शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 10 February 2018

मेरे साई के उजालो

ॐ श्री साँई राम जी



साई के उजालो,
मेरे साई के उजालो .
आँखों में सिमट आओ
अंधेरो को निकालो ..

महफ़िल में तेरी आये
तो हम एक हुए हैं .
रस्ते पे तेरे चल के
सभी नेक हुए हैं .
हर पग पे सम्भाला है
तो आगे भी संभालो ..
साई के उजालो .............

बरसों से तुम्हें दिल
की नज़र से ढूंढ़ रही है .
जिस घर में छिपे हो
वो ही घर ढूंढ़ रही है .
परदों से निकलकर
मुझे आँचल में छिपालो ..
साई के उजालो ...........

Friday, 9 February 2018

साँई जी पर पूर्ण विश्वास रखो...!!

ॐ श्री साँई राम जी   


"मुझ पर पूर्ण विश्वास रखो | यधपि मै देहत्याग भी कर दूँगा, परन्तु फिर भी मेरी अस्थियाँ आशा और विश्वास का संचार करती रहेंगी | केवल मै ही नहीं, मेरी समाधि भी वार्तालाप करेगी, चलेगी, फिरेगी, ओर उन्हें आशा का सन्देश पहुँचाती रहेगी, जो अनन्य भाव से मेरे शरणागत होंगे | 

निराश न होना कि मै तुमसे विदा हो जाऊँगा | तुम सदैव मेरी अस्थियों को भक्तों के कल्याणार्थ ही चिंतित पाओगे | यदि मेरा निरंतर स्मरण और मुझ पर दृढ विश्वास रखोगे तो तुम्हें अधिक लाभ होगा | "

Thursday, 8 February 2018

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...




श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30
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शिरडी को खींचे गये भक्त
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1. वणी के काका वैघ
2. खुशालचंद
3. बम्बई के रामलाल पंजाबी ।
इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गये ।

प्राक्कथन
...........
जो बिना किसी कारण भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर है तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो ऐसे भक्त और समस्त कष्ट दूर हो जाते है, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम क्यों न नमन करें । भक्तों को आत्मदर्शन कराना ही सन्तों का प्रधान कार्य है । श्री साई, जो सन्त शिरोमणि है, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है । जो उनके श्री-चरणों की शरण में जाते है , उनके समस्त पाप नष्ट होकर निश्चित ही दिन-प्रतिदिन उनकी प्रगति होती है । उनके श्री-चरणों का स्मरण कर पवित्र स्थानों से भक्तगण शिरडी आते और उनके समीप बैठकर श्लोक पढ़कर गायत्री-मंत्र का जप किया करते थे । परन्तु जो निर्बल तथा सर्व प्रकार से दीन-हीन है और जो यह भी नहीं जानते कि भक्ति किसे कहते है, उनका तो केवल इतना ही विश्वास है कि अन्य सब लोग उन्हें असहाय छोड़कर उपेक्षा भले ही कर दे, परन्तु अनाथों के नाथ और प्रभु श्री साई मेरा कभी परित्याग न करेंगे । जिन पर वे कृपा करे, उन्हें प्रचण्ड शक्ति, नित्यानित्य में विवेक तथा ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता है । वे अपने भक्तों की इच्छायें पूर्णतः जानकर उन्हें पूर्ण किया करते है, इसीलिये भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाया करती है और वे सदा कृतज्ञ बने रहते है । हम उन्हें साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना करते है कि वे हमारी त्रुटियों की ओर ध्यान न देकर हमें समस्त कष्टों से बचा लें । जो विपति-ग्रस्त प्राणी इस प्रकार श्री साई से प्रार्थना करता है, उनकी कृपा से उसे पूर्ण शान्ति तथा सुख-समृद्घि प्राप्त हती है । श्री हेमाडपंत कहते है कि हे मेरे प्यारे साई । तुम तो दया के सागर हो । यह तो तुम्हारी ही दया का फल है, जो आज यह साई सच्चरित्र भक्तों के समक्ष प्रस्तुत है, अन्यथा मुझमें इतनी योग्यता कहाँ थी, जो ऐसा कठिन कार्य करने का दुस्साहस भी कर सकता । जब पूर्ण उत्ततरदायित्व साई ने अपने ऊपर ही ले लिया तो हेमाडपंत को तिलमात्र भी भार प्रतीत न हुआ और न ही इसकी उन्हें चिन्ता ही हुई । श्री साई ने इस ग्रन्थ के रुप में उनकी सेवा स्वीकार कर ली । यह केवल उनके पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के कारण ही सम्भव हुआ, जजिसके लिये वे अपने को भाग्यशाली और कृतार्थ समझते है । नीचे लिखी कथा कपोलकल्पित नहीं, वरन् विशुदृ अमृततुल्य है । इसे जो हृदयंगम करेगा, उसे श्री साई की महानता और सर्वव्यापकता विदित हो जायेगी, परन्तु जो वादविवाद और आलोचना करना चाहते है, उन्हें इन कथाओं की ओर ध्यान देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ तर्क की नहीं, वरन् प्रगाढ़ प्रेम और भक्ति की अत्यन्त अपेक्षा है । विद्घान् भक्त तथा श्रद्घालु जन अथवा जो अपने को साई-पद-सेवक समझते है, उन्हें ही ये कथाएँ रुचिकर तथा शिक्षाप्रद प्रतीत होगी, अन्य लोगों के लिये तो वे निरी कपोल-कल्पनाएँ ही है । श्री साई के अंतरंग भक्तों को श्री साईलीलाएँ कल्पतरु के सदृश है । श्री साई-लीलारुपी अमृतपान करने से अज्ञानी जीवों को मोक्ष, गृहस्थाश्रमियों को सन्तोष तथा मुमुक्षुओं को एक उच्च साधन प्राप्त होता है । अब हम इस अध्याय की मूल कथा पर आते है ।

