा| वह अपने फर्ज पर खरा उतरा| उसने अपनी रानी को मरने के लिए तैयार होने को कहा, ताकि वह उसे मार कर राजा के हुक्म की पालना कर सके| उस समय कत्लगाह और श्मशान घाट में वह स्वयं था और साथ में उसकी प्यारी रानी और मृत पुत्र| बाकी सन्नाटा और अकेलापन था|

'तैयार हो जाओ'! यह कह कर राजा हरीशचन्द्र ने तलवार वाला हाथ रानी को मरने के लिए ऊपर उठाया| हाथ को ऊंचा करके जब वार करने लगा तो उस समय अद्भुत ही चमत्कार हुआ| उसी समय किसी अनदेखी शक्ति ने उसके हाथ पकड़ लिए और कहा - "धन्य हो तुम राजा हरीशचन्द्र सत्यवादी!" इस आवाज़ के साथ ही उसके हाथ से तलवार नीचे गिर गई, उसने आश्चर्य से देखा कि वह एक श्मशान घाट में नहीं बल्कि एक बैग में खड़ा है, जहां विभिन्न प्रकार के फूल खिले हैं| उसके वस्त्र भी चण्डालों वाले नहीं थे, उसने अपनी आंखें मल कर देखा तो सामने भगवान खड़े थे| विश्वामित्र और इन्द्र भी निकट खड़े थे| पर वह ब्राह्मण कहीं ही नजर नहीं आ रहा था|

राजा हरीशचन्द्र उसी पल भगवान के चरणों में झुक गया| रानी ने भी आगे होकर सब को प्रणाम किया| उस समय भगवान ने वचन किया - 'राजा हरीशचन्द्र! सत्य ही सत्यवादी है| मांग, जो कुछ भी मांगोगे वही मिलेगा|

इसके साथ ही विश्वामित्र ने सारी कथा सुना दी तथा राजा रानी के पुत्र रोहतास को हंसते मुस्कराते हुए दोनों के पास पेश किया| सारी कथा सुन कर राजा हरीशचन्द्र ने भगवान, इन्द्र तथा विश्वामित्र को प्रणाम किया और कहा-'अपनी लीला को तो आप ही जाने महाराज!'

जब भगवान ने बहुत जोर दिया तो राजा हरीशचन्द्र ने यह वर मांगा - 'प्रभु! मेरी यही इच्छा है कि मैं सारी नगरी सहित स्वर्गपुरी को जाऊं|'

'तथास्तु' कह कर सभी देवता लुप्त हो गए| राजा, रानी अपने पुत्र सहित अपनी नगरी में आ गए| सारी प्रजा ने खुशी मनाई|

कहते हैं राजा कुछ समय राज करता रहा तथा एक समय ऐसा आया जब सारी नगरी सहित राजा स्वर्गलोक को चल पड़ा| जब वह बैकुण्ठ धाम को जा रहा था| तो जानवर, पक्षी तथा पशु आदि साथ थे| यह देखकर राजा को अभिमान हो गया| गधा हींगा-राजा ही है, जिसकी नगरी भी स्वर्ग को जा रही है| उसी समय नगरी जाती-जाती धरती व स्वर्ग के बीच ब्रह्मांड में रुक गई| उसका नाम हरिचंद उरी है| गुरुबाणी में आता है -

हरिचंद उरी चित भ्रमु सखीए म्रिग त्रिसना द्रुम छाइआ ||
चंचलि संगि न चालती सखीए अंति तजि जावत माइआ ||

इस कथा का परमार्थ यह है कि किसी क्षण भी सत्य को हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए तथा न ही अभिमान करना चाहिए| जो सत्यवादी बने रहते है, उनकी नैया पार होती है|

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