काका जी वैघ
...................
नासिक जिले के वणी ग्राम में काका जी वैघ नाम के एक व्यक्ति रहते थे । वे श्रीसप्तशृंगी देवी के मुख्य पुजारी थे । एक बार वे विपत्तियों में कुछ इस प्रकार ग्रसित हुए कि उनके चित्त की शांति भंग हो गई और वे बिलकुल निराश हो उअठे । एक दिन अति व्यथित होकर देवी के मंदिर में जाकर अन्तःकरण से वे प्रार्थना करने लगे कि हे देवि । हे दयामयी । मुझे कष्टों से शीघ्र मुक्त करो । उनकी प्रार्थना से देवी प्रसन्न हो गई और उसी रात्रि को उन्हें स्वप्न में बोली कि तू बाबा के पास जा, वहाँ तेरा मन सान्त और स्थिर हो जायेगा । बाबा का परिचय जानने को काका जी बड़े उत्सुक थे, परन्तु देवी से प्रश्न करने के पूर्व ही उनकी निद्रा भंग हो रगई । वे विचारने लगे कि ऐसे ये कौन से बाबा है, जिनकी ओर देवी ने मुझे संकेत किया है । कुछ देर विचार करने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सम्भव है कि वे त्र्यंबकेश्वर बाबा (शिव) ही हों । इसलिये वे पवित्र तीर्थ त्र्यंबक (नासिक) को गये और वहाँ रहकर दस दिन व्यतीत कियये । वे प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो, रुद्र मंत्र का जप कर, साथ ही साथ अभिषेक व अन्य धार्मिक कृत्य भी करने लगे । परन्तु उनका मन पूर्ववत् ही अशान्त बना रहा । तब फिर अपने घर लौटकर वे अति करुण स्वर में देवी की स्तुति करने लगे । उसी रात्रि में देवी ने पुनः स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तू व्यर्थ ही त्र्यम्बकेश्वर क्यो गया । बाबा से तो मेरा अभिप्राय था शिरडी के श्री साई समर्थ से । अब काका जी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह उपस्थित हो गया कि वे कैसे और कब शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाये । यथार्थ में यदि कोई व्यक्ति, किसी सन्त के दर्शने को आतुर हो तो केवल सन्त ही नही, भगवान् भी उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है । वस्तुतः यिद पूछा जाय तो सन्त और अनन्त एक ही है और उनमें कोई भिन्नता नही । यदि कोई कहे कि मैं स्वतः ही अमुक सन्त के दर्शन को जाऊँगा तो इसे निरे दम्भ के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । सन्त की इचत्छा के विरुदृ उनके समीप कौन जाकर द्रर्शन ले सकता है । उनकी सत्त के बिना वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । जितनी तीव्र उत्कंठा संत दर्शन की होती, तदनुसार ही उसकी भक्ति और विश्वास में वृद्घि होती जायेगी और उतनी ही शीघ्रता से उनकी मनोकामना भी सफलतापूर्वक पू4ण होगी । जो निमंत्रण देता है, वह आदर आतिथ्य का प्रबन्ध भी करता है । काका जी के सम्बन्ध में सचमुच यही हुआ ।
शामा की मान्यता
...................
जब काका जी शिरडी यात्रा करने का विचार कर रहे थे, उसी समय उनके यहाँ एक अतिथि आया (जो शामा के अतिरिक्त और कोई न था) । शामा बाबा के अंतरंग भक्तों में से एक थे । वे ठीक इसी समय वणी में क्यों और कैसे आ पहुँचे, अब हम इस पर दृष्टि डालें । बाल्यावस्था में वे एक बार बहुत बीमार पड़ गये थे । उनकी माता ने अपनी कुलदेवी सप्तशृंगी से प्रार्थना की कि यदि मेरा पुत्र नीरोग हो जाये तो मैं उसे तुम्हारे चरणों पर लाकर डालूँगी । कुछ वर्षों के पश्चात् ही उनकी माता के स्तन में दाद हो गई । तब उन्होंने पुनः देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं रोगमुक्त हो जाऊँ तो मैं तुम्हें चाँदी के दो स्तन चाढाऊँगी । पर ये दोनों वचन अधूरे ही रहे । परन्तु जब वे मृत्युशैया पर पड़ी ती तो उन्होंने अपने पुत्र शामा को समीप बुलाकर उन दोनों वचनों की स्मृति दिलाई तथा उन्हें पूर्ण करने का आश्वासन पाकर प्राण त्याग दिये । कुछ दिनों के पश्चात् वे अपनी यह प्रतिज्ञा भूल गये और इसे भूले पूरे तीस साल व्यतीत हो गये । तभी एक प्रसिदृ ज्योतिषी शिरडी आये और वहाँ लगभग एक मास ठहरे । श्री मान् बूटीसाहेब और अन्य लोगों को बतलाये उनके सभी भविष्य प्रायः सही निकले, जिनसे सब को पूर्ण सन्तोष था । शामा के लघुभ्राता बापाजी ने भी उनसे कुछ प्रश्न पूछे । तब ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता ने अपनी माता को मृत्युशैया पर जो वचन दिये थे, उनके अब तक पूर्ण न किये जाने के कारण देवी असन्तुष्ट होकर उन्हें कष्ट पहुँचा रही है । ज्योतिषी की बात सुनकर शामा को उन अपूर्ण वचनों की स्मृति हो आई । अब और विलम्ब करना खतरनाक समझकर उन्होंने सुनार को बुलाकर चाँदी के दो स्तन शीघ्र तैयार कराये और उन्हें मसजिद मं ले जाकर बाबा के समक्ष रख दिया तथा प्रणाम कर उन्हें स्वीकार कर वचनमुक्त करने की प्रार्थना की । शामा ने कहा कि मेरे लिये तो सप्तशृंगी देवी आप ही है, परन्तु बाबा ने साग्रह कहा कि तुम इन्हें स्वयं ले जाकर देवी के चरणों में अर्पित करो । बाबा की आज्ञा व उदी लेकर उन्होंने वणी को प्रस्थान कर दिया । पुजारी का घर पूछते-पूछते वे काका जी के पास जा पहुँचे । काका जी इस समय बाबा के दर्शनों को बड़े उत्सुक थे और ठीक ऐसे ही मौके पर शामा भी वहाँ पहुँच गये । वह संयोग भी कैसा विचित्र था । काका जी ने आगन्तुक से उनका परिचय प्राप्त कर पूछा कि आप कहाँ से पधार रहे है । जब उन्होंने सुना कि वे शिरडी से आ रहे तो वे एकदम प्रेमोन्मत हो शामा से लिपट गये और फिर दोनों का श्री साई लीलाओं पर वार्तालाप आरम्भ हो गया । अपने वचन संबंधी कृत्यों को पूर्ण कर वे काकाजी के साथ शिरडी लौट आये । काकाजी मसजिद पहुँच कर बाबा के श्रीचरणों से जा लिपटे । उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी और उनका चित्त स्थिर हो गया । देवी के दृष्टांतानुसार जैसे ही उन्होंनें बाबा के दर्शन किये, उनके मन की अशांति तुरन्त नष्ट तहो गई और वे परम शीतलता का अनुभव करने लगे । वे विचार करने लगे कि कैसी अदभुत शक्ति है कि बिना कोई सम्भाषण या प्रश्नोत्तर किये अथवा आशीष पाये, दर्शन मात्र से ही अपार प्रसन्नता हो रही है । सचमुच में दर्शन का महत्व तो इसे ही कहते है । उनके तृषित नेत्र श्री साई-चरणों पर अटक गये और वे अपनी जिहा से एक शब्द भी न बोल सके । बाबा की अन्य लीलाएँ सुनकर उन्हें अपार आनन्द हुआ और वे पूर्णतः बाबा के शरणागत हो गये । सब चिन्ताओं और कष्टों को भूलकर वे परम आनन्दित हुए । उन्होंने वहाँ सुखपूर्वक बारह दिन व्यतीत किये और फिर बाबा की आज्ञा, आशीर्वाद तथा उदी प्राप्त कर अपने घर लौट गये ।

खुशालचन्द (राहातानिवासी)
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ऐसा कहते है कि प्रातःबेला में जो स्वप्न आता है, वह बहुधा जागृतावस्था में सत्य ही निकलता है । ठीक है, ऐसा ही होता होगा । परन्तु बाबा के सम्बन्ध में समय का ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था । ऐसा ही एक उदाहरण प्रस्तुत है – बाबा ने एक दिन तृतीय प्रहर काकासाहेब को ताँगा लेकर राहाता से खुशालचन्द को लाने के लिये भेजा, क्योंकि खुशालचन्द से उनकी कई दोनों से भेंट न हुई थी । राहाता पहुँच कर काकासाहेब ने यह सन्देश उन्हें सुना दिया । यह सन्देश सुनकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि दोपहर को भोजन के उपरान्त थोड़ी देर को मुझे झपकी सी आ गई थी, तभी बाबा स्वप्न में आये और मुझे शीघ्र ही शिरडी आने को कहा । परन्तु घोडे का उचित प्रबन्ध न हो सकने के कारण मैंने अपने पुत्र को यह सूचना देने के लिये ही उनके पास भेजा था । जब वह गाँव की सीमा तक ही पहुँचा था, तभी आप सामने से ताँगे में आते दिखे । वे दोनों उस ताँगे में बैठकर शिरडी पहुँचे तथा बाबा से भेंटकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा की यह लीला देख खुशालचन्द गदगद हो गये ।

बम्बई के रामलाल पंजाबी
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बम्बई के एक पंजाबी ब्राहमण श्री. रामलाला को बाबा ने स्वप्न में एक महन्त के वेश में दर्शन देकर शिरडी आने को कहा । उन्हें नाम ग्राम का कुछ भी पता चल न रहा था । उनको श्री-दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा तो थी, परन्तु पता-ठिकाना ज्ञात न होने के कारण वे बड़े असमंजस में पड़े हुये थे । जो आमंत्रण देता है, वही आने का प्रबन्ध भी करता है और अन्त में हुआ भी वैसा ही । उसी दिन सन्ध्या समय जब वे सड़क पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक दुकान पर बाबा का चित्र टंगा देखा । स्वप्न में उन्हें जिस आकृति वाले महन्त के दर्शन हुए थे, वे इस चित्र के समक्ष ही थे । पूछताछ करने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह चित्र शिरडी के श्री साई समर्थ का है और तब उन्होंने शीघ्र ही शिरडी को प्रस्थान कर दिया तथा जीवनपर्यन्त शिरडी में ही निवास किया । इस प्रकार बाबा ने अपने भक्तों को अपने दर्शन के लिये शिरडी में बुलाया और उनकी लौकिक तथा पारलौकिक समस्त इच्छाँए पूर्ण की ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 7 February 2018

कोई रोता है तुम्हे याद कर के बाबा...

ॐ सांई राम




कैसे आऊं मै शिर्डी में बाबा
मुझको अब तुम ही बतला दो
कोई तो रास्ता अब निकालो
जो जल्दी से तेरे दर पे लाये
बहुत तरसी है आंखे ये अब तक
कब देखेंगी ये वो नजारा
जब मुझको भी जन्नत के दर्शन
तेरी शिर्डी में जा कर होंगे
मैंने हर पल तुझको ही चाहा
फिर क्यूँ  न सुना तुमने बाबा
क्या एक बेटे को अपने पिता से
मिलने को तड़पते ही रहना है
खबर तो तुम्हे भी ये होगी
कोई रोता है तुम्हे याद कर के
तुम तो नरम दिल हो बाबा
फिर कैसे जुदाई तुम सह गए
साईं भक्त ये अरदास करें
हाथ जोड़ के साईं चरणों में
कैसे आऊं मै शिर्डी में बाबा
मुझको अब तुम ही बतला दो साईं नाथ मेरे !!!

Tuesday, 6 February 2018

माँ-बाप को भूलना नहीं।

ॐ साईं राम 



भूलो सभी को मगर, माँ-बाप को भूलना नहीं।

उपकार अगणित हैं उनके, इस बात को भूलना नहीं।।

पत्थर पूजे कई तुम्हारे, जन्म के खातिर अरे।

पत्थर बन माँ-बाप का, दिल कभी कुचलना नहीं।।

मुख का निवाला दे अरे, जिनने तुम्हें बड़ा किया।

अमृत पिलाया तुमको जहर, उनको उगलना नहीं।।

कितने लड़ाए लाड़ सब, अरमान भी पूरे किये।

पूरे करो अरमान उनके, बात यह भूलना नहीं।।

लाखों कमाते हो भले, माँ-बाप से ज्यादा नहीं।

सेवा बिना सब राख है, मद में कभी फूलना नहीं।।

सन्तान से सेवा चाहो, सन्तान बन सेवा करो।

जैसी करनी वैसी भरनी, न्याय यह भूलना नहीं।।

सोकर स्वयं गीले में, सुलाया तुम्हें सूखी जगह।

माँ की अमीमय आँखों को, भूलकर कभी भिगोना नहीं।।

जिसने बिछाये फूल थे, हर दम तुम्हारी राहों में।

उस राहबर के राह के, कंटक कभी बनना नहीं।।

धन तो मिल जायेगा मगर, माँ-बाप क्या मिल पायेंगे ?

Monday, 5 February 2018

है कस्तूरी सम मोहक संत ............

ॐ सांई राम!!!



है कस्तूरी सम मोहक संत। कृपा है उनकी सरस सुगंध।

ईखरसवत होते हैं संत। मधुर सुरूचि ज्यों सुखद बसंत॥

साधु-असाधु सभी पा करूणा। दृष्टि समान सभी पर रखना।

पापी से कम प्यार न करते। पाप-ताप-हर-करूणा करते॥

जो मल-युत है बहकर आता। सुरसरि जल में आन समाता।

निर्मल मंजूषा में रहता। सुरसरि जल नहीं वह गहता॥

वही वसन इक बार था आया। मंजूषा में रहा समाया।

अवगाहन सुरसरि में करता। धूल कर निर्मल खुद को करता॥

सुद्रढ़ मंजूषा है बैकुण्ठ। अलौकिक निष्ठा गंग तरंग।

जीवात्मा ही वसन समझिये। षड् विकार ही मैल समझिये॥

जग में तव पद-दर्शन पाना। यही गंगा में डूब नहाना।

पावन इससे होते तन-मन। मल-विमुक्त होता वह तत्क्षण॥

दुखद विवश हैं हम संसारी। दोष-कालिमा हम में भारी।

सन्त दरश के हम अधिकारी। मुक्ति हेतु निज बाट निहारी॥

गोदावरी पूरित निर्मल जल। मैली गठरी भीगी तत्जल।

बन न सकी यदि फिर भी निर्मल। क्या न दोषयुत गोदावरि जल॥

आप सघन हैं शीतल तरूवर।श्रान्त पथिक हम डगमग पथ हम।

तपे ताप त्रय महाप्रखर तम। जेठ दुपहरी जलते भूकण॥

ताप हमारे दूर निवारों। महा विपद से आप उबारों।

करों नाथ तुम करूणा छाया। सर्वज्ञात तेरी प्रभु दया॥

परम व्यर्थ वह छायातरू है। दूर करे न ताप प्रखर हैं।

जो शरणागत को न बचाये। शीतल तरू कैसे कहलाये॥

कृपा आपकी यदि नहीं पाये। कैसे निर्मल हम रह जावें।

पारथ-साथ रहे थे गिरधर। धर्म हेतु प्रभु पाँचजन्य-धर॥

सुग्रीव कृपा से दनुज बिभीषण। पाया प्राणतपाल रघुपति पद।

भगवत पाते अमित बङाई। सन्त मात्र के कारण भाई॥

नेति-नेति हैं वेद उचरते। रूपरहित हैं ब्रह्म विचरते।

महामंत्र सन्तों ने पाये। सगुण बनाकर भू पर लायें॥

दामा ए दिया रूप महार। रुकमणि-वर त्रैलोक्य आधार।

चोखी जी ने किया कमाल। विष्णु को दिया कर्म पशुपाल॥

महिमा सन्त ईश ही जानें। दासनुदास स्वयं बन जावें।

सच्चा सन्त बङप्पन पाता। प्रभु का सुजन अतिथि हो जाता॥

ऐसे सन्त तुम्हीं सुखदाता। तुम्हीं पिता हो तुम ही माता।

सदगुरु सांईनाथ हमारे। कलियुग में शिरडी अवतारें॥

लीला तिहारी नाथ महान। जन-जन नहीं पायें पहचान।

जिव्हा कर ना सके गुणगान। तना हुआ है रहस्य वितान॥

तुमने जल के दीप जलायें। चमत्कार जग में थे पायें।

भक्त उद्धार हित जग में आयें। तीरथ शिरडी धाम बनाए॥

जो जिस रूप आपको ध्यायें। देव सरूप वही तव पायें।

सूक्षम तक्त निज सेज बनायें। विचित्र योग सामर्थ दिखायें॥

पुत्र हीन सन्तति पा जावें। रोग असाध्य नहीं रह जावें।

रक्षा वह विभूति से पाता। शरण तिहारी जो भी आता॥

भक्त जनों के संकट हरते। कार्य असम्भव सम्भव करतें।

जग की चींटी भार शून्य ज्यों। समक्ष तिहारे कठिन कार्य त्यों॥

सांई सदगुरू नाथ हमारें। रहम करो मुझ पर हे प्यारे।

शरणागत हूँ प्रभु अपनायें। इस अनाथ को नहीं ठुकरायें॥

प्रभु तुम हो राज्य राजेश्वर। कुबेर के भी परम अधीश्वर।

देव धन्वन्तरी तव अवतार। प्राणदायक है सर्वाधार॥

बहु देवों की पूजन करतें। बाह्य वस्तु हम संग्रह करते।

पूजन प्रभु की शीधी-साधा। बाह्य वस्तु की नहीं उपाधी॥

जैसे दीपावली त्यौहार। आये प्रखर सूरज के द्वार।

दीपक ज्योतिं कहां वह लाये। सूर्य समक्ष जो जगमग होवें॥

जल क्या ऐसा भू के पास। बुझा सके जो सागर प्यास।

अग्नि जिससे उष्मा पायें। ऐसा वस्तु कहां हम पावें॥

जो पदार्थ हैं प्रभु पूजन के। आत्म-वश वे सभी आपके।

हे समर्थ गुरू देव हमारे। निर्गुण अलख निरंजन प्यारे॥

तत्वद्रष्टि का दर्शन कुछ है। भक्ति भावना-ह्रदय सत्य हैं।

केवल वाणी परम निरर्थक। अनुभव करना निज में सार्थक॥

अर्पित कंरू तुम्हें क्या सांई। वह सम्पत्ति जग में नहीं पाई।

जग वैभव तुमने उपजाया। कैसे कहूं कमी कुछ दाता॥

"पत्रं-पुष्पं" विनत चढ़ाऊं। प्रभु चरणों में चित्त लगाऊं।

जो कुछ मिला मुझे हें स्वामी। करूं समर्पित तन-मन वाणी॥

प्रेम-अश्रु जलधार बहाऊं। प्रभु चरणों को मैं नहलाऊं।

चन्दन बना ह्रदय निज गारूं। भक्ति भाव का तिलक लगाऊं॥

शब्दाभूष्ण-कफनी लाऊं। प्रेम निशानी वह पहनाऊं।

प्रणय-सुमन उपहार बनाऊं। नाथ-कंठ में पुलक चढ़ाऊं॥

आहुति दोषों की कर डालूं। वेदी में वह होम उछालूं।

दुर्विचार धूम्र यों भागे। वह दुर्गंध नहीं फिर लागे॥

अग्नि सरिस हैं सदगुरू समर्थ। दुर्गुण-धूप करें हम अर्पित।

स्वाहा जलकर जब होता है। तदरूप तत्क्षण बन जाता है॥

धूप-द्रव्य जब उस पर चढ़ता। अग्नि ज्वाला में है जलता।

सुरभि-अस्तित्व कहां रहेगा। दूर गगन में शून्य बनेगा॥

प्रभु की होती अन्यथा रीति। बनती कुवस्तु जल कर विभुति।

सदगुण कुन्दन सा बन दमके। शाशवत जग बढ़ निरखे परखे॥

निर्मल मन जब हो जाता है। दुर्विकार तब जल जाता है।

गंगा ज्यों पावन है होती। अविकल दूषण मल वह धोती॥

सांई के हित दीप बनाऊं। सत्वर माया मोह जलाऊं।

विराग प्रकाश जगमग होवें। राग अन्ध वह उर का खावें॥

पावन निष्ठा का सिंहासन। निर्मित करता प्रभु के कारण।

कृपा करें प्रभु आप पधारें। अब नैवेद्य-भक्ति स्वीकारें॥

भक्ति-नैवेद्य प्रभु तुम पाओं। सरस-रास-रस हमें पिलाओं।

माता, मैं हूँ वत्स तिहारा। पाऊं तव दुग्धामृत धारा॥

मन-रूपी दक्षिणा चुकाऊं। मन में नहीं कुछ और बसाऊं।

अहम् भाव सब करूं सम्पर्ण। अन्तः रहे नाथ का दर्पण॥

बिनती नाथ पुनः दुहराऊं। श्री चरणों में शीश नमाऊं।

सांई कलियुग ब्रह्म अवतार। करों प्रणाम मेरे स्वीकार॥

ॐ सांई राम!!!

Sunday, 4 February 2018

श्री चरणों में भक्ती

ॐ सांई राम


ॐ शिरडी वासाय विधमहे
सच्चिदानन्दाय धीमही
तन्नो साईं प्रचोदयात॥
पलक उठे जब जब भी अपने,
बाबा जी का दर्शन पाये |
पलक झुके तो मन मन्दिर में,
बाबाजी को बैठा पाये |
मुख से जब कुछ बोलें तो,
साईं नाम ही दोहरायें |
कानों से कुछ सुनना हो तो,
साईं नाद ही सुन पायें |
हाथ उठें तो जुड जायें,
श्री चरणों में भक्ती से |
कारज करते साईं ध्यायें,
बाबा जी की शक्ती से ||

